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रिटायर हुए 60 साल के भारत सिंह तो 'मालिनी' के गले लगकर रोए, पैर छूकर लिया आशीर्वाद, चर्चा में अनोखा रिश्ता

कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ एलीफेंट कैंप में तैनात भारत सिंह रावत 60 साल में रिटायर हुए, रेस्क्यू कर लाई गई मालिनी हथिनी को पाला

ELEPHANTS IN CORBETT TIGER RESERVE
रिटायरमेंट पर 9 माह की हथिनी और वन दारोगा का लाड़-प्यार (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : July 4, 2026 at 4:36 PM IST

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Updated : July 4, 2026 at 5:00 PM IST

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रामनगर: कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ एलीफेंट कैंप में एक ऐसा भावुक पल देखने को मिला, जिसने हर किसी की आंखें नम कर दीं. 60 वर्षीय वन दारोगा भारत सिंह रावत अपनी सेवानिवृत्ति के मौके पर नौ माह की हथिनी 'मालिनी' से विदा लेते समय उसके पैर छूकर गले लग गए और फूट-फूटकर रो पड़े. यह दृश्य इंसान और वन्यजीव के बीच प्रेम, विश्वास और संवेदनशील रिश्ते की अनूठी मिसाल बन गया.

रिटायर हुए भारत सिंह तो भावुक हुआ पल: कार्बेट टाइगर रिजर्व के कालागढ़ एलीफेंट कैंप में आयोजित एक विदाई समारोह उस समय बेहद भावुक हो गया, जब 60 वर्षीय वन दारोगा भारत सिंह रावत अपनी प्रिय हथिनी 'मालिनी' से बिछड़ने के दर्द को रोक नहीं सके. सेवानिवृत्ति के अंतिम दिन उन्होंने पहले मालिनी के पैर छुए, फिर उसे गले लगाकर फूट-फूटकर रो पड़े. यह दृश्य वहां मौजूद वन अधिकारियों, कर्मचारियों, महावतों और अन्य लोगों को भी भावुक कर गया. हर किसी की आंखें नम थीं और माहौल कुछ देर के लिए पूरी तरह शांत हो गया.

रिटायरमेंट पर नन्हीं हथिनी से विदाई रुला गई (Etv Bharat)

मालिनी से विदा होते समय निकले आंसू: भारत सिंह रावत का मालिनी से रिश्ता केवल एक वन कर्मचारी और वन्यजीव का ही नहीं था, बल्कि पिता और संतान जैसा बन चुका था. लगभग दस महीने पहले, 4 सितंबर 2025 को कोटद्वार की मालन नदी में एक बेहद कमजोर और मरणासन्न अवस्था में 15 से 20 दिन की हथिनी का बच्चा मिला था. वन विभाग की टीम ने उसका रेस्क्यू कर उसे कालागढ़ एलीफैंट कैंप पहुंचाया. मालन नदी से मिलने के कारण बाद में उसका नाम 'मालिनी' रखा गया.

9 महीने की है हाथी की बच्ची मालिनी: 19 फरवरी 2026 को वन मंत्री सुबोध उनियाल की उपस्थिति में विधि-विधान के साथ मालिनी का नामकरण संस्कार किया गया. इसके बाद भारत सिंह रावत ने उसकी देखभाल की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली. उन्होंने दिन-रात उसकी सेवा की. समय पर दूध पिलाया, दवाइयां दीं और उसके खानपान से लेकर स्वास्थ्य तक हर छोटी-बड़ी जरूरत का विशेष ध्यान रखा. उन्होंने कैंप के कर्मचारियों और सेवादारों को भी स्पष्ट निर्देश दिए थे कि मालिनी की देखभाल में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं होनी चाहिए.

भारत सिंह ने अनाथ मालिनी की सेवा की: वन क्षेत्राधिकारी नंद किशोर रुबाली के सहयोग से मालिनी के उपचार और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था लगातार की जाती रही. भारत सिंह उसे केवल एक हाथी नहीं, बल्कि ईश्वर का स्वरूप मानकर उसकी सेवा करते रहे. जब मालिनी कैंप में लाई गई थी, तब उसका वजन मात्र 85 किलोग्राम था. नियमित देखभाल, संतुलित पोषण और बेहतर चिकित्सा के चलते आज उसका वजन बढ़कर लगभग 280 किलोग्राम हो चुका है. उसकी सेहत में आया यह बदलाव भारत सिंह और पूरी वन विभाग की टीम की मेहनत का परिणाम माना जा रहा है.

विदाई समारोह में अधिकारियों और कर्मचारियों ने भारत सिंह रावत के समर्पण, ईमानदारी और वन्यजीव संरक्षण के प्रति उनके जुनून की खुलकर सराहना की. वक्ताओं ने कहा कि उन्होंने अपने पूरे सेवाकाल में जंगल, वन्यजीव और प्रकृति की रक्षा को केवल सरकारी नौकरी नहीं, बल्कि अपना जीवन उद्देश्य माना. उनका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहेगा.

कालागढ़ एलीफेंट कैंप में हैं चार हाथी: वर्तमान में कालागढ़ एलीफेंट कैंप में गजराज, लक्षमा, सावन और मालिनी सहित चार हाथी हैं. इनकी देखभाल के लिए तीन महावत, तीन चाराकटर और एक गेटकीपर तैनात हैं. कार्बेट टाइगर रिजर्व के पशु चिकित्सक डॉ. दुष्यंत कुमार शर्मा समय-समय पर सभी हाथियों का स्वास्थ्य परीक्षण करते हैं. भारत सिंह रावत की सेवानिवृत्ति के बाद अब रक्षित पांडेय एलीफैंट कैंप की जिम्मेदारी संभालेंगे.

वहीं इस विषय में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक डॉ. साकेत बडोला ने कहा कि-

दूरस्थ वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की सुरक्षा में जुटे वनकर्मी स्वभाव से बेहद संवेदनशील और भावुक होते हैं. विशेष रूप से वे कर्मचारी, जो किसी वन्यजीव के रेस्क्यू, उपचार और पालन-पोषण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, उनका उस जीव से गहरा भावनात्मक रिश्ता बन जाता है.
-डॉ साकेत बडोला, निदेशक, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व-

उन्होंने कहा कि जब कोई वनकर्मी लंबे समय तक किसी घायल या असहाय वन्यजीव की देखभाल करता है, उसे स्वस्थ करता है और बड़ा होते देखता है, तो उसके साथ उसका आत्मीय जुड़ाव विकसित हो जाता है. ऐसे में जब सेवा परिवर्तन, सेवानिवृत्ति या अन्य किसी कारण से उन्हें उन वन्यजीवों से अलग होना पड़ता है, तो वह पल बेहद भावुक होता है. डॉ. बडोला ने कहा कि यह केवल एक जिम्मेदारी का रिश्ता नहीं होता, बल्कि वर्षों की सेवा, समर्पण और संवेदनाओं से जुड़ा गहरा मानवीय संबंध होता है. यही कारण है कि विदाई के ऐसे अवसर वनकर्मियों के लिए अत्यंत भावुक और अविस्मरणीय बन जाते हैं.

भारत सिंह और मालिनी की यह विदाई केवल एक कर्मचारी के रिटायरमेंट की कहानी नहीं, बल्कि यह संदेश भी देती है कि प्रेम, करुणा और समर्पण की भाषा इंसान ही नहीं, वन्यजीव भी अच्छी तरह समझते हैं. कालागढ़ एलीफेंट कैंप का यह भावुक दृश्य लंबे समय तक लोगों के दिलों में जीवित रहेगा.
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Last Updated : July 4, 2026 at 5:00 PM IST