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8 किलो का एक जिमीकंद! इस नई वैरायटी ने बदली किसानों की तकदीर, कम खर्च में ज्यादा मुनाफा

सिरमौर के किसान जिमीकंद की गजेंद्र वैरायटी की खेती कर अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं. कम खर्च में किसानों को अच्छी पैदावार मिल रही है.

Gajendra Jimikand
गजेंद्र जिमीकंद (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : December 23, 2025 at 3:15 PM IST

7 Min Read
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सिरमौर: हिमाचल प्रदेश में खेती अब केवल परंपराओं तक सीमित नहीं रही है, बल्कि नई तकनीक और बेहतर किस्मों के सहारे किसान अपनी आमदनी के नए रास्ते तलाश रहे हैं. वर्षों से जिस जिमीकंद की खेती को समय लेने वाली और कम फायदेमंद माना जाता था, वही फसल अब किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत जरिया बन रही है. गजेंद्र किस्म (हाइब्रिड वैरायटी) के जिमीकंद ने सिरमौर की मिट्टी में नई जान फूंक दी है. कम समय में अधिक उत्पादन, बेहतर बाजार मूल्य और प्राकृतिक खेती के अनुकूल होने के कारण यह किस्म तेजी से किसानों की पसंद बनती जा रही है.

आत्मा परियोजना के निदेशक डॉ. साहब सिंह (ETV Bharat)

जिला सिरमौर में जिमीकंद की खेती कोई नई बात नहीं है. लंबे समय से किसान स्थानीय किस्म (लोकल पारंपरिक वैरायटी) के जिमीकंद की खेती करते आ रहे हैं, लेकिन इसकी सबसे बड़ी समस्या यह थी कि इसे तैयार होने में लगभग तीन साल का समय लगता था और पैदावार भी सीमित रहती थी. इसके विपरीत गजेंद्र किस्म के जिमीकंद ने खेती की पूरी दिशा बदल दी है. पिछले करीब दो वर्षों में इस किस्म ने किसानों को यह भरोसा दिया है कि कम समय में भी अच्छी आमदनी संभव है.

प्राकृतिक खेती से जुड़कर बढ़ी उम्मीद

गजेंद्र किस्म का जिमीकंद अब प्राकृतिक खेती से जुड़कर किसानों के लिए फायदे का सौदा बन रहा है. इस किस्म की खासियत यह है कि इसमें रासायनिक खाद और कीटनाशकों की जरूरत नहीं पड़ती. गोबर खाद, जीवामृत और देसी तरीकों से इसकी खेती आसानी से की जा सकती है. इससे न केवल उत्पादन लागत कम होती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहती है. यही वजह है कि प्राकृतिक खेती करने वाले किसान तेजी से इस फसल की ओर आकर्षित हो रहे हैं.

कृषि विभाग के अंतर्गत आत्मा परियोजना ने इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. आत्मा परियोजना के निदेशक डॉ. साहब सिंह ने कहा, "करीब दो साल पहले विभाग ने गजेंद्र किस्म के जिमीकंद का बीज जिला सिरमौर के किसानों को उपलब्ध करवाया था. इसके बाद जो परिणाम सामने आए, वे बेहद उत्साहजनक हैं. वर्तमान में जिले में 25 से 30 किसान प्राकृतिक तरीके से इस किस्म की खेती कर रहे हैं और लगातार नए किसान इससे जुड़ते जा रहे हैं."

कम समय में ज्यादा उत्पादन

गजेंद्र किस्म के जिमीकंद की सबसे बड़ी खासियत इसका कम समय में तैयार होना है. डॉ. साहब सिंह ने अनुसार जहां स्थानीय जिमीकंद को तैयार होने में करीब तीन साल लगते हैं और वजन भी 3 से 4 किलो तक ही सीमित रहता है, वहीं गजेंद्र किस्म का जिमीकंद मात्र 6 से 9 महीने में तैयार हो जाता है. इसका वजन 8 से 9 किलो तक पहुंच जाता है, जो स्थानीय किस्म की तुलना में कई गुना अधिक है. यही कारण है कि किसान इसे भविष्य की फसल के रूप में देख रहे हैं.

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साधारण नहीं खास है गजेंद्र जिमीकंद (ETV Bharat GFX)

स्वास्थ्य के लिहाज से भी फायदेमंद

गजेंद्र किस्म का जिमीकंद केवल उत्पादन के मामले में ही बेहतर नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी लाभदायक माना जाता है. डॉ. साहब सिंह के अनुसार इसमें लगभग 5 प्रतिशत प्रोटीन, विटामिन सी और विटामिन बी-6 पाया जाता है. इसके अलावा इसमें पोटेशियम और मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में होता है, जो पाचन तंत्र को मजबूत करता है और बैड कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मदद करता है. जिमीकंद के पत्तों से पतोड़े, डंठल से बड़ियां और कंद से विभिन्न व्यंजन बनाए जाते हैं. हिमाचल में ऐसा पहले किसी ने नहीं किया, जिसने भी किया वो बहुरा गया है.

