किसी के पिता मजदूर तो कोई बुनकर, ऐसी है जेईई मेन्स में सफल पटवा टोली के छात्रों की कहानी
गया के पटवा टोली में 100 से अधिक छात्र जेईई मेन्स में सफल हुए हैं. छात्रों ने गरीबी से निकलने का सफर शुरू कर दिया..है-


Published : February 22, 2026 at 6:30 PM IST
गया : बिहार के गया में पटवा टोली के छात्रों ने एक बार फिर से जेईई मेन्स 2026 में बाजी मारी है. छात्र-छात्राओं ने जेईई मेन्स में पहले अटेम्प्ट की परीक्षा में शानदार प्रदर्शन किया है. पिछले दिनों जब एनटीए ने जेईई मेन्स का रिजल्ट घोषित किया तो सब से ज्यादा खुशी और जश्न पटवा टोली में मनाया गया, क्योंकि यहां की सफलता खास होती है. यहां की सफलता गरीबी से निकलने की नई राह होती है, जिसके सफर को खुद छात्र अकेले तय करते हैं. पटवा टोली ने फिर से कमाल किया है.
100 से अधिक परीक्षार्थी सफल : इस बार भी बिहार में आईआईटियन के गांव के रूप में प्रसिद्ध पटवा टोली का जलवा देखने को मिला है. हर साल यहां के 100 से अधिक छात्र-छात्राएं इस कठिन परीक्षा में अच्छे परसेंटाइल से सफल होते हैं. इस बार भी यहां का रिजल्ट अच्छा रहा है, अकेले वृक्ष संस्थान से पढ़ने वाले लगभग 30 छात्र-छात्राएं सफल हुए हैं. पटवा टोली में फिर से अच्छी सफलता के कारण जश्न का माहौल है, छात्रों के साथ उनके माता पिता और गुरुओं को बधाई दी जा रही है.
हासिल की गरीबी में सफलता : स्थानीय युवक राजू कहते हैं कि पटवा टोली के छात्रों की सफलता पर लोगों को खुशी क्यों ना हो? यहां से पढ़ कर सफलता प्राप्त करने वाले अधिकतर छात्र बेहद साधारण परिवार से संबंध रखते हैं. इस बार भी सफलता पाने वालों में किसी के पिता घर-घर जाकर मजदूरी करते हैं, तो किसी के पिता खेत कारखाने में मजदूरी करते हैं. घर की आर्थिक स्थिति ऐसी खराब है कि माता-पिता दोनों को ही मजदूरी करनी पड़ रही है. वृक्ष बी द चेंज के संस्थापक चंद्रकांत पाडेशवरी कहते हैं कि इनकी सफलता दूसरे छात्रों के लिए प्रेरणा है.
50 से अधिक सफल : वृक्ष संस्थान में पढ़ने वाले 40 छात्र छात्राओं ने परीक्षा दी थी, इस में लगभग सभी सफल हो गए हैं, 25 से ज्यादा का परसेंटाइल 85% से ज्यादा है, जबकि अन्य संस्थाओं और सेल्फ स्टडी कर तैयारी करने वाले भी सफल हुए हैं, इनमें वृक्ष बी द चेंज से पढ़ कर सफलता प्राप्त करने वालों में अगस्त्या 99.76%, अदरीजा 99.00%, संपदन 98.87%, ओम 97.65%, आकांक्षा 97.23% , प्रतीक 96.71%, मनीषा 96.67%, राहुल 95.68% , तनाव 94.35%, समीर 94.07%, मिहिका 93.50%, विद्या ने 93.33% परसेंटाइल प्राप्त कर सफल हुई है इसके अलावा कोई और छात्र हैं जो 80 से 90 परसेंटाइल के बीच में सफल हुए हैं.

