'गौ विज्ञान' बदल रहा है देश के ग्रामीण आजीविका का चेहरा, गौमूत्र से बनाई जा रही दवाईयां
गौशाला में पंचगव्य चिकित्सालय भी स्थित है. यहां गाय के गौमूत्र, दूध, घी व दही से दवाइयां बनाई जाती हैं.

Published : February 25, 2026 at 6:35 AM IST
भीलवाड़ा : शहर के उपनगरपुर के पास स्थित माधव गौ सेवा एवं अनुसंधान केंद्र ने एक नजीर पेश की है. इसे 'गौ विज्ञान' भी कहा जाता है. माधव गौ सेवा एवं अनुसंधान केंद्र में देश के कई राज्यों से युवा, किसान, उद्यमी और पढ़े-लिखे लोग पहुंचकर गाय पालन व गायों के गोमूत्र से दवाइयां बनाने के साथ ही जैविक खाद के बारे में प्रशिक्षण ले रहे हैं.
केवल पशु संरक्षण तक सीमित नहीं : गौ विज्ञान पारंपरिक ज्ञान और व्यावहारिक विज्ञान का एक ऐसा संगम है, जिसका उद्देश्य विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी देसी पशु नस्लों को पुनर्जीवित करना है. वर्ष 2003 में भीलवाड़ा शहर से लगभग 17 किलोमीटर दूर परम पूज्य माधव गौ विज्ञान अनुसंधान केन्द्र की स्थापना हुई. यह पहल केवल पशुओं के संरक्षण तक सीमित नहीं है. यह एक समग्र दृष्टिकोण है जो विज्ञान, संस्कृति और स्थिरता को ग्रामीण जीवन के ताने-बाने में पिरोता है, ताकि नई पीढ़ी को गायों की स्थानीय नस्लों के संरक्षण और संवर्धन के लिए तैयार किया जा सके.
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25 बीघा जमीन पर चारे की व्यवस्था : इस गौशाला में देश भर के युवा, किसान, उद्यमी, पढ़े-लिखे नौजवान इंजीनियर और डॉक्टर के साथ ही गांवों के युवाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें इन नस्लों की देखभाल करना सिखाया जाता है. माधव गौशाला ट्रस्ट के प्रवक्ता गोविंद कुमार सोडाणी ने कहा कि लगभग 16 बीघा जमीन पर पूरी गौशाला व अनुसंधान केंद्र है. इस परिसर में भगवान श्री सांवलिया सेठ का मंदिर भी स्थित है, जहां काफी संख्या में भक्त भगवान के दर्शन करने आते हैं. 25 बीघा जमीन पर गायों के लिए चारे की व्यवस्था है.

गौमूत्र से दवाईयां बनाई जाती हैं : किसानों को कार्यशाला के माध्यम से सिखाया जाता है कि गौशाला एवं अनुसंधान केंद्र में गाय को रखकर किस प्रकार उपार्जन कर सकते हैं. कार्यशाला में राजस्थान सहित अन्य प्रदेश के किसान, उद्यमी व युवा पहुंचते हैं और प्रशिक्षण में भाग लेने के बाद अन्य युवा और किसानों को गाय पालन के प्रति प्रेरित करते हैं. गौशाला में पंचगव्य चिकित्सालय भी स्थित है. यहां गाय के गौमूत्र, दूध, घी व दही से दवाइयां बनाई जाती हैं. इसकी रसायन शाला भी उपलब्ध है. अनुसंधान केन्द्र को अभी 35 प्रकार के लाइसेंस दवा बनाने के मिले हैं. इस गौशाला में वर्ष 2003 से अब तक 20 से 22 कार्यशाला आयोजित की गई हैं. 300 से 400 कार्यकर्ता इससे तैयार हुए हैं, जो प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने गांव में जाकर गोबर के प्लांट से गोबर का खाद बना रहे हैं, दवाइयां बना रहे हैं.

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यहां 4 नस्ल की गायें हैं : माधव गौ सेवा एवं अनुसंधान केंद्र के व्यवस्थापक अजीत सिंह ने कहा कि वर्तमान में माधव गौशाला एवं अनुसंधान केंद्र में चार प्रकार की नस्लों की गायें हैं, जिसमें थारपारकर, गिर, राठी और साहीवाल है. यह सभी गायों की नस्ल दूध के मामले में अग्रणी है. माधव गौ सेवा एवं अनुसंधान केंद्र में देसी नस्ल की गायों को पौष्टिक आहर दिया जाता है, जिसकी बदौलत अच्छा दूध का उत्पादन होता है. 4 से 8 लीटर दूध उत्पादन इस गौशाला में एक गाय से होता है. आसपास के किसान भी इसी नस्ल की गाय लेकर आ रहे हैं और अच्छा दूध उत्पादन ले रहे हैं.

पंचगव्य का भी प्रशिक्षण : इस संस्थान में प्रशिक्षण शिविर चालू है. इसमें किसान, पढ़े-लिखे नौजवान वर्मी कंपोस्ट बनाना सीखते हैं. साथ ही यहां गाय का पालन कर गोबर गैस बनाने के साथ ही पंचगव्य का प्रशिक्षण दिया जाता है. बिना मशीनरी के गौ उत्पाद बनता है, उनके बारे में भी प्रशिक्षणार्थियों को समझाया जाता है ताकि वह आर्थिक स्वावलंबी बन सकें. भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ सरस डेयरी के जरिए भी किसान यहां आते हैं और यहां से सीखकर जाते हैं. वर्तमान में यहां प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद युवा जैविक खेती की ओर आगे बढ़ रहे हैं. वे घर पर ही गाय पालन कर उसके देसी खाद से केंचुए का खाद तैयार करते हैं और उस वर्मी कंपोस्ट खाद का फसल में छिड़काव कर अच्छा उत्पादन लेते हैं.

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30-40 हजार प्रतिमाह की कमाई : ब्यावर जिले के किसान महावीर प्रसाद शर्मा ने कहा कि उन्होंने भीलवाड़ा के निकट माधव गौशाला में प्रशिक्षण लिया और सीखने के बाद कृषि विभाग के अधिकारियों से मार्गदर्शन लेकर वर्मी कंपोस्ट प्लांट लगाया. अब वे खाद, दवाईया व केंचुए अजमेर, भीलवाड़ा और ब्यावर जिले में सप्लाई कर रहे हैं. इससे अच्छा रोजगार मिला है. वर्तमान में 30 से 40 हजार रुपए प्रतिमाह कमा रहे हैं. सभी किसानों को रासायनिक खेती छोड़कर जैविक खेती करनी चाहिए. आज के दौर में कई बीमारियां फैल रही हैं, उन बीमारियों से बचना है तो जैविक खेती करनी पड़ेगी.


