Ground Report -चार दशक बाद नक्सल चंगुल से आजाद गोगुंडा, नया कैंप से खुला विकास का रास्ता, पहली बार बनी सड़क
गोगुंडा पहाड़ी पर खुला सीआरपीएफ कैंप ग्रामीणों के लिए उम्मीद की नई किरण लेकर आया है.कैंप स्थापना के बाद अब यहां सड़क बनी है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : December 4, 2025 at 5:44 PM IST
नवीन कश्यप,सुकमा
सुकमा - सुकमा का नाम छत्तीसगढ़ के इतिहास में नक्सल आतंक के लिए जाना जाता है.किसी जमाने में यहां आना सीधा मौत को दावत देना था. नक्सलियों के कमांडर माड़वी हिड़मा भी इसी जिले के पूवर्ती गांव से नक्सली गतिविधियों को ऑपरेट किया करता था. गोगुंडा पहाड़ भी उन्हीं इलाकों में से एक था,जहां बारुदी सुरंग और गोलियों की आवाज यहां रहने वाले लोगों के जीवन की आम दिनचर्या थी. करीब 40 साल से ज्यादा तक इस क्षेत्र ने नक्सली दंश को झेला है.लेकिन जब से फोर्स के कैंप सुकमा जिले के अंदरुनी इलाकों में खुलने लगे,तब से लाल आतंक का कॉरिडोर सिमटने लगा.अब गोगुंडा पहाड़ विकास का साक्षी बन रहा है.
पहली बार बन रही है सड़क
गोगुंडा पहाड़ के सबसे ऊपरी हिस्से में बसे सातपारा (टोला) लंबे समय से देश की मुख्यधारा से कटा हुआ था. यहां न सड़क थी, न चिकित्सा सुविधा, न किसी तरह की आपातकालीन सहायता. लेकिन मौजूदा समय में इस दुर्गम पहाड़ी पर पहली सड़क बन रही है.ये एक ऐसी शुरुआत है जो न सिर्फ शासन की मौजूदगी का प्रतीक है, बल्कि स्थानीय ग्रामीणों की जिंदगी बदलने की गारंटी भी है.

650 ऊंची पहाड़ी पर रोड निर्माणगोगुंडा पहाड़ वो जगह है जो नक्सलियों की ढाल की तरह काम करता था. नक्सली गोगुंडा पहाड़ी को मन मुताबिक एंबुश पॉइंट, सुरक्षित ठिकाना और प्रशिक्षण कैंप के तौर पर इस्तेमाल किया करते थे. सुरक्षा बलों के लिए ये इलाका लंबे समय तक नो-गो जोन बना रहा.लेकिन लगातार अभियान रणनीतिक डॉमिनेशन और जवानों के अथक प्रयासों ने इस अभेद गढ़ को कमजोर किया. क्षेत्र को सुरक्षित घोषित करने के बाद यहां 650 मीटर की खड़ी पहाड़ी काटकर सड़क निर्माण शुरू किया गया. यह कार्य किसी इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट से ज्यादा एक जोखिम भरा युद्ध अभियान था. क्योंकि हर कदम पर आईईडी का खतरा मंडरा रहा था.

IED से जवान भी हुए घायल
सीआरपीएफ 74वीं वाहिनी और जिला पुलिस सुकमा की संयुक्त टीम ने दिन-रात संघर्ष करने के बाद रास्ता तैयार किया. कई बार मशीनें रोकनी पड़ीं, कई बार IED मिलने पर पूरा क्षेत्र खाली कराया गया.इसी निर्माण के दौरान 1 सीआरपीएफ जवान और 1 महिला जिला पुलिसकर्मी IED ब्लास्ट में घायल भी हुए, जिनका अब स्वास्थ्य सामान्य है.
सुरक्षा कैंप ने दरभा डिविजन की तोड़ी कमर
इस सड़क से मार्ग प्रशस्त होने के बाद पहाड़ी के शिखर पर नया सुरक्षा कैंप स्थापित किया गया.यह कदम जिला सुकमा पुलिस, DRG और CRPF 74वीं बटालियन की साझा सफलता है. ये वही इलाका है जो कभी दरभा डिवीजन का महत्वपूर्ण बेस था. कैंप की स्थापना ने माओवादी नेटवर्क की कमर तोड़ने में निर्णायक भूमिका निभाई है. यह कैंप न सिर्फ सुरक्षा का केंद्र है, बल्कि छत्तीसगढ़ शासन की ‘नियद नेल्लानार’ योजना को धरातल पर लागू करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, जिससे क्षेत्र के ग्रामीण सीधे लाभान्वित होंगे.


