ग्रांट इन एड पाना निजी शिक्षण संस्थानों का मौलिक अधिकार नहीं, हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की विशेष अपील मानी
कोर्ट ने कहा कि शिक्षकों को तभी वेतन दिया जा सकता है, जब उनकी नियुक्ति विधिसम्मत प्रक्रिया एवं निर्धारित योग्यता के अनुरूप हो.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : January 6, 2026 at 10:03 PM IST
प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि राज्य सरकार से ग्रांट इन एड (वित्त पोषित होना) निजी विद्यालयों का मौलिक अधिकार नहीं है. कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की विशेष अपीलों का आंशिक रूप से निस्तारण करते हुए यह स्पष्ट किया है कि निजी मान्यता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों को राज्य सरकार से अनुदान (ग्रांट-इन-एड) या वेतन भुगतान का कोई स्वतः अथवा मौलिक अधिकार प्राप्त नहीं है. यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति अरुण कुमार की खंडपीठ ने दिया.
विशेष अपील में वर्ष 2022 के एकल न्यायाधीश के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति के विद्यार्थियों की अधिक संख्या वाले कुछ निजी प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षण एवं शिक्षणेत्तर कर्मचारियों को अनुदान एवं राज्य सरकार के खजाने से वेतन भुगतान का निर्देश दिया गया था.
राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने दलील दी कि निजी प्रबंधन द्वारा संचालित प्राथमिक विद्यालयों को आवर्ती अनुदान देने की नीति को वर्ष 2006 में ही वापस ले लिया गया था और अनुदान देना सरकार की नीतिगत विवेकाधीन शक्ति का विषय है, न कि कोई कानूनी अधिकार.
न्यायालय ने विचार के लिए यह प्रश्न निर्धारित किया कि क्या संविधान के अनुच्छेद 21-ए एवं शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 राज्य को सभी निजी मान्यता प्राप्त प्राथमिक विद्यालयों को वित्तीय सहायता देने के लिए बाध्य करते हैं, क्या ऐसे विद्यालयों को अनुदान का कोई मौलिक अधिकार प्राप्त है, क्या 1975 के भर्ती नियमों का पालन किए बिना नियुक्त शिक्षकों को राज्य कोष से वेतन का दावा करने का अधिकार है, तथा क्या पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णय या पूर्व में दिए गए अनुदान ऐसे विद्यालयों के पक्ष में कोई बाध्यकारी अधिकार उत्पन्न करते हैं.
इन सभी प्रश्नों का उत्तर देते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्य बच्चों को 6 से 14 वर्ष की आयु तक निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है, किंतु यह दायित्व सभी निजी प्राथमिक विद्यालयों को वित्तीय सहायता देने तक विस्तारित नहीं होता. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी संस्थानों को अनुदान का कोई मौलिक अधिकार नहीं है और शिक्षकों को तभी वेतन दिया जा सकता है, जब उनकी नियुक्ति विधिसम्मत प्रक्रिया एवं निर्धारित योग्यता के अनुरूप हो. कोर्ट ने यह भी कहा कि पूर्व के निर्णय केवल सहायता प्राप्त संस्थानों से संबद्ध प्राथमिक अनुभागों पर लागू होते हैं, न कि स्वतंत्र रूप से संचालित, अनुदान-विहीन प्राथमिक विद्यालयों पर.
हालांकि, कोर्ट ने बलिया स्थित उस विद्यालय के संबंध में राज्य सरकार के निर्णय को बरकरार रखा, जिसकी अनुदान संबंधी मांग वर्ष 1997 से लंबित चली आ रही थी और जिसे बाद में स्वीकृति प्रदान की गई. साथ ही, कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि उक्त विद्यालय में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मचारियों को वेतन भुगतान तभी किया जा सकेगा, जब उनकी नियुक्तियां विधि के अनुरूप तथा निर्धारित शैक्षिक योग्यताओं के आधार पर पाई जाएं. दूसरे स्कूलों के लिए भी यह निर्देश दिया गया था कि सैलरी तभी जारी की जाएगी जब नियुक्ति की वैधता और नियुक्त किए गए लोगों की ज़रूरी अहर्ता का सत्यापन कर लिया जाए.
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