हिमाचल में पहली बार AI के जरिए वन संपदा का आकलन, 500 वन रक्षकों ने जुटाए दो लाख रिकॉर्ड, जंगलों ने सोख रखा है 258 मिलियन टन कार्बन
हिमाचल प्रदेश में वन रक्षकों को जंगलों का रिकॉर्ड जुटाने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के इस्तेमाल करने को लेकर प्रशिक्षित किया गया है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : June 20, 2026 at 7:29 PM IST
शिमला: ग्रीन फैलिंग यानी हरे पेड़ों के कटान पर पूरी तरह से रोक लगाने वाले पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश के पास 3.21 लाख करोड़ रुपए की वन संपदा है. हिमाचल में पहली दफा वन संपदा का आकलन करने के लिए एआई यानी आर्टिफिशियल टेक्नीक का इस्तेमाल किया गया है. एआई, एमएल यानी मशीन लर्निंग व सेटेलाइट इमेजिंग के जरिए राज्य के वन विभाग ने इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी व इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस हैदराबाद के साथ मिलकर इस रिपोर्ट को तैयार किया है.
काउंटिंग ग्रीन वैल्थ नामक इस रिपोर्ट का सबसे दिलचस्प पहलू ये है कि 500 वन रक्षकों ने वनों में जाकर 2 लाख के करीब रिकॉर्ड जुटाए हैं. उन्हें आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई तकनीक) के इस्तेमाल को लेकर पूरी तरह से प्रशिक्षित किया गया था. इस रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि हिमाचल प्रदेश के वनों में मौजूद पेड़ों व जैव विविधता ने किस तरह से अपने भीतर कार्बन को सोख कर रखा है, ताकि देश व प्रदेश को खुली साफ हवा में सांस लेने का सुख मिल सके.

रिपोर्ट के अनुसार हिमाचल के जंगलों में पेड़ों ने अपने पत्तों, तनों, जड़ों आदि में 258 मिलियन टन कार्बन को सोख रखा है. गाड़ियों के प्रदूषण, धुएं व अन्य विभिन्न प्रकार से प्रदूषणों से पैदा होने वाली कार्बन डाइऑक्साइड के पेड़ों ने अपने में सोख रखा है. इसके अलावा हिमाचल के वनों में सालाना 22 हजरा करोड़ रुपए से अधिक की संपदा के दोहन की क्षमता है. इससे पचास हजार दिनों का स्थानीय काम उपलब्ध हो सकता है. ये सारा आकलन एआई, एमआई व सेटेलाइट इमेजिंग के जरिए किया गया है. तकनीक का ये इस्तेमाल पहली बार हुआ है. इस प्रकार कहा जा सकता है कि हिमाचल प्रदेश में फॉरेस्ट मैनेजमेंट में अब नए जमाने की तकनीक प्रयोग होने लगी है.

क्या है तकनीक और इसके लाभ?
एआई तकनीक से वन संपदा का आकलन एक वैज्ञानिक तरीका है. एआई से वनों में पेड़ों के प्रकार, उनकी खासियत आदि की जानकारी मिलने पर निकट भविष्य में जंगलों की वैज्ञानिक गणना हो सकेगी. वन विभाग व भारती इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक पॉलिसी ने 500 वन रक्षकों के जरिए पेड़ों के दो लाख रिकॉर्ड जुटाए. फिर टीम ने पेड़ों की प्रजाति पर आधारित तस्वीरों को एआई मॉडल के साथ जोड़ा. दो लाख पेड़ों का जिओ टैग करके रिकॉर्ड तैयार हुआ. वन रक्षकों ने पेड़ों की प्रजातियों की तस्वीरें ली. पेड़ों की केनोपी हाइट देखी गई. अलग-अलग प्रजातियों यानी स्पीशिज का डिस्ट्रीब्यूशन मैप बनाया गया. जो आंकड़े सामने आए, उन्हें सेटेलाइट इमेजरी, टोपोग्राफी व एन्वायरमेंटल इन्फार्मेशन के साथ मिलाकर जंगलों की फॉरेस्ट इंटेलीजेंस लेयर तैयार की गई.

इस तकनीक के जरिए देवदार, चीड़ (पाइन ट्रीज), खैर, साल, बांस, आंवला और बुरांश जैसे प्रमुख पेड़ों की प्रजातियों का डिजिटल नक्शा बनाया गया. उल्लेखनीय है कि एआई के माध्यम से ये पता लगाया जा सकता है कि कौन से क्षेत्र में कौन सी प्रजाति के पेड़ कितनी संख्या में मौजूद हैं. उन पेड़ों की ग्रोथ कैसी है और भविष्य में उनका प्रबंधन कैसे किया जा सकता है, ताकि वन संपदा में निरतंर इजाफा हो.

रिपोर्ट के अनुसार एआई तकनीक वाले मॉडल में मल्टी स्पीशिज डीप न्यूरल नेटवर्क यानी डीएनएन और रैंडम फॉरेस्ट मॉडल का उपयोग किया गया है. इस मॉडल से पेड़ों की पहचान, वनों की बनावट यानी संरचना, जैव भार बायोमास, संभावित उपज आदि का आकलन आसान हो जाता है. इसी आकलन से पाया गया कि 22