गांव का नाम 'गुलाबी' पर विकास के रंग फीके, दुर्दशा देख उल्टे पांव लौट जाते हैं लड़की वाले
बिहार का एक ऐसा गांव जहां स्कूल और सड़क जैसी जरूरी सुविधाएं नहीं है, ऐसे में यहां कोई अपनी बेटी का ब्याह करना नहीं चाहता-

Published : February 21, 2026 at 6:20 PM IST
गया : बिहार के गया जिले में एक ऐसा गांव है जिसका नाम तो 'गुलाबी' है, लेकिन विकास के रंग यहां फीके पड़ चुके हैं. गया के अतरी प्रखंड अंतर्गत सहोड़ा पंचायत का 'गुलाबी गांव' आजादी के सात दशक बाद भी बुनियादी सुविधाओं की बाट जोह रहा है. यहां न ही सड़क है, ना तो स्कूल है और न ही बाजार और रोजगार के कोई अवसर हैं. नतीजा यह कि यहां युवकों की शादी नहीं हो पा रही है और अगर शादी हो भी रही है तो 30 से 35 साल के उम्र में. क्योंकि यहां लड़की वाले गांव की हालत देखकर उल्टे पांव लौट जाते हैं.
75 घर और 350 की आबादी : गुलाबी गांव में लगभग 75 घर हैं और आबादी करीब 350 है. छोटी सी बस्ती होने के बावजूद यहां गड्ढों और बोल्डरों से भरी जर्जर सड़क है. ग्रामीणों का कहना है कि सड़क बनी ही नहीं, इसलिए सड़क की चर्चा करना भी बेमानी है. करीब 10 वर्ष पहले सड़क निर्माण की पहल हुई थी, लेकिन ठेकेदार की हत्या के बाद काम अधर में लटक गया. तब से आज तक निर्माण पूरा नहीं हुआ.
गांव में कोई स्कूल नहीं : गांव में प्राथमिक या मध्य विद्यालय तक नहीं है. बच्चों को पढ़ाई के लिए 2 किलोमीटर दूर टेटुआ पंचायत के मध्य विद्यालय केवटी जाना पड़ता है. हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए 4 किलोमीटर से अधिक दूरी तय करनी पड़ती है.
''शिक्षा से हम लोग कोसों दूर रह गए. हमारा भविष्य पहले ही खराब हो चुका है. ठोस शिक्षा के अभाव में यहां कुछ लोग मैट्रिक पास करके रह गए, तो कुछ ही इंटरमीडिएट पास हुए हैं. अधिकांश की पढ़ाई छूट गई. यही वजह रही, कि इस गांव के किसी युवक को नौकरी नहीं है. यह दुर्भाग्य की बात है, कि यह स्थिति आजादी के बाद से है. सरकार कहती है, कि शिक्षा से कोई बच्चा वंचित नहीं होगा. किंतु हमारे गांव के हालात पर गौर किए जाएं, तो सरकार के दावे फेल होते नजर आते हैं.''- रामाश्रय प्रसाद, गुलाबी के ग्रामीण

बरसात में हालात भयावह : बरसात में हालात और खराब हो जाते हैं. गड्ढों में पानी भर जाता है. बच्चे भींगते हुए स्कूल पहुंचते हैं या फिर पढ़ाई छोड़ देते हैं. कई बच्चियां दूरी और असुरक्षा के कारण पढ़ाई से वंचित रह जाती हैं. बारिश के चलते परिजन अनहोनी की आशंका से अपने बच्चों को स्कूल भेजने में हिचकिचाते हैं.
''हमारे गांव में आठ-दस ही छात्र मैट्रिक पास हैं, इंटर पास तो इक्का-दुक्का ही हैं. किसी के पास सरकारी नौकरी नहीं है. हम सब परिस्थिति के मारे हैं.''- वीरेंद्र प्रसाद, ग्रामीण

नौकरी से कोसों दूर गांव : अत्यंत संवेदनशील गांव होने की वजह से गुलाबी गांव में शिक्षा का माहौल नहीं बन पाया. नियमित कक्षाएं नहीं हो पाने से बच्चे कमजोर रह जाते हैं. यहां के बच्चों का मैट्रिक पास करने के बाद भी भविष्य नहीं संवरता.
''जब पढ़ाई ही व्यवस्थित नहीं होगी तो नौकरी कैसे मिलेगी. आज तक गांव से कोई सरकारी सेवा में नहीं पहुंच पाया.''- उपेन्द्र प्रसाद, स्थानीय ग्रामीण

गांव में दुकान तक नहीं : सड़क नहीं होने के कारण गांव में एक भी दुकान नहीं है. कोई व्यापारी सामान लाने को तैयार नहीं. जरूरत का सामान लेने ग्रामीणों को 4 से 5 किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. आजादी के बाद से अब तक गांव में एक भी स्थायी दुकान नहीं खुली है.
युवाओं की शादी में भी संकट : गांव की सबसे बड़ी सामाजिक समस्या शादी को लेकर है. ग्रामीण बताते हैं कि रिश्ते देखने आने वाले कुटुंब गांव की हालत देखकर उल्टे पांव लौट जाते हैं. जब वह गांव में दाखिल होते हैं तो दरवाजे पर पहुंचने से पहले ही लड़का देखने वाले लौट जाते हैं.

