बिहार के इस गांव में 4 महीने तक ठप हो जाती है शिक्षा और स्वास्थ्य..कारण जान हो जाएंगे हैरान
गया जिले का एक ऐसा गांव, जहां 4 महीने तक शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा बंद हो जाती है, गया से सरताज अहमद की रिपोर्ट.

Published : July 7, 2026 at 7:17 AM IST
गया: इस गांव का नाम हीरोडीह है. नाम में भले हीरो लिखा जाता हो, लेकिन सुविधा जीरो है. आजादी के 78 साल बाद भी ग्रामीण बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं. गांव के 150 परिवारों की करीब 1,000 आबादी आज भी खुद को गुलाम महसूस करती है. बिजली-पानी, राशन और सड़क यहां की मूल समस्या है, जिस समस्या से आज तक लोगों को निजात नहीं मिली. आइये जानते हैं गांव की कहानी.
पक्की सड़क को तरसते ग्रामीण: हीरोडीह गांव गया शहर से मात्र 25-26 किमी दूर वजीरगंज प्रखंड मुख्यालय के केनार फतेहपुर पंचायत में आता है. 150 से अधिक घरों की आबादी में सभी लोग एससी-एसटी समुदाय से संबंध रखते हैं. लोग बताते हैं कि प्रखंड मुख्यालय से गांव तक आने के लिए दो तरफ से सड़क उपलब्ध है. लेकिन गांव तक दोनों तरफ से पहुंचने वाली सड़क आज भी कच्ची है. गांव के लोग आज भी एक अदद बेहतर सड़क को मोहताज हैं.
सरकारी दावों की खुली पोल: सरकारी दावों की पोल खोलता गांव के चंदन कुमार पिछले कई सालों से सड़क निर्माण कराने को लेकर संघर्ष कर रहे हैं. उन्होंने अपनी पढ़ाई-लिखाई छोड़कर सड़क के लिए आंदोलन शुरू किया है. सरकार और प्रशासन दावा करती है कि राज्य और जिले में सड़कों का जाल बिछा दिया गया है, किंतु यह स्थिति दावे को आइना दिखाती है. चुनाव के समय में प्रत्याशियों ने सड़क बनाने का वादा किया था, लेकिन जीत दर्ज करने के बाद एमएलए साहब दोबारा नहीं आए.
मानसून में मुख्यालय से टूट जाता है संपर्क: चंदन कहते हैं कि समस्या ऐसी है कि यदि वर्षा हो गई तो गांव में निवास करने वाली यह आबादी अपने ही प्रखंड मुख्यालय तक पहुंचने के लिए बड़ा संघर्ष करती है. उनके लिए यह सड़क अभिशाप के समान हो जाती है. ऐसा नहीं है कि यहां की स्थिति प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को मालूम नहीं है. सिर्फ वोट लेने आते हैं और चले जाते हैं.

"गांव की सूरत बदले इसलिए पिछले चुनाव में अपनी जाति को वोट दिया था. समझा था कि शायद हमारी स्थिति को समझ कर वे काम करेंगे लेकिन मुखिया ने भी पहल नहीं की. बारिश के समय स्थिति और खराब हो जाती है." -चंदन कुमार, ग्रामीण
तीन किलोमीटर दूर स्कूल जाना मजबूरी: रवि कुमार बताते हैं कि गांव में सिर्फ एक प्राथमिक विद्यालय शिक्षा के लिए उपलब्ध है. जबकि गांव से लगभग 3 किलोमीटर दूरी पर स्थित दूसरे गांव में मध्य विद्यालय है, जहां कक्षा 6 के छात्र पढ़ने जाते हैं. इसी कच्ची सड़क होकर उन्हें जाना पड़ता है. सड़क नहीं होने के कारण इस गांव की कक्षा 6 से पढ़ने वाली बच्चियों की पढ़ाई 4 महीने तक पूरी तरह बाधित हो जाती है. क्योंकि इस सड़क पर बारिश में जलजमाव हो जाता है. बच्चियां 3 किलोमीटर दूर अपने मध्य विद्यालय तक जाने में असमर्थ हो जाती हैं.