सड़क ने बदला ग्रामीणों का जीवन
गोगुंडा के सातों पारा वर्षों तक पहुंच विहीन थे.जिसके कारण मरीजों और प्रसव पीड़ा में तड़पती महिलाओं को कंधों में लादकर अस्पताल पहुंचाना पड़ता था. मोबाइल नेटवर्क मानो यहां के लिए कल्पना करने जैसा था. अब सड़क बनते ही ग्रामीणों की दुनिया बदलने लगी है. रोजमर्रा का सामान, चिकित्सा सुविधा और बाजार तक पहुंच आसान होगी. ग्रामीणों का कहना है पहले गोगुंडा से नीचे उतरना युद्ध लड़ने जैसा था, अब उम्मीद है कि आने वाले समय में जिंदगी आसान होगी.

आईजी, डीआईजी, एसपी ने किया निरीक्षण
03 नवंबर 2025 को सीआरपीएफ CG सेक्टर के महानिरीक्षक शालीन, डीआईजी आनंद सिंह राजपुरोहित, एसपी सुकमा किरण चव्हाण और 74वीं बटालियन के कमांडेंट हिमांशु पांडेय ने गोगुंडा कैंप का निरीक्षण किया. उन्होंने सुरक्षा स्थिति, संचार व्यवस्था, ऑपरेशन रणनीति और जवानों की चुनौतियों की समीक्षा करते हुए कहा कि यह कैंप क्षेत्र का सुरक्षा कवच बनेगा और ग्रामीणों का विश्वास मजबूत होगा.

जवानों के लहू से रखी गई सड़क की नींव
गोगुंडा इलाका कई दशकों तक माओवादियों का सबसे सुरक्षित ठिकाना रहा, जहां हर ऑपरेशन हमारे जवानों के लिए एक बड़ी चुनौती थी. आज जिला पुलिस और सीआरपीएफ 74वीं बटालियन ने यहां सफलतापूर्वक कैंप स्थापित कर दिया है.इसका परिणाम साफ है इलाके में नक्सलियों का प्रभाव तेजी से टूट रहा है और ग्रामीणों तक बुनियादी सुविधाएं पहुंचने लगी हैं. कैंप निर्माण के दौरान तीन जवान आईईडी में घायल हुए, जिनमें एक महिला पुलिसकर्मी भी शामिल हैं.सभी अब सुरक्षित हैं. गोगुंडा में यह कैंप सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि विकास और विश्वास की नई शुरुआत है.

गोगुंडा बनेगा विश्वास की पहली सीढ़ी
सीआरपीएफ कमांडेंट 74वीं वाहिनी हिमांशु पाण्डेय के मुताबिक केंद्र सरकार और केंद्रीय गृह मंत्री के नक्सल-मुक्त बस्तर के विजन के तहत गोगुंडा जैसे माओवादी गढ़ में कैंप स्थापित करना हमारे लिए बड़ी चुनौती था. डेढ़ महीने की कठिन पहाड़ी चढ़ाई, लगातार खतरे और 660 मीटर की खड़ी चट्टान को काटकर सड़क बनाना यह सब आसान नहीं था. लेकिन आज गोगुंडा में कैंप सिर्फ सुरक्षा का प्रतीक नहीं, बल्कि विकास की पहली सीढ़ी है.


दशकों से जहां सरकार की योजनाएं नहीं पहुंच पाती थीं, अब वहीं स्कूल, स्वास्थ्य और अन्य सभी सुविधाएं जल्द ही ग्रामीणों तक पहुंचने लगेंगी. ग्रामीणों का उत्साह ही हमारी सबसे बड़ी सफलता है. गोगुंडा अब डर नहीं, उम्मीद की पहचान बन रहा है- हिमांशु पाण्डेय, कमांडेंट 74वीं वाहिनी

आने वाले भविष्य की दिशा
गोगुंडा की यह सड़क और सुरक्षा कैंप सिर्फ पत्थर, मिट्टी और तंबुओं का ढांचा नहीं है,बल्कि ये चार दशकों के डर को चीरकर सामने आई उम्मीद की किरण है.जहां कभी विस्फोटक दबे होते थे, वहां आज माइल्सटोन गांव की दूरी बता रहे हैं.जो जगह लाल आतंक के साये में छिपी थी,वहां आज देश का तिरंगा लहरा रहा है. गोगुंडा में अब विकास के कदमों की आहट सुनाई दे रही है, ये सिर्फ सड़क नहीं बल्कि बस्तर के आने वाले भविष्य की दिशा है.
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