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उत्तराखंड की सूख रही इन 13 नदियों को मिलेगा नया जीवन, सबसे बड़े संस्थान करेंगे अध्ययन

वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर की तर्ज पर SARA उत्तराखंड की 13 ऐसी नदियों पर अध्ययन करा रहा है, जिनका प्रवाह कम हुआ है. रिपोर्ट- नवीन उनियाल.

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13 नदियों को मिलेगा नया जीवन (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : July 5, 2026 at 4:25 PM IST

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देहरादून: उत्तराखंड में नदियों पर बढ़ते संकट और सूखते जल स्रोतों को लेकर बड़े स्तर पर अध्ययन की तैयारी है. खास बात यह है कि देश की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की संस्थाएं इस काम को करने जा रही हैं. इसमें वन डिस्ट्रिक्ट-वन रिवर की तर्ज पर हर जिले में किसी एक नदी को चिन्हित किया गया है. अच्छी बात ये है कि इसके आसपास ग्राउंड वाटर रिचार्ज और पॉन्ड के अलावा झीलों को पुनर्जीवित करने पर भी काम किया जाएगा. ईटीवी भारत की स्पेशल रिपोर्ट.

उत्तराखंड की 13 नदियों को मिलेगा नया जीवन: उत्तराखंड में नदियों पर बढ़ते संकट और लगातार सूखते जल स्रोतों को लेकर अब बड़े स्तर पर पहल शुरू की जा रही है. राज्य सरकार के अंतर्गत कार्य कर रही स्प्रिंग एंड रिवर रिजूवनेशन अथॉरिटी (SARA-सारा) ने प्रदेश की महत्वपूर्ण नदियों के पुनर्जीवन के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना तैयार की है. खास बात यह है कि इस योजना के तहत राज्य के सभी 13 जिलों से एक-एक नदी का चयन किया गया है और इनके अध्ययन की जिम्मेदारी देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के संस्थानों को सौंपी जा रही है.

उत्तराखंड की सूख रही इन 13 नदियों को मिलेगा नया जीवन (ETV Bharat)

राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय संस्थान करेंगे सूखती नदियों का अध्ययन: यह पहल वन डिस्ट्रिक्ट वन रिवर की तर्ज पर शुरू की गई है, जिसके तहत प्रत्येक जिले की ऐसी नदी को चुना गया है, जो स्थानीय स्तर पर महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ पुनर्जीवन की आवश्यकता भी महसूस कर रही है. इसके साथ ही नदी के आसपास मौजूद जल स्रोतों, भूजल पुनर्भरण की स्थिति, झीलों, तालाबों और अन्य जल निकायों का भी अध्ययन किया जाएगा, ताकि पूरे जल तंत्र को एक साथ मजबूत किया जा सके.

वैज्ञानिक हर जिले की एक नदी पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार करेंगे: दरअसल 'सारा' (State Agency for Rejuvenation and Augmentation of Water Sources) लंबे समय से राज्य में जल स्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन को लेकर काम करता रहा है. अब तक विभिन्न क्षेत्रों में झरनों, धाराओं और छोटी नदियों के संरक्षण से जुड़े कई प्रोजेक्ट संचालित किए जा चुके हैं, लेकिन इस बार संस्था का फोकस पूरे प्रदेश की 13 प्रमुख नदियों पर केंद्रित है. इस योजना की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अध्ययन और तकनीकी सुझावों के लिए देश के अग्रणी संस्थानों को जोड़ा जा रहा है, जिससे वैज्ञानिक आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की जा सके.

नदियों के जल प्रवाह में कमी आई है: इस परियोजना में शामिल अधिकांश नदियों में पिछले कुछ सालों के दौरान जल प्रवाह में कमी दर्ज की गई है. कई क्षेत्रों में जल स्रोतों के सूखने और भूजल स्तर में गिरावट का असर नदियों पर भी दिखाई देने लगा है. ऐसे में इन नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना बेहद जरूरी माना जा रहा है.

अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़ और नैनीताल की नदियों का अध्ययन ये संस्थान करेंगे: परियोजना के तहत अल्मोड़ा जिले की जटा गंगा, बागेश्वर की गरुड़ गंगा और पिथौरागढ़ जिले की पूर्वी रामगंगा नदी का अध्ययन जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान द्वारा किया जाएगा. वहीं नैनीताल जिले की शिप्रा नदी और चंपावत जिले की गौड़ी नदी के अध्ययन की जिम्मेदारी आईआईटी रुड़की को सौंपी गई है.

पौड़ी, टिहरी, देहरादून और चमोली की नदियों के अध्ययन की जिम्मेदारी इन संस्थानों को: इसी प्रकार पौड़ी जिले की नयार पूर्वी और नयार पश्चिमी नदियों के अध्ययन के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान, रुड़की को चुना गया है. टिहरी और देहरादून जिलों से जुड़ी सोंग नदी का अध्ययन भी यही संस्थान करेगा. चमोली जिले में स्थित चंद्रभागा नदी और रुद्रप्रयाग जिले की पुनार नदी पर वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून के विशेषज्ञ अध्ययन करेंगे.

उत्तरकाशी, हरिद्वार और उधम सिंह नगर जिले की नदियों के अध्ययन की जिम्मेदारी इन संस्थानों को: उत्तरकाशी जिले की कमल गंगा नदी का अध्ययन भारतीय मृदा एवं जल संरक्षण संस्थान के विशेषज्ञों द्वारा किया जाएगा, जबकि हरिद्वार जिले की पथरी नदी के अध्ययन की जिम्मेदारी भारतीय वन्यजीव संस्थान को दी गई है. उधम सिंह नगर जिले की फीका नदी के लिए आईआईटी रुड़की और अर्थ साइंस से जुड़े विशेषज्ञ संयुक्त रूप से अध्ययन करेंगे.

इस तरह का अध्ययन करेंगे विशेषज्ञ: विशेषज्ञ केवल नदी के जल प्रवाह या उसके वर्तमान स्वरूप का अध्ययन ही नहीं करेंगे, बल्कि नदी के आसपास मौजूद जलग्रहण क्षेत्र, भूजल पुनर्भरण की स्थिति, वर्षा जल संचयन की संभावनाओं और झीलों एवं तालाबों जैसी जल संरचनाओं का भी गहन विश्लेषण करेंगे. इसका उद्देश्य यह समझना होगा कि किन कारणों से नदी के जल प्रवाह में कमी आई और उसे दोबारा कैसे मजबूत किया जा सकता है.

संबंधित संस्थान को विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट देंगे विशेषज्ञ: अध्ययन पूरा होने के बाद संबंधित संस्थान विस्तृत तकनीकी रिपोर्ट तैयार करेंगे. इन रिपोर्टों में नदियों को पुनर्जीवित करने के लिए आवश्यक कदम, संरचनात्मक सुधार, जल संरक्षण उपाय, भूजल पुनर्भरण की तकनीक और स्थानीय स्तर पर किए जाने वाले कार्यों का पूरा खाका प्रस्तुत किया जाएगा. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो यह रिपोर्ट संबंधित नदियों के पुनर्जीवन के लिए मार्गदर्शक दस्तावेज का काम करेगी.

ऐसे मिलेगी परियोजनाओं को स्वीकृति: इन रिपोर्टों के आधार पर जिला स्तरीय समितियां तकनीकी और वित्तीय परीक्षण करेंगी और परियोजना प्रस्ताव तैयार करके सारा मुख्यालय को भेजेंगी. इसके बाद परियोजनाओं की स्वीकृति और बजट का निर्धारण किया जाएगा. व्यवस्था के अनुसार, 10 करोड़ रुपये से अधिक लागत वाली परियोजनाओं को मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली समिति के समक्ष मंजूरी के लिए रखा जाएगा, जबकि 10 करोड़ रुपये से कम लागत वाली योजनाओं को निर्धारित सचिव स्तर पर स्वीकृति प्रदान की जा सकेगी.

अगले 10 वर्ष तक परियोजनाओं की मॉनिटरिंग होगी: इस योजना की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि परियोजना के पूरा होने के बाद भी इसकी निगरानी लगातार जारी रहेगी. सारा के जिला स्तर के विशेषज्ञ अगले दस वर्षों तक इन परियोजनाओं की मॉनिटरिंग करेंगे. इस दौरान यह आकलन किया जाएगा कि उठाए गए कदमों का नदी के जल प्रवाह, भूजल स्तर और आसपास के पर्यावरण पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ा है.

स्थानीय समुदायों की परियोजना में होगी सक्रिय भागीदारी: साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाएगा कि परियोजना में स्थानीय समुदायों और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी हो. अधिकारियों का मानना है कि किसी भी जल संरक्षण परियोजना की सफलता तभी संभव है, जब स्थानीय लोग उसके साथ जुड़ें और उसे अपनी जिम्मेदारी समझें. इससे न केवल परियोजनाओं के सफल क्रियान्वयन में मदद मिलेगी, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकेंगे.

सारा की एसीईओ ने क्या कहा: स्प्रिंग एंड रिवर रिजुवेनेशन अथॉरिटी की एसीईओ कहकशां नसीम के अनुसार-

वन डिस्ट्रिक्ट वन रिवर कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की एजेंसियां और संस्थान अध्ययन का काम करेंगे. इन अध्ययनों से प्राप्त निष्कर्ष राज्य की नदियों के संरक्षण और पुनर्जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.
-कहकशां नसीम, ACEO, सारा-

सारा के जियो हाइड्रोलॉजिस्ट ने क्या कहा: वहीं सारा के जियो हाइड्रोलॉजिस्ट शिवेंद्र प्रताप सिंह का कहना है कि-

उत्तराखंड में जल स्रोतों के संरक्षण को लेकर लगातार अध्ययन किए जा रहे हैं. सहस्त्रधारा क्षेत्र में बादल फटने की घटना के बाद वहां मौजूद जलधाराओं और झरनों पर अध्ययन किए हैं. इस तरह के अध्ययन से अधिकारियों और वन सेवा के प्रशिक्षु अधिकारियों को हाइड्रोजियोलॉजिकल दृष्टिकोण को समझने में मदद मिल रही है.
-शिवेंद्र प्रताप सिंह, जियो हाइड्रोलॉजिस्ट, सारा-

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