Special: ई-चालान के नाम पर फिशिंग लिंक भेजकर हो रही ठगी, लीक डेटा से बनाते हैं शिकार
आजकल ठग सोशल इंजीनियरिंग ट्रिक्स के जरिए लोगों को फंसा रहे हैं.

Published : August 26, 2026 at 6:28 PM IST
जयपुर: जयपुर के आदित्य ने महाराष्ट्र नंबर की सेकंड हैंड कार खरीदी. जिस पर पुरानी नंबर प्लेट लगी है. राजस्थान परिवहन विभाग में उन्होंने गाड़ी ट्रांसफर की प्रक्रिया पूरी की और नए नंबर मिले. इस बीच उनके मोबाइल पर आए एक मैसेज ने उनके होश उड़ा दिए. यह उनकी गाड़ी के नए नंबर का तीन हजार रुपए का ई-चालान का मैसेज था. इससे पहले कि वह मैसेज में दिए लिंक पर क्लिक कर चालान का भुगतान करते, उन्होंने मैसेज को ध्यान से पढ़ा और उन्हें पूरा माजरा समझ में आ गया कि यह साइबर ठगों की चाल है. जिसमें फिशिंग वेबसाइट्स के जरिए उनसे ठगी करने का प्रयास किया जा रहा है. ऐसे मैसेज हर दिन कई लोगों के मोबाइल में आते हैं और कई लोग जल्दबाजी में साइबर ठगी का शिकार हो जाते हैं.
नए-नए तरीके अख्तियार करते हैं साइबर ठग: साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ मुकेश चौधरी बताते हैं, फिशिंग साइट्स के जरिए साइबर ठगी आम हैं. लेकिन साइबर ठग हर बार नए-नए तरीके अपनाते हैं. कभी परिवहन विभाग के चालान के नाम पर तो कभी किसी खास मौके पर लुभावने ऑफर का लालच देकर. साइबर ठगी के मूल में दो ही बातें काम करती है, डर और लालच. इसलिए साइबर ठग कभी डराकर लोगों को अपना शिकार बनाते हैं और कभी उन्हें लुभावने ऑफर का लालच देकर अपने जाल में फंसाते हैं. चालान के फर्जी मैसेज में तत्काल भुगतान का दबाव बनाकर लोगों को फंसाया जाता है.
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लीक डेटा का इस्तेमाल कर बनाते हैं निशाना: उनका कहना है कि इंटरनेट (डार्क वेब पर या टेलीग्राम ग्रुप) पर यूजर्स का जो डेटा उपलब्ध है. उसका इस्तेमाल कर साइबर ठग टारगेट करते हैं. आजकल वे सोशल इंजीनियरिंग ट्रिक्स के जरिए लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं. जिसमें यूजर्स को पता भी नहीं चलता कि उनके साथ फ्रॉड हो रहा है. एक शख्स के मोबाइल पर गाड़ी नंबर के साथ ई–चालान का मैसेज आता है. सरकार के परिवहन पोर्टल के नाम पर एक लिंक भेजकर उन्हें निशाना बनाया जाता है.

लिंक में छिपी होती है एपीके फाइल: उनका कहना है, जिस शख्स के पास ऐसी फर्जी वेबसाइट्स का लिंक आता है. उन्हें आभास ही नहीं होता कि उनके साथ फ्रॉड हो रहा है. जबकि यह फ्रॉड लिंक है. ऐसी वेबसाइट्स भी आमतौर पर कुछ दिन पुरानी होती है. जिन पर क्लिक करते ही एक एपीके फाइल खुलती है. जिस पर क्लिक करते ही यूजर्स के फोन का एक्सेस साइबर ठगों के पास चला जाता है. आमतौर पर इस तरकीब से एंड्रॉयड मोबाइल यूजर्स को निशाना बनाना आसान होता है. आईफोन में एपीके फाइल इंस्टॉल नहीं होती है. एंड्रॉयड यूजर के मोबाइल का कंट्रोल साइबर ठगों के पास जाने पर वह ठगी की वारदात को अंजाम देते हैं.

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असली और नकली पोर्टल में मामूली अंतर: आमतौर पर परिवहन विभाग द्वारा ई चालान MParivahan के नाम से जारी होते हैं. लेकिन साइबर ठग इससे मिलते-जुलते नामों से अलग-अलग वेबसाइट्स बनाकर ठगी की वारदातों को अंजाम देते हैं. जैसे आदित्य के इस केस में जो जो मैसेज आया है. उसमें पोर्टल का नाम Next gen mparivaahan है. जो दिखने में हूबहू असली पोर्टल जैसा है. जल्दबाजी और नासमझी में लोग इस पर क्लिक कर देते हैं और ठगी का शिकार हो जाते हैं.

