Giant Malabar Squirrel की देवपुर जंगल में दस्तक, बारनवापारा की जैव विविधता ने फिर चौंकाया
बर्डिंग ट्रेल के दौरान भारत की सबसे बड़ी वृक्षवासी गिलहरियों में एक जायंट मालाबार स्क्विरल दिखने से प्रकृति प्रेमियों में उत्साह है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : May 27, 2026 at 1:31 PM IST
|Updated : May 27, 2026 at 1:39 PM IST
बलौदाबाजार: छत्तीसगढ़ के जंगल एक बार फिर अपनी जैव विविधता को लेकर चर्चा में हैं. दरअसल बलौदाबाजार वनमंडल अंतर्गत आयोजित देवपुर समर कैंप 2026 के दौरान बर्डिंग ट्रेल पर निकले प्रतिभागियों को एक विशालकाय रंग-बिरंगी गिलहरी दिखाई दी. इसकी पहचान भारत की दुर्लभ वृक्षवासी प्रजातियों में शामिल जायंट मालाबार स्क्विरल के रूप में हुई है.
इसके शरीर पर लाल, भूरा, काला और क्रीम रंगों का मिश्रण उसे बाकी वन्य जीवों से अलग बनाता है. यह प्रजाति सामान्य गिलहरियों से बिल्कुल अलग होती है. इसका आकार काफी बड़ा होता है और यह पूरी तरह वृक्षों पर रहने वाली प्रजाति है.
बलौदाबाजार के प्रकृति एवं पक्षी प्रेमी हेमंत वर्मा ने बताया कि देवपुर जंगल में जायंट मालाबार स्क्विरल का दिखाई देना यह बताता है कि यहां का वन क्षेत्र अब भी जैव विविधता के लिहाज से समृद्ध और संतुलित है. ऐसी प्रजातियां तभी दिखाई देती हैं, जब जंगल स्वस्थ और सुरक्षित हों. उन्होंने कहा कि बर्डिंग ट्रेल के दौरान इस दुर्लभ जीव को देखना सभी प्रतिभागियों के लिए बेहद खास अनुभव था.

आखिर कितनी खास है यह गिलहरी?
⦁ जायंट मालाबार स्क्विरल भारत की सबसे बड़ी वृक्षवासी गिलहरियों में से एक मानी जाती है.
⦁ सामान्य गिलहरियों की तुलना में इसका आकार कई गुना बड़ा होता है.
⦁ इसकी लंबाई पूंछ सहित लगभग तीन फीट तक पहुंच सकती है.
⦁ इसके शरीर पर मौजूद रंगों का मिश्रण इसे बेहद आकर्षक बनाता है.
जमीन पर कम, पेड़ों पर ज्यादा जिंदगी
⦁ यह गिलहरी पूरी तरह “Arboreal” यानी वृक्षवासी स्वभाव की होती है.
⦁ यह अपना अधिकांश समय पेड़ों की शाखाओं पर बिताती है.
⦁ बहुत कम जमीन पर उतरती है.
⦁ एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक लगभग 20 फीट तक छलांग लगा सकती है.
बारनवापारा क्षेत्र की जैव विविधता फिर चर्चा में
बारनवापारा अभयारण्य और उसके आसपास का वन क्षेत्र पहले से ही जैव विविधता के लिए जाना जाता है. यहां कई दुर्लभ पक्षी, तितलियां, छोटे स्तनधारी और वन्य जीव पाए जाते हैं. लेकिन जायंट मालाबार स्क्विरल का दिखना इस क्षेत्र की जैविक समृद्धि को और मजबूत तरीके से सामने लाता है. जानकार मानते हैं कि यदि जंगलों में इस तरह की संवेदनशील प्रजातियां मौजूद हैं, तो इसका मतलब है कि वहां का पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी जीवंत और संतुलित है.
वन विभाग ने भी माना सकारात्मक संकेत
इस पूरे घटनाक्रम को लेकर डीएफओ धम्मशील गणवीर ने कहा कि बारनवापारा और आसपास के जंगल जैव विविधता की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने कहा कि ऐसे वन्यजीव अवलोकन यह बताते हैं कि जंगलों के संरक्षण की दिशा में किए जा रहे प्रयास असर दिखा रहे हैं। DFO के मुताबिक, “जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं होते, बल्कि हजारों जीवों का घर होते हैं. ऐसी प्रजातियों की मौजूदगी हमें याद दिलाती है कि प्राकृतिक संतुलन बनाए रखना कितना जरूरी है.”
बच्चों और युवाओं के लिए बना यादगार अनुभव
देवपुर समर कैंप में शामिल बच्चों और युवाओं के लिए यह पल किसी एडवेंचर से कम नहीं था. कई प्रतिभागियों ने पहली बार इतने करीब से किसी दुर्लभ वन्य जीव को देखा. जंगल सफारी और बर्डिंग ट्रेल के दौरान अचानक इस गिलहरी का दिखाई देना पूरे कैंप का सबसे रोमांचक क्षण बन गया. प्रकृति विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अनुभव बच्चों और युवाओं में पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं.
इस प्रजाति के पक्षी को मैंने पहली बार 1995 में बारनवापारा और कोठारी के बीच जंगल में देखा था, उसके बाद और नहीं देख पाया हूं. गांव में इस पक्षी को उड़न गिलहरी या कलबिलार भी बोलते हैं: दिनेश ठाकुर, ग्रामीण मोहदा, बारनवापारा

संरक्षण की जरूरत क्यों?
अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ यानी IUCN ने जायंट मालाबार स्क्विरल को “Least Concern” श्रेणी में रखा है, लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जंगलों की कटाई और आवास विखंडन इसके लिए खतरा बन सकते हैं। भारत में यह प्रजाति वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की अनुसूची-II के अंतर्गत संरक्षित है.
⦁ इसका शिकार प्रतिबंधित है.
⦁ व्यापार करना अपराध है.
⦁ नुकसान पहुंचाने पर कानूनी कार्रवाई हो सकती है.
प्रकृति पर्यटन को भी मिलेगा बढ़ावा
जानकार तनुजा राय चौधरी का मानना है कि यदि इस तरह के वन्यजीव अवलोकन लगातार सामने आते रहे, तो भविष्य में यह क्षेत्र इको-टूरिज्म और बर्डिंग गतिविधियों का बड़ा केंद्र बन सकता है. देवपुर जंगल और बारनवापारा अभयारण्य पहले से ही प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करते हैं. अब जायंट मालाबार स्क्विरल जैसी दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी इस क्षेत्र को और खास बना सकती है.