इस गांव में बेटी देने को कोई तैयार नहीं : गुलाबी गांव में न सड़क, न स्कूल, न सुविधा. ऐसे में कोई अपनी बेटी यहां देने को तैयार नहीं होता. बड़ी मुश्किल से लड़कों की शादी 30 से 35 वर्ष की उम्र में हो पाती है. जिसकी शादी होती है वह बहुत ही लाचारगी में होती है. ग्रामीणों का कहना है कि लड़का पक्ष होने के बावजूद उन्हें गिड़गिड़ाना पड़ता है.
''हमारे यहां गांव में कोई लड़की वाले शादी विवाह नहीं करना चाहते हैं. यहां कोई अपनी बेटी नहीं देना चाहता. जो कुटुम्ब शादी के रिश्ते के लिए आते हैं, वह गांव की स्थिति देखकर उल्टे पांव भाग भागते हैं. किसी प्रकार से गिरकर हम अपने बच्चों की शादी करते हैं. सबसे ज्यादा प्रभावित लड़कों की ही शादी होती है.''- रामाश्रय प्रसाद, गुलाबी के ग्रामीण

बच्चों के सपने अधर में : यहां रहने वाले बच्चे पढ़ना चाहते हैं लेकिन कोई सुविधा नहीं मिलेगी तो क्या करेंगे? दूसरी कक्षा की छात्रा नेहा डॉक्टर बनना चाहती है. वह रोज स्कूल नहीं जा पाती क्योंकि दूरी और खराब रास्ता बड़ी बाधा है. बरसात में पढ़ाई लगभग ठप हो जाती है.
ऑफिसर बनना चाहता है बच्चा : चौथी कक्षा का छात्र प्रेम कुमार पुलिस ऑफिसर बनना चाहता है. वह कहता है कि सड़क और स्कूल नहीं होने से नियमित पढ़ाई संभव नहीं. इन हालात की वजह से बच्चों के सपने पूरे नहीं हो पा रहे हैं. यहां के बच्चों भी दूसरे बच्चों की तरह तेज-तर्रार हैं लेकिन अवसर नहीं मिल पाने की वजह से अंकुरित नहीं हो पा रहे हैं.

दूसरे पंचायत के विद्यालय पर बढ़ा बोझ : मध्य विद्यालय केवटी में पढ़ाने वाली शिक्षिका ममता मौर्य कहती हैं कि गुलाबी गांव में स्कूल होना जरूरी है. बच्चे लंबी दूरी तय कर जोखिम उठाते हैं. विद्यालय की खुद की चाहरदीवारी नहीं है और अफवाहों के दौर में अभिभावक चिंतित रहते हैं. केवटी के ग्रामीण भी मानते हैं कि गुलाबी के बच्चों के साथ अन्याय हो रहा है.
''हमारे यहां गुलाबी के काफी बच्चे पढ़ने आते हैं. सबसे बड़ी बात है, कि हमारे विद्यालय की चाहरदीवारी भी नहीं है. वहीं, बच्चा चोर की अफवाह भी है. ऐसे में न सिर्फ हम लोग काफी खासे परेशान रहते हैं. बच्चे जब घर पहुंच जाते हैं, तो हम लोग राहत की सांस लेते हैं.''- ममता मौर्य, टीचर, केवटी मध्य विद्यालय

विकास की बाट जोहता गांव : गुलाबी गांव में न पंचायत भवन है, न सामुदायिक भवन, न नल-जल की व्यवस्था. बस यहां के ग्रामीण वोट मशीन की तरह इस्तेमाल होते हैं. ग्रामीण वर्षों से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की ओर उम्मीद लगाए बैठे हैं, लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं है.
नाम गुलाबी पर विकास के रंग फीके : गुलाबी नाम सुनकर खुशहाली की तस्वीर उभरती है, लेकिन हकीकत इससे उलट है. जब तक शिक्षा और आधारभूत ढांचा मजबूत नहीं होगा, तब तक यहां के नौनिहालों का भविष्य और युवकों की सामाजिक स्थिति ऐसे ही संघर्ष करती रहेगी. जिम्मेदारों को चाहिए कि इसपर ध्यान दें.
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