इतनी गरीबी..8 दिन पुरानी रोटी और महुआ खाकर बिहार पुलिस में कांस्टेबल बना सुभाष मांझी
गया के सुभाष मांझी की कहानी जिसने, भीषण गरीबी, भूख और बंधुआ मजदूरी के संघर्षों को हराकर बिहार पुलिस में सिपाही बना.

Published : June 1, 2026 at 4:12 PM IST
गया: जिम्मेदार मांझी के पास टूटा-फूटा मिट्टी का एक घर है. आज इस मिट्टी के घर में इतनी खुशी है, जितनी खुशी महलों में रहने वाले लोगों को भी नहीं मिलती. गया के बांके बाजार प्रखंड के खड़ार खजूरिया गांव निवासी सुभाष कुमार के पिता जिम्मेदार मांझी, मां रमिया देवी और भाई रवि रंजन कुमार की आंखों में खुशी के आंसू हैं. गांव के लोग भी गर्व महसूस कर रहे हैं, जो कभी जिम्मेदार मांझी को अपने बेटे सुभाष से मजदूरी कराने के लिए कहते थे, ताकि घर की आर्थिक तंगी दूर हो सके. लेकिन इस परिवार ने संघर्ष का रास्ता चुना.
भूख और तंगी के बीच पढ़ाई: बिहार पुलिस में सिपाही के पद पर चयनित सुभाष कहते हैं कि 'मेरा यह सफर आसान नहीं था. इंटर की जब पढ़ाई कर रहे थे तब कई दिनों तक भूखे रहना पड़ता था, क्योंकि हॉस्टल के मेस में भोजन करना आसान नहीं था. इसके लिए पैसे देने पड़ते थे, जो मेरे पास नहीं थे. कई दिनों तक खाना नहीं खाता था. भूखे रहने से हिम्मत टूट जाती थी. दोस्तों से 20-25 रुपए उधार लेकर घर आता था. यहां से महुआ, सत्तू, नमक और रोटी बनवाकर लेकर जाता था.
"सूखी रोटी को पूरे सप्ताह संभाल कर रखता था. जब भूख लगती थी तो पानी में भींगो इसी को खाता था. इसके अलावा सत्तु और महुआ से काम चला लेता था. यहां तक पहुंचने के लिए काफी मेहनत करना पड़ा." -सुभाष मांझी, बिहार पुलिस में चयनित सिपाही
गांव के पहले सिपाही बने सुभाष: गया जिला मुख्यालय से मात्र 70 किलोमीटर दूर खड़ार खजूरिया गांव है. खड़ार खजूरिया गांव में लगभग 200 घरों की आबादी होगी, इस में 60 घर मांझी यानी 'मुसहर' समाज के हैं. इन में एक घर जिम्मेदार मांझी का भी मिट्टी-फूस का घर है. जिम्मेदार मांझी के परिवार में क्या, गांव में इससे पहले कोई पुलिस की नौकरी में नहीं गया है. पिछले दिनों जब बिहार पुलिस सिपाही भर्ती का परिणाम घोषित किया गया तो उस में सुभाष कुमार भी सफल हुए. गांव-परिवार के लोग सुभाष के संघर्ष को याद करने लगे.
आजादी के बाद मिला पहला गौरव: सुभाष जिस गांव से आते हैं, वहां के लोग गर्व महसूस कर रहे हैं. कहते हैं कि भले ही बड़े और विकसित गांव के लोगों के लिए ये नौकरी बड़ी नहीं हो, मगर जिस समाज और गांव के बेटे ने नौकरी पाई है, उसके लिए ये पद भी किसी अधिकारी से कम नहीं है. गांव का कोई युवक आजादी के बाद पहली बार पुलिस सेवा में चयनित हुआ है. मुसहर का एक बेटा पुलिस जवान बना है.