"बरसात के दिनों में उनकी शिक्षा पूरी तरह से ठप हो जाती है. छात्र चार महीने पढ़ने नहीं जाते थे, जिससे छात्रों की पढ़ाई बाधित होती है. हम जैसे युवा चार महीने अपना कामकाज छोड़कर गांव के छात्र-छात्राओं को घर पर ही ट्यूशन पढ़ाते हैं, ताकि उनकी पढ़ाई पर असर नहीं पड़े." -रवि कुमार, ग्रामीण
मैट्रिक पास लड़कियों की संख्या कम: सड़क नहीं होने की वजह से बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं. इस गांव में अब कुछ लोग पढ़कर मैट्रिक पास हुए हैं. लेकिन पहले तो 10 साल पूर्व कोई भी मैट्रिक पास नहीं था. अभी भी लड़कियों की संख्या कम ही है जिन्होंने मैट्रिक पास किया है. रास्ता खराब होने के कारण यहां दूसरे गांव के लोग भी नहीं पहुंचते हैं.

4 किमी की दूरी एक घंटे में तय: यही बात मुखिया प्रतिनिधि सुरेश मांझी भी कहते हैं. आजादी के बाद भी यहां सड़क नहीं बन सकी है. गांव के प्राथमिक विद्यालय के एक शिक्षक सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि गांव में आने में काफी कठिनाई होती है. उनके स्कूल का सीआरसी मुख्यालय तरवां गांव में है जिसकी दूरी लगभग 4 किलोमीटर है. लेकिन यह 4 किलोमीटर का सफर पूरे 1 घंटे में पूरा होता है, क्योंकि सड़क कच्ची है.
"गांव में आने के लिए दूसरी तरफ से रास्ता विशुनपुर पुनमा होते हुए जाता है, जिसकी दूरी लगभग 14 किलोमीटर है. इस प्रकार सफर बदल जाता है. विशुनपुर की तरफ से भी आएंगे तो विशुनपुर मोड़ से लगभग 1.5 किलोमीटर कच्ची सड़क है. हालांकि इस सड़क पर मोरम और बोल्डर बिछा हुआ है मगर बरसात में ये भी चलने लायक नहीं होता है." -सुरेंद्र कुमार, शिक्षक, प्राथमिक विद्यालय

कीचड़ भरे रास्तों पर हर दिन घायल होने का डर: आज़ादी के कई दशकों बाद भी यह बदहाल स्थिति वैसी ही बनी हुई है. बरसात में लोगों को पैदल ही जाना पड़ता है. सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि यहां बरसात के दिनों में लोग पूरी तरह से कठिनाइयों का सामना करते हैं. घायल होने का डर लगा रहता है. शिक्षक सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि हर दिन इस सड़क पर चलना चुनौती है.
कच्ची सड़क से रोजाना मजदूरी के लिए जाते हैं लोग: स्थानीय युवक रवि कुमार बताते हैं कि इस गांव से कई अन्य गांव जुड़े हैं, जिसमें किनार फतेहपुर, हमजा, तरवां, वजीरगंज और अन्य गांव हैं. गांव के लोग मुख्य रूप से मजदूरी पर आश्रित हैं, इसलिए उन्हें हर दिन इसी कच्ची सड़क से मजदूरी के लिए जाना पड़ता है. अभी गर्मी है इसलिए कच्ची सड़क सूखी हुई है, इस वजह से गांव तक टेंपो और ट्रैक्टर आसानी से आ जाते हैं.