मैसेज-वाट्सएप से लिंक भेजकर करते हैं ठगी: उनका कहना है कि फिशिंग साइट्स के जरिए साइबर अपराधी ठगी का जाल तैयार करते हैं. सरकारी पोर्टल, ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल और किसी खास आयोजन से जुड़े पोर्टल जैसे हूबहू दिखने वाला पोर्टल तैयार करते हैं. जिनकी स्पेलिंग असली पोर्टल से मामूली तौर पर अलग होती है. आमतौर पर इसमें स्पेलिंग का अंतर होता है. जिसे बहुत ध्यान से देखने पर ही असली और नकली पोर्टल का अंतर समझ में आता है. इन फर्जी (फिशिंग) साइट्स का लिंक साइबर ठग मैसेज या वाट्सएप मैसेज के जरिए लोगों के मोबाइल तक पहुंचाते हैं. जाने-अनजाने में इस लिंक पर क्लिक करते ही लोग साइबर ठगों का निशाना बन जाते हैं.

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गूगल सर्च में भी टॉप पर दिखती हैं फिशिंग साइट्स: किसी भी बारे में जानकारी करने, ई–चालान जमा करवाने, ऑनलाइन शॉपिंग करने या किसी खास इवेंट का टिकट बुक करने के लिए जब लोग गूगल पर सर्च करते हैं तो इनसे जुड़ी फिशिंग साइट्स सबसे ऊपर दिखाई देती हैं. यूजर उसे असली समझकर क्लिक करता है और साइबर ठगों के जाल में फंस जाता है. इन पोर्टल पर बाकायदा फर्जी पेमेंट QR कोड भी जनरेट किया जाता है. जिसे स्कैन कर किया गया भुगतान सीधा साइबर ठगों के खाते में जमा हो जाता है.

ऐसे पता करें वेबसाइट असली या नकली: उन्होंने बताया कि आपके मोबाइल में मैसेज के जरिए जो लिंक आया है. वह वेबसाइट असली है या फर्जी. इसका पता लगाने के लिए इस लिंक को who.is वेबसाइट पर पोस्ट करने पर उसकी पूरी जानकारी सामने आ जाती है. मसलन, यह वेबसाइट कितनी पुरानी है. आमतौर पर ऐसी वेबसाइट पांच-सात दिन से एक महीने पुरानी होती हैं. जिनसे ठगी की वारदात करने के बाद उन्हें बंद कर दिया जाता है. इसके बाद नई वेबसाइट बनाकर इसी तरह ठगी की वारदात को अंजाम दिया जाता है.

तत्काल भुगतान का दबाव बनाते हैं ठग: वहीं, एडीजी (साइबर क्राइम) विजय कुमार सिंह ने बताया कि अपराधी वाहन चालकों को गैर-सरकारी नंबरों से यातायात उल्लंघन (ट्रैफिक चालान) का फर्जी मैसेज भेज रहे हैं. ऐसे मैसेज में साइबर अपराधी तत्काल भुगतान का दबाव बनाते हैं. इसके लिए 'Reminder: Outstanding traffic violation fine. Pay immediately to prevent extra penalties or further legal action' जैसे मैसेज आते हैं. इस एसएमएस में एक फर्जी लिंक दिया जाता है. जैसे ही कोई व्यक्ति इस लिंक पर क्लिक करके भुगतान करने की कोशिश करता है. उसके बैंक खाते से रकम ट्रांसफर करने का प्रयास किया जाता है.
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फर्जी वेबसाइटों की पहचान, डोमेन में छिपा है धोखा: आमजन को इस धोखाधड़ी से बचाने के लिए उन्होंने फर्जी वेबसाइट की पहचान के तरीके बताए हैं. आमतौर पर नकली वेबसाइट का निर्माण सरकारी वेबसाइटों से मिलते-जुलते डोमेन नामों से किया जाता है (जैसे: gov.in की जगह govt.in या nic.in की जगह inc.in). जबकि सरकारी वेबसाइट आमतौर पर .gov.in, .nic.in, या .org.in डोमेन पर होती हैं. इसके साथ ही स्क्रीन पर अचानक पेमेंट या किसी स्कीम का लाभ पाने के लिए क्लिक करने का संदेश आना भी इनके फर्जी होने की मुख्य निशानी है.
अनजान नंबर से आए लिंक से बचे, जानकारी न दें: एडीजी साइबर क्राइम वीके सिंह ने आमजन से अपील की है कि वे किसी भी अनजान नंबर से आए एसएमएस के लिंक पर क्लिक न करें. किसी भी स्थिति में अपना बैंकिंग पासवर्ड, ओटीपी या अन्य व्यक्तिगत जानकारी किसी से भी साझा न करें और न ही ऐसे संदेशों में दिए गए अनजान नंबरों पर कॉल करें. साइबर जागरूकता ही इस धोखाधड़ी से बचने का सबसे बड़ा हथियार है. उन्होंने मोबाइल पर आए किसी मैसेज पर प्रतिक्रिया देने से पहले उसे ध्यान से पढ़ने की भी सलाह दी है.
ठगी होने पर तत्काल करें रिपोर्ट: एडीजी सिंह का कहना है कि किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी होने पर या कोई संदिग्ध मैसेज मिलने पर तुरंत कार्रवाई करें. धोखाधड़ी की सूचना देने के लिए साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 या साइबर हेल्प डेस्क नम्बर 9256001930 और 9257510100 पर संपर्क करना चाहिए. इसके साथ ही पीड़ित साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल https://cybercrime.gov.in या अपने निकटतम पुलिस स्टेशन और साइबर पुलिस स्टेशन में भी शिकायत दर्ज करा सकते हैं.