जंगली जानवरों से राहत

सिरमौर जिले में जंगली जानवर और आवारा पशु खेती के लिए बड़ी समस्या बने हुए हैं. कई फसलों को जानवर नुकसान पहुंचा देते हैं, जिससे किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. लेकिन गजेंद्र किस्म का जिमीकंद इस मामले में सुरक्षित फसल साबित हो रहा है. न तो जंगली जानवर इसे खाते हैं और न ही आवारा पशु इसे नुकसान पहुंचाते हैं. जंगल से सटे इलाकों में रहने वाले किसानों के लिए यह फसल बेहद उपयोगी साबित हो सकती है.

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किसानों के लिए क्यों फायदेमंद गजेंद्र जिमीकंद (ETV Bharat GFX)

बाजार में मिल रहे बेहतर दाम

गजेंद्र जिमीकंद की बाजार में अच्छी मांग है. किसानों का कहना है कि उन्हें इसके 70 से 100 रुपये प्रति किलो तक दाम मिल रहे हैं. कुछ किसान इसे सीधे मंडी में बेच रहे हैं, जबकि कुछ किसान इसे तलकर या तैयार उत्पाद के रूप में बेचकर अतिरिक्त मुनाफा भी कमा रहे हैं. कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि नाहन और पांवटा साहिब जैसे मैदानी इलाकों की जलवायु इस फसल के लिए पूरी तरह अनुकूल है.

भेड़ीवाला गांव के किसान सोमीनाथ ने कहा, "मैं पिछले दो वर्षों से प्राकृतिक तरीके से गजेंद्र जिमीकंद की खेती कर रहा हूं. मुझे अच्छी पैदावार के साथ-साथ बाजार में दाम भी बेहतर मिलते हैं." वहीं, महिला किसान रीता ने बताया कि वे आत्मा परियोजना के तहत इस खेती से जुड़ीं और जीवामृत व खट्टी लस्सी का उपयोग कर फसल उगा रही हैं. इससे उनकी आमदनी में बढ़ोतरी हुई है.

कब और कैसे करें इसकी खेती?

डॉ. साहब सिंह के अनुसार गजेंद्र किस्म के जिमीकंद की बुवाई मार्च, अप्रैल और मई माह में की जा सकती है. यह फसल 6 से 9 महीने में तैयार हो जाती है. जिन किसानों ने अप्रैल माह में इसकी बुवाई की थी, उनकी फसल नवंबर तक तैयार हो गई. किसान बाजार की मांग के अनुसार इसे धीरे-धीरे निकाल सकते हैं, जिससे उन्हें बेहतर कीमत मिल सके.

आत्मा परियोजना के तहत गजेंद्र किस्म का बीज बिलासपुर से मंगवाया गया था. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह एक ही सीजन में तैयार हो जाता है. मार्च-अप्रैल में लगाए गए बीज अक्टूबर-नवंबर तक तैयार हो जाते हैं. किसान इसके बीज के लिए कृषि विभाग से संपर्क कर सकते हैं या उन किसानों से भी बीज खरीद सकते हैं, जो पहले से इसकी खेती कर रहे हैं.

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गजेंद्र जिमीकंद से खेती से मंडी तक मुनाफा (ETV Bharat GFX)

रिकॉर्ड पैदावार ने बढ़ाया भरोसा

नाहन के कून गांव में किसान शिव राज चौहान के खेत में 8 किलो 770 ग्राम वजन का जिमीकंद निकला है. वहीं भेड़ीवाला गांव में सोमीनाथ ने अढ़ाई क्विंटल बीज लगाया था, जिससे 8 से 9 क्विंटल तक फसल होने की उम्मीद है. जिन किसानों को 60-60 किलो बीज दिया गया था, वे भी अढ़ाई से 3 क्विंटल तक उत्पादन की उम्मीद कर रहे हैं.

गजेंद्र किस्म का जिमीकंद अब केवल एक नई फसल नहीं, बल्कि सिरमौर के किसानों के लिए आय बढ़ाने का मजबूत जरिया बनता जा रहा है. कम समय, कम लागत, बेहतर दाम और प्राकृतिक खेती के अनुकूल होने के कारण यह फसल आने वाले समय में जिले की खेती की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती है.

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