फाइनल में करेंगे और बेहतर प्रदर्शन : ईटीवी भारत के प्रतिनिधि ने जब इंजीनियरों के कारखाना कहे जाने वाले उद्योग वस्त्र के लिए प्रसिद्ध मैनचेस्टर आफ बिहार पटवा टोली का दौरा किया तो वहां स्थित 'वृक्ष संस्था' के छात्रों से बात की, छात्रों ने कहा कि वह और भी अच्छे प्रदर्शन के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं, साथ ही वह उन छात्रों को भी सहयोग कर रहे हैं, जिनका इस बार किसी कारण अच्छा परसेंटाइल नहीं बन पाया था. अगली परीक्षा में वह भी अच्छे परसेंटाइल और रैंक से सफल होंगे, इसके लिए हम सब कोशिश कर रहे हैं.
1991 से हुई शुरुआत : पटवा टोली में इंजीनियरों के बनने की शुरुआत साल 1991 से होती है, तब पटवा टोली सिर्फ गमछा धोती चादर साड़ी और अन्य कपड़े की बुनाई के लिए ही प्रसिद्ध रहा था. लेकिन इसके बाद से यहां की पहचान मेनचेस्टर ऑफ़ बिहार के साथ इंजीनियरों के कारखाने के रूप में भी होने लगी. हर साल मानो बाढ़ आने लगी. हर साल यहां के छात्र आईआईटी के सपने को पूरा करने के लिए सफल होते गए, हालांकि यह सिर्फ छात्रों की अकेले की मेहनत नहीं रही, बल्कि उनके माता-पिता के साथ समाज के बुद्धिजीवियों और नई सोच वाले युवाओं का भी अहम योगदान रहा है. साल 2013 में यहां वृक्ष नामक संस्था की शुरुआत हुई, जिसने छात्र-छात्राओं को निशुल्क इंजीनियरिंग की परीक्षा की तैयारी कराई.

मनीषा की सफलता की कहानी : जेईई मेंस की पहली परीक्षा में सफलता हासिल करने वाली मनीषा कुमारी को 96 परसेंटाइल प्राप्त हुए हैं, उनकी सफलता की कहानी भी हैरान करने वाली है, ईटीवी भारत से बातचीत में मनीषा कहती है कि जब पिता को घर-घर जा जाकर मजदूरी करते देखती थीं तभी से यह तय कर लिया था कि वह कुछ बड़ा करेंगी, उन्होंने इंजीनियर बनने का सपना देखा है, पहली सीढ़ी ही अभी चढ़े हैं अभी और भी लंबा सफर तय करना है.
''12 घंटे से अधिक समय तक मेहनत कर इस परीक्षा में सफल हुई हूं, आगे और मेहनत कर रही हूं, साथ ही अभी मैं 12 वीं की परीक्षा के लिए खुद को तैयार किया है. मैं चाहती हूं कि मुझे आईआईटी मुंबई या आईआईटी दिल्ली मिले.''- मनीषा, जेईई मेंस में सफल परीक्षार्थी
बुनकर का बेटा बनेगा इंजीनियर : सौरभ कुमार को 95.6 परसेंटाइल प्राप्त हुए हैं, उनके पिता पटवा टोली में ही कारखाने में बुनकर मजदूर का कार्य करते हैं. वह मशीनों के मिस्त्री भी हैं, सौरभ कहते हैं कि उनके भाइयों ने भी पहले मेहनत की थी लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली. इस परीक्षा की तैयारी इस बार वो कर रहे थे जिसमें उन्हें अच्छा परसेंटाइल मिला है. आगे कोशिश कर रहे हैं इससे और भी अच्छा रिजल्ट हमारे पक्ष में हो, उन्होंने कहा कि यहां संस्था में उन्हें पढ़ने के लिए हर तरह से सहयोग किया गया है.
पिता करते हैं खेत में काम : वृक्ष संस्थान में पढ़ने वाली आकांक्षा कुमारी गुप्ता भी सफल हुई हैं, उन्हें 97.2 परसेंटाइल प्राप्त हुए हैं, आकांक्षा के पिता खेत में काम करते हैं, हालांकि आकांक्षा पटवा टोली की नहीं रहने वाली हैं. वो पास के ही गांव की रहने वाली है लेकिन पढ़ने वो वृक्ष संस्था पहुंचती थीं. आकांक्षा कहती हैं कि उनके बड़े चाचा के बेटे इंजीनियर हैं वो उन्हें देख कर ही इंजीनियर बनना चाहती थीं. दूसरी वजह ये थी कि उसका मैथ अच्छा था, उसे बायलॉजी में कोई इंटरेस्ट नहीं था.