बंधुआ मजदूरी से लड़कर मिली जीत: सुभाष की नौकरी सिर्फ आर्थिक तंगियों की वजह से ही खास नहीं है, बल्कि कई और ऐसी परिस्थितियां थीं जो इस सफलता को खास बनाती हैं. मुसहर समाज से संबंध रखने वाले परिवार ने अपने बेटे को न सिर्फ पढ़ाया बल्कि बंधुआ और बाल मजदूरी के साथ नक्सलियों के साए से दूर भी रखा. पिता वर्षों तक 2 रुपए में बंधुआ मजदूरी की तरह काम करते रहे. लेकिन हिम्मत नहीं हारी कि वे बेटे को पढ़ाई से दूर रखें.

सत्ता वाले मांझी नहीं, हम संघर्ष वाले मांझी हैं: सुभाष कुमार मांझी ईटीवी भारत से विशेष बातचीत करते हुए अपने संघर्षों को याद कर भावुक हो जाते हैं. उनके पास बोलने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं. वो कहते हैं, सर इस क्षेत्र में हमारे समाज के लिए पढ़ाई करना आसान नहीं था. 'मांझी मतलब वो मांझी (जीतन राम मांझी) नहीं जो सत्ता में बैठे हैं, मांझी मतलब हम लोग हैं जो दिन रात संघर्ष कर रहे हैं ताकि वो परिवार को एक समय का भोजन दे सकें. शिक्षा तो दूर खाने पीने के लाले पड़ जाते हैं.'
शिक्षा की असली परिभाषा और गांव के हालात: ऐसे में सोचिए कि उच्च शिक्षा कहां तक संभव है? सिर्फ साक्षर होना ही किसी समाज के विकसित होने की गारंटी नहीं है. शिक्षित होने का मतलब हमारे समाज में मैट्रिक पास होना ही समझा जाता है, लेकिन हमारी नजर में शिक्षित होने की परिभाषा कम से कम ग्रेजुएट होना जरूरी है, ताकि आप कोई अच्छी नौकरी हासिल कर सकें. आज भी सुदूरवर्ती क्षेत्रों में चले जाएं, जहां मांझी समाज के लोग कुछ की ही संख्या में ग्रेजुएट मिलेंगे. गांव की स्थिति बेहद खराब है.
संघर्ष से पीजी तक का सफर: सुभाष कुमार मांझी बताते हैं कि मैट्रिक तक की पढ़ाई तो उन्होंने अपने गांव खजूरिया से की, मगर आगे की पढ़ाई उन्होंने गयाजी शहर में रहकर की है. वह बताते हैं कि 2019 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद घर के लोगों की आर्थिक तंगियों को देखकर काम करने का इरादा बना लिया था, क्योंकि परिवार इतना सक्षम नहीं था कि शहर में किराए के रूम में रखने का भी खर्च दे सके. लेकिन तभी किसी ने हॉस्टल के बारे में बताया. उसी हॉस्टल से 2021 में एसएमएसजी कॉलेज शेरघाटी से 12वीं किया, 2024 में उनका ग्रेजुएशन गया कॉलेज गया जी से फाइनल हुआ, जबकि पीजी 2024 -26 सेशन में मगध विश्वविद्यालय से किया.
"एक साथी ने शहर में एससी-एसटी हॉस्टल के संबंध में जानकारी दी. मैंने ऊपरी मन से वहां रहने के लिए आवेदन कर दिया. हॉस्टल अलॉट भी हो गया. मुझे डर था कि घर वाले मुझे कहीं आगे की पढ़ाई करने से रोक न दें. इसलिए मैं घर से सिर्फ किताबें लेकर भाग गया, तब मेरे पास सिर्फ 50 रुपये थे." - सुभाष मांझी, बिहार पुलिस में चयनित सिपाही

मुश्किलों के बीच पूरी की उच्च शिक्षा: गयाजी में रहकर सुभाष मांझी ने पॉलिटिकल साइंस में पोस्ट ग्रेजुएट तक की पढ़ाई मगध विश्वविद्यालय से की है, लेकिन इस दौरान उन्हें हजारों बार कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. सुभाष बताते हैं कि जब वह घर से गए थे तब वहां उन्हें कोई सहायता करने वाला भी नहीं था. घर से पैसे भी उस समय नहीं मिले थे, मेरे भागने पर घर वाले परेशान थे कि मैं कहां चला गया.
