40 देशों से आए विदेशी श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान, अमेरिका-ईरान युद्ध के मृतकों की आत्मा की शांति के लिए कर्मकांड
अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन और रूस जैसे देशों से आए विदेशियों ने पारंपरिक वेशभूषा में विधि-विधान के साथ तर्पण किया. पढ़ें खबर

Published : May 4, 2026 at 5:01 PM IST
गयाजी: बिहार के गयाजी की मोक्षभूमि से मानवता और सनातन धर्म की एक अद्भुत तस्वीर सामने आई है. यहां फल्गु नदी के पावन तट पर स्थित देवघाट पर विश्व के लगभग 40 देशों से आए 76 विदेशी श्रद्धालुओं ने अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान का कर्मकांड संपन्न किया. सात समंदर पार से आए इन श्रद्धालुओं की भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में अटूट आस्था ने स्थानीय लोगों और तीर्थयात्रियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया.
गयाजी है मोक्ष की भूमि: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गयाजी को मोक्ष की भूमि माना जाता है, जहां पिंडदान करने से पितरों को स्वर्ग की प्राप्ति होती है. इसी विश्वास के साथ अमेरिका, फ्रांस, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूक्रेन और रूस जैसे देशों से आए इन विदेशियों ने विधि-विधान के साथ तर्पण किया. पारंपरिक वेशभूषा में सजे इन श्रद्धालुओं ने मंत्रोच्चार के बीच अपने पितरों को याद किया और उनके निर्वाण की कामना की.
76 श्रद्धालुओं ने किया पिंडदान: स्थानीय पंडा छोटू बारिक ने इस विशेष अनुष्ठान को पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न कराया. उन्होंने बताया कि इन विदेशी भक्तों की सनातन धर्म में गहरी रुचि है और वे विशेष रूप से इसी उद्देश्य के लिए भारत आए हैं. पंडा के निर्देशन में सभी 76 श्रद्धालुओं ने फल्गु नदी के तट पर बैठकर पिंड बनाए और वैदिक रीति-रिवाज के अनुसार उन्हें समर्पित किया. यह दृश्य सांस्कृतिक विविधता और आध्यात्मिक एकता का अनुपम उदाहरण था.
युद्ध के मृतकों के लिए भी कर्मकांड: पिंडदान की सबसे खास बात यह रही कि इन श्रद्धालुओं ने न केवल अपने निजी पूर्वजों, बल्कि विश्व शांति के लिए भी प्रार्थना की. इन विदेशियों ने अमेरिका, ईरान और रूस-यूक्रेन युद्ध में मारे गए निर्दोष लोगों की आत्मा की शांति के लिए भी विशेष रूप से पिंडदान कर्मकांड किया. युद्ध की विभीषिका में जान गंवाने वाले अनजान लोगों के प्रति उनकी यह संवेदनशीलता मानवता के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाती है.
रूस और यूक्रेन दोनों देशों के नागरिक शामिल: विदेशी श्रद्धालुओं के दल में रूस और यूक्रेन दोनों देशों के नागरिक शामिल थे, जो वर्तमान वैश्विक स्थितियों के बीच एक बड़ा संदेश है. एक ओर जहाँ सीमाओं पर तनाव है, वहीं गया की इस धरती पर ये लोग आपसी भाईचारे और शांति का संदेश देते नजर आए. सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार और वसुधैव कुटुंबकम की भावना को आत्मसात करते हुए इन लोगों ने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक शांति की खोज किसी सीमा या भाषा की मोहताज नहीं होती.
वैश्विक पटल पर गया की महत्ता रेखांकित:कुल मिलाकर, गया जी के देवघाट पर आयोजित इस पिंडदान कार्यक्रम ने वैश्विक पटल पर गया की महत्ता को एक बार फिर रेखांकित किया. इतनी बड़ी संख्या में विदेशी नागरिकों का एक साथ पिंडदान करना यह दर्शाता है कि भारतीय धर्म और संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं. यह आयोजन न केवल पितरों की मुक्ति का जरिया बना, बल्कि इसने युद्धग्रस्त दुनिया को शांति, करुणा और सौहार्द का एक सशक्त वैश्विक संदेश भी दिया है.
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