असफल छात्र ना हों मायूस : वृक्ष संस्थान के संस्थापक चंद्रकांत पाडेशवरी कहते हैं कि पटवा टोली के छात्रों की सफलता हर साल इसलिए अच्छी होती है क्योंकि यहां के छात्र ग्रुप स्टेडी करते हैं. वो अनगिनत सवाल को हल करते हैं. वो दो सालों में इतने माहिर हो जाते हैं कि सवालों का जवाब आंख बंद कर दे सकते हैं. उन्होंने पहले अटेम्प्ट में असफल हुए छात्रों का हौसला बढ़ाते हुए उन्हें सलाह दी है कि वह अभी भी टाइम टेबल बनाकर नियमित रिवीजन करते रहें. मानसिक दबाव जरा सा भी ना लें, जो छात्र सफल हुए हैं उनके लिए आगे का रास्ता खुला हुआ है.
''कोई भी छात्र मेरे संस्था में आकर अगले अटेम्प्ट में किस तरह से अपने को शांत कर अच्छा परफॉर्मेंस करें, उसके लिए मुझसे टिप्स ले सकता है. लेकिन मेहनत और कोशिश उन्हें ही करनी होगी, हम सिर्फ उन्हें सलाह दे सकते हैं. लगातार भी पढ़ें तो पूरी ध्यान से पढ़ें. जब तक आप प्रश्नों को नहीं समझेंगे तब तक उसका सही उत्तर नहीं दे पाएंगे.'' - चंद्रकांत पाडेशवरी, संस्थापक, वृक्ष संस्थान
चार दशकों का सफर : वृक्ष के चंद्रकांत पाडेशवरी कहते हैं कि जेईई मेंस या एडवांस में सफलता प्राप्त करने का सिलसिला पिछले तीन-चार दशकों से चल रहा है. कई छात्र-छात्राए हैं जो खुद इंजीनियरिंग कॉलेज में अपनी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन वह यहां के जरूरतमंद बच्चों की शिक्षा के लिए उन्हें अपना कीमती वक्त निकाल कर ऑनलाइन क्लास लेते हैं. बड़े कॉलेज में रहने की वजह से उन्हें कई तरह के आइडिया भी मिलते हैं जो इन बच्चों से वह शेयर करते हैं, जो इनके लिए मददगार होता है.
क्यों चर्चा में है पटवा टोली : पटवा टोली बिहार का मैनचेस्टर के रूप में जाना जाता है. यहां घर-घर सूत कातने और मशीनों के द्वारा कपड़े बुनने का काम होता है. दशकों पहले यहां का कपड़ा उद्योग शुरू हुआ था. 20000 की आबादी वाले इस गांव में 8000 के करीब पावर लूम और 1000 के करीब हैंडलूम चलते हैं. 50 हजार से अधिक लोगों को ये गांव बेरोजगारों को रोजगार दिए हुए है.
कपड़े ही नहीं इंजीनियर भी बनाते हैं : खट खट की आवाज में सिर्फ कपड़े नहीं बनते हैं बल्कि यहां के बच्चे उस आवाज में इंजीनियर भी बना रहे हैं. 1992 से पढ़ाई की शुरुआत ने यहां क्रांति लाई है. सबसे पहले 1992 में जितेंद्र कुमार नामी व्यक्ति आईआईटी की परीक्षा दिए थे, उनकी सफलता को देखकर सिलसिला शुरू हुआ जो आज भी बरकरार है. जितेंद्र वर्तमान में अमरीका में बड़े पद पर कार्यरत हैं. यहां की युवाओं के लिए जितेंद्र समेत कई और लोग हैं जो उनके आइडियल और प्रेरणा स्रोत हैं. जेईई मेन्स पहले अटेम्प्ट में सफलता प्राप्त करने वाले छात्रों का कहना है कि उनका लक्ष्य अब एडवांस के लिए लगा हुआ है.
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