परिवार का साथ और रेंगते हुए मिली सफलता: सुभाष बताते हैं कि, मैं किसी तरह एक महीना समय गुजार कर घर वापस आया और अपने माता-पिता को कॉलेज में नामांकन करने की बात बताई, उसी दौरान मेरे पिता और बड़े भाई ने कहा कि 'तुम जी लगाकर पढ़ाई करो, हम लोग घर-बार चलाने और तुम्हारी कुछ मदद करने के लिए दिन-रात मेहनत करेंगे.' सुभाष के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि, उन्होंने बिहार पुलिस में दौड़कर नहीं बल्कि रेंगते हुए यह सफलता हासिल की है.
पिता का बोझ कम करने के लिए पढ़ाया ट्यूशन: अपने संघर्ष को याद कर कहते हैं कि मैंने पिता का बोझ कम करने के लिए ट्यूशन पढ़ाया. पीजी तक पढ़ाई करने के साथ आईटीआई भी किया है, ताकि मैं कुछ हुनर सीख कर नौकरी कर सकूं. मुझे अच्छी निजी नौकरी भी मिल जाती, लेकिन मेरे परिवार का जोर था कि तुम्हें सरकारी नौकरी हासिल करनी है. मेरा भी लक्ष्य था कि मैं कम से कम दरोगा की नौकरी हासिल करूं.
"पढ़ाई के दौरान से ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया था जिससे 1000-1500 रुपये महीने में आ जाते थे. बिहार पुलिस के सिपाही की नौकरी इसलिए ज्वाइन की है ताकि कुछ आर्थिक रूप से परिवार को सहयोग होता रहे, लेकिन मैंने अभी अपने लक्ष्य को पूरा नहीं किया है. मेरी पढ़ाई जारी रहेगी. मेरा लक्ष्य है कि मैं बीपीएससी पास करूं या बिहार पुलिस में ही सब इंस्पेक्टर बनूं." - सुभाष मांझी, बिहार पुलिस में चयनित सिपाही

नक्सली खौफ और बिना मोबाइल का वो दौर: सुभाष की मां रमिया देवी अपने बेटे की सफलता से इतनी खुश हैं कि उनके चेहरे की मुस्कान रुक नहीं रही, लेकिन अंदर से वह अपने और बेटे के संघर्ष को भी याद करती हैं. जब सुभाष गया में हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे थे, उस समय को याद कर मां कहती हैं कि..'तब हमारे घर में मोबाइल फोन नहीं थे और न ही गांव में टावर था. डाकिया भी नक्सलियों के डर से नहीं आते थे, कि मेरा बेटा शहर से पत्र लिखकर कुछ मंगवा लेता.
नमक-भात और मकई का घट्ठा खाकर काटी रातें: जब सामान ले जाना होता था तब सुभाष खुद घर आता था. मैं यहां से पूरे सप्ताह के लिए रोटी बनाकर देती थी. कमजोरी न हो इसलिए महुआ भूनकर देती थी. रमिया देवी ने बताया कि उनके साथ-साथ उनके बच्चों ने भी काफी संघर्ष किया. नमक-भात, मकई का घट्ठा (उबला हुआ मकई) खाते थे. जो हम लोग खाते थे, वही बाल-बच्चा भी खाता था. इसी तरह संघर्ष करते हुए आज नौकरी मिली है. आज उसकी सफलता से मुझे बहुत खुशी है.
"मेरा बेटा बड़ी कठिनाइयों से पढ़ा है. वह आता था तो कभी-कभी रोता भी था कि हमारी स्थिति ऐसी क्यों है, बेटे को रोते देख कर एक मां का कलेजा फट जाता था, लेकिन कर भी क्या सकते थे. पति का नाम जिम्मेदार है और उन्होंने अपने नाम के अनुरूप जिम्मेदारी उठाई भी है. कड़ी धूप में भी वह नंगे पांव ही काम करते थे." - रमिया देवी, मां

2 रुपये दिहाड़ी और पिता का त्याग: सुभाष के पिता जिम्मेदार मांझी कभी भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं भागे. सुभाष की सफलता में इनका भरपूर सहयोग मिला. बेटे की पढ़ाई-लिखाई चलती रहे, इसके लिए उन्होंने 30-30 दिनों तक काम किया. शुरुआत में 2 रुपये रोजाना यानी 60 रुपये प्रति माह मजदूरी मिलती थी. धीरे-धीरे यह मजदूरी बढ़कर 300 रुपये महीना हुई. इसी में बेटे की पढ़ाई के साथ-साथ बेटी की शादी की भी जिम्मेदारी थी. इसी 300 रुपये की कमाई से उन्होंने घर चलाया. कभी अपने ऊपर पैसे खर्च नहीं किए.
"10 सालों तक चप्पल जूता नहीं पहने. कहते थे कि 100-50 अपने में क्यों खर्च करूं, बेटा-बेटी को पढ़ाने में आज लगाऊंगा तो कल परिवार में खुशहाली आएगी. अपने बच्चों पर भरोसा है. - सुभाष मांझी, बिहार पुलिस में चयनित सिपाही
मालिकों के बच्चों को देखकर मिला हौसला: पिता बताते हैं कि सुभाष बचपन से ही पढ़ने में तेज था, हम मजदूर जरूर थे, लेकिन जहां भी मजदूरी की वहां अपने मालिकों के बच्चों को पढ़ते देखकर मेरा हौसला बुलंद होता था. मैं भी सोचता था कि मेरे भी बच्चे पढ़ें और मेरा नाम रोशन करें. जिनके घरों में मैंने मजदूरी की है आज वे मेरे बेटे की सफलता के लिए मुझे बधाई दे रहे हैं, इससे बड़ी बात मेरे लिए क्या होगी?
"मैंने 2 रुपये में एक तरह से कहा जाए तो बंधुआ मजदूरी भी की है. रिक्शा चलाया, फैक्ट्री, होटल, खेत-खलिहान, मकान, दुकान का काम किया. मैं अपने बड़े भतीजे और छोटे बेटे को भी उस मुकाम तक पहुंचाने के लिए मेहनत करूंगा. इसके लिए मैं अभी मजदूरी करना नहीं छोडूंगा. नाम अगर जिम्मेदार है तो काम भी जिम्मेदारी का ही करता हूं." - जिम्मेदार मांझी, सुभाष के पिता
नक्सलवाद का साया और समाज का शक: सुभाष के बड़े भाई रवि रंजन कुमार कहते हैं कि उनका क्षेत्र कभी नक्सल प्रभावित रहा है. यहां बुनियादी सुविधाओं की भी कमी थी. प्रारंभिक शिक्षा तो गांव में मिल जाती थी लेकिन उसके आगे की पढ़ाई के लिए संघर्ष करना पड़ता था. बाहर जाते थे तो नक्सल क्षेत्र से आने की बात सुनकर लोग शक की निगाह से देखते थे.
अंधेरा छटा और आई रोशनी की नई उम्मीद: तब माता-पिता कहते थे कि बेटा एक दिन अंधेरा छटेगा और रोशनी आएगी, आज वाकई रोशनी की उम्मीद बढ़ गई है. क्षेत्र में लगातार बदलाव हो रहा है. हम गरीब और पिछड़े समाज के बच्चे भी अच्छा कर रहे हैं. हमारे गार्जियन ने अच्छी शिक्षा दिलाई है. 'भूखे-प्यासे रहना हमारे लिए बड़ी बात नहीं है, हमारे लिए तो पढ़ना-लिखना बड़ी बात है. आज मेरे भाई ने सफलता प्राप्त की है. आगे भी करेंगे. आशा है कि वो एक दिन अधिकारी बनेगा.'
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