सूखी गर्मी में आते हैं वाहन: यहां अभी भी इस रास्ते से कोई बड़ी या लग्जरी गाड़ी नहीं पहुंच पाती है. अगर गांव का यह मुख्य मार्ग बन जाता है तो आधा दर्जन से अधिक गांवों को लाभ होगा. हीरोडीह गांव में भले ही 1000 से अधिक आबादी हो मगर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है. बरसात में लोग मरीजों को खटिया पर टांगकर ले जाते हैं. आम दिनों में तो किसी तरह गांव में एंबुलेंस पहुंच जाती है.
बरसात में बंद हो जाती है एम्बुलेंस सेवा: बरसात के दिनों में दोनों रास्तों पर एंबुलेंस आना संभव नहीं होता है. स्थानीय महिला प्रभा देवी बताती हैं कि यहां बरसात के दिनों में एंबुलेंस या कोई अन्य वाहन नहीं आता. हम लोग अपने मरीज को खटिया पर टांगकर ही प्रखंड मुख्यालय स्थित अस्पताल लेकर जाते हैं. इस वजह से काफी कठिनाई होती है, कभी कभार मामला सीरियस हो जाता है.

अस्पताल पहुंचने से पहले हो रही मौतें: गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों की अस्पताल पहुंचने से पहले मृत्यु हो जाती है. त्वरित चिकित्सा नहीं मिलने से मौतें भी हो जाती हैं. प्रसव पीड़ा में महिलाओं की जान आफत में होती है. यहां आज भी अधिकतर महिलाओं का प्रसव घर में ही होता है. खासकर बरसात के दिनों में तो एक-दो ही मामले ऐसे आते होंगे जिन्हें अस्पताल तक पहुंचाया जाता है, बाकी का प्रसव घर पर ही होता है.
महीनों से बंद पड़ी नल-जल योजना मोटर: प्रभा देवी पूछती हैं कि आखिर कब तक हम इस संकट को झेलेंगे. पूरी गर्मी में एक चापानल के सहारे गांव के लोगों ने पानी की व्यवस्था की है. वो भी चापानल गांव के प्राथमिक विद्यालय में है. नल-जल योजना के तहत काम हुआ था, लेकिन नलजल मोटर कई महीनों से बंद पड़ा है. एक दूसरी बोरिंग भी हुई लेकिन वो आज तक शुरू नहीं हुई.
सिर्फ मिल रहा कोरा आश्वासन: वास्तविकता यही है कि नल-जल योजना फेल है. हीरोडीह में लगभग 3 किलोमीटर लंबी पक्की सड़क नहीं बनी है. स्थानीय मुखिया सरिता कुमारी के ससुर और उनके प्रतिनिधि उमेश कुमार मांझी कहते हैं कि हमने गांव में काम कराया है. 3 सालों पूर्व यहां गांव में पक्की गली भी नहीं थी. मैं खुद उस गांव में गिरकर घायल हो चुका हूं.
"हमने कई बार नलजल योजना के लिए पीएचईडी विभाग के अधिकारियों को सूचित किया है, मगर बस वहां से आश्वासन मिलता है. गांव में एक जगह पर दर्जनों महिलाएं खड़ी होकर पानी के लिए खुद बोरिंग कराती नजर आती हैं. नल-जल योजना है नहीं, भूजल स्तर भी नीचे चला गया है. एक ही सरकारी चापानल है." -उमेश कुमार मांझी, मुखिया प्रतिनिधि

नाकाफी साबित हो रहा चापानल: गांव में 150 घर हैं, कैसे पानी की सप्लाई होगी. इसलिए हम ग्रामीणों ने आपस में मिलकर चंदा करके निजी बोरिंग कराई है ताकि पानी मिल सके. अब तो उम्मीद भी छोड़ दी है, आखिर कब तक उम्मीद की जा सकती है. इतने साल तो गुजर गए हैं. बहरहाल हीरोडीह गांव आजादी के 78 साल बाद भी वैसा ही है.
आज भी तरस रहे ग्रामीण: यह गांव अपने नाम के अनुरूप नहीं हो सका है. इस गांव में कुछ लोगों ने उम्मीद छोड़ दी है तो कुछ को आज भी कुछ होने की आशा है. लोग अपनी व्यवस्था करने में खुद लगे हैं, लेकिन पेयजल, सड़क, गली-नाली, राशन कार्ड जैसी सरकारी सुविधाओं को लेकर चिंतित हैं.
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