पूर्वी चंपारण में हर साल बाढ़ का कहर, नेपाल की नदियां बनती हैं तबाही की वजह
पूर्वी चंपारण के लोगों को बाढ़ का डर सताने लगा है. नेपाल से निकलने वाली नदियों के कारण हर साल स्थिति खराब हो जाती है.

Published : July 6, 2026 at 3:50 PM IST
पूर्वी चंपारण: बिहार के पूर्वी चंपारण जिला बिहार के उन इलाकों में शामिल है, जहां हर वर्ष मानसून के मौसम में बाढ़ एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आती है. नेपाल से निकलने वाली नदियों और लगातार होने वाली भारी बारिश के कारण जिले के कई प्रखंड सुगौली, बंजरिया, कुंडवा चैनपुर, संग्रामपुर और मधुबन बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं.
नेपाल से आने वाला पानी बढ़ाता है खतरा: पूर्वी चंपारण की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि यहां बहने वाली अधिकांश नदियों का उद्गम नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों में है. मानसून के दौरान नेपाल में होने वाली तेज बारिश का असर सीधे पूर्वी चंपारण पर पड़ता है. पहाड़ों से बड़ी मात्रा में पानी नदियों के माध्यम से बिहार में प्रवेश करता है, जिससे नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ जाता है और बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है.
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल से आने वाले पानी की मात्रा और स्थानीय वर्षा दोनों मिलकर बाढ़ की समस्या को गंभीर बना देते हैं. कई बार स्थिति इतनी भयावह हो जाती है कि प्रशासन को लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए राहत एवं बचाव अभियान चलाना पड़ता है.
इन नदियों से बढ़ती है बाढ़ की समस्या: पूर्वी चंपारण में बाढ़ का मुख्य कारण जिले से होकर गुजरने वाली प्रमुख नदियां हैं. इनमें गंडक, सिकरहना (बूढ़ी गंडक), बागमती और लालबकेया प्रमुख हैं. गंडक नदी का जलस्तर बढ़ने पर कई गांव जलमग्न हो जाते हैं. वहीं सिकरहना नदी भी जिले के बड़े हिस्से को प्रभावित करती है. बागमती और लालबकेया नदियां भी बारिश के मौसम में उफान पर रहती हैं और आसपास के क्षेत्रों में पानी फैलाकर भारी नुकसान पहुंचाती हैं.
ये इलाके सबसे ज्यादा होते हैं प्रभावित: नदियों में लगातार बढ़ते जलस्तर के कारण तटबंधों पर दबाव बढ़ जाता है. कई बार तटबंधों के कटाव या क्षतिग्रस्त होने से स्थिति और गंभीर हो जाती है, जिससे गांवों में तेजी से पानी प्रवेश कर जाता है. जिले के कई प्रखंड हर साल बाढ़ की मार झेलते हैं. इनमें केसरिया, अरेराज, संग्रामपुर, सुगौली, बंजरिया, पताही और कल्याणपुर प्रमुख रूप से शामिल हैं.

विस्थापन करने को मजबूर होते हैं लोग: इन क्षेत्रों के दर्जनों गांवों में मानसून के दौरान सड़क संपर्क टूट जाता है. खेतों में पानी भर जाने से धान, मक्का और अन्य फसलें नष्ट हो जाती हैं. कई ग्रामीण परिवारों को अपने घर छोड़कर ऊंचे स्थानों या राहत शिविरों में शरण लेनी पड़ती है. विशेष रूप से नदी किनारे बसे गांवों में रहने वाले लोगों को हर वर्ष बाढ़ का खतरा सताता रहता है. कई परिवार ऐसे हैं जो लगभग हर मानसून में विस्थापन की समस्या का सामना करते हैं.
कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है असर: पूर्वी चंपारण मुख्य रूप से कृषि आधारित जिला है. यहां की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है. बाढ़ आने पर सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है. खेतों में खड़ी फसलें पानी में डूब जाती हैं और किसानों की महीनों की मेहनत बर्बाद हो जाती है.
जनजीवन हो जाता है अस्त-व्यस्त: बाढ़ के कारण पशुपालन भी प्रभावित होता है. चारे की कमी, पशुओं में बीमारी और सुरक्षित स्थानों की कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं. इसके अलावा स्थानीय बाजार, छोटे व्यवसाय और दैनिक मजदूरी पर निर्भर लोगों की आय भी प्रभावित होती है. बाढ़ के दौरान सड़कों पर पानी भर जाने से आवागमन बाधित हो जाता है. कई गांवों का संपर्क प्रखंड और जिला मुख्यालय से कट जाता है. स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र और स्वास्थ्य सेवाएं भी प्रभावित होती हैं.

बढ़ जाता है बीमारी का खतरा: बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पेयजल संकट और जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. दूषित पानी के कारण डायरिया, त्वचा रोग और अन्य बीमारियां फैलने की आशंका बनी रहती है. ऐसे समय में प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को विशेष सतर्कता बरतनी पड़ती है.
राहत और बचाव की रहती है चुनौती: हर वर्ष मानसून शुरू होते ही जिला प्रशासन बाढ़ से निपटने की तैयारी शुरू कर देता है. संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी, तटबंधों का निरीक्षण, नावों की व्यवस्था और राहत सामग्री का भंडारण किया जाता है. फिर भी अचानक बढ़ने वाले जलस्तर के कारण कई बार स्थिति चुनौतीपूर्ण हो जाती है.
हर साल होता है नुकसान: प्रशासन का प्रयास रहता है कि प्रभावित लोगों तक समय पर राहत सामग्री, भोजन, पेयजल और चिकित्सा सुविधा पहुंचाई जाए. हालांकि ग्रामीणों का कहना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए नदियों के प्रबंधन, तटबंधों की मजबूती और जल निकासी व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है. जटवा जनेरवा गांव की ग्रामीण महिला मोहिनी देवी का कहना है कि फसल काटने के समय खेत में पानी भर जाता है, जिससे हर साल किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है.
"खेत रहते हुए भी सब लोग चावल खरीदकर खाते हैं. काफी परेशानी होती है.सरेह के गांव डूब जाते हैं तो लोग अनाज पानी लेकर गांव में आ जाते हैं."- मोहिनी देवी, ग्रामीण महिला
"बाढ़ आने से काफी परेशानी होती है. पुल पर लोग रहने को मजबूर हो जाते हैं. लोग परिवार के साथ यहां रहते हैं.त्रिपाल लगाकर लोग रहते हैं."- ग्रामीण महिला
पुल पर परिवार के साथ रहते हैं लोग: ग्रामीण अलीम अख्तर ने कहा कि रोड के बराबर कभी-कभी ऊपर तक पानी रहता है. पुल पर लोग पूरे परिवार के साथ रहते हैं. नाव के सहारे हमलोग जीवनयापन करते हैं. सब इंतजाम करने में लगे हैं.
"सरकार से कई मदद नहीं मिलती है. कोई देखने के लिए नहीं आता है. सबको परेशानी होती है."- अलीम अख्तर, ग्रामीण
कार्यपालक अभियंता आलोक कुमार ने बताया कि तटबंधों की सुरक्षा एवं मजबूती के लिए आवश्यक तैयारियां की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि नदी के किनारे बसे गांवों पर विशेष नजर रखी जा रही है. जहां मनरेगा से निर्मित बांधों पर पानी का दबाव बढ़ने की संभावना होती है, वहां आवश्यकता पड़ने पर जिला प्रशासन के सहयोग से आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई जाती है.
"जिन गांवों के पास मनरेगा से तटबंध का निर्माण नहीं हुआ है और नदी की धारा के कारण कटाव की स्थिति उत्पन्न हो रही है, वहां विभाग द्वारा आवश्यक कार्य कराकर कटावरोधी उपाय किए जाते हैं, ताकि गांवों को सुरक्षित रखा जा सके और लोगों की जान-माल की रक्षा सुनिश्चित हो सके."- आलोक कुमार,कार्यपालक अभियंता
पूर्वी चंपारण में बाढ़ केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं बल्कि हर वर्ष सामने आने वाली बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती है. नेपाल से आने वाली नदियों और भारी बारिश के कारण केसरिया, अरेराज, संग्रामपुर, सुगौली, बंजरिया, पताही और कल्याणपुर जैसे इलाके लगातार प्रभावित होते हैं. ऐसे में प्रभावी बाढ़ प्रबंधन, मजबूत तटबंध, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणाली और दीर्घकालिक योजनाएं ही इस समस्या का स्थायी समाधान बन सकती हैं. बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए प्रशासन और स्थानीय लोगों के बीच समन्वय भी बेहद जरूरी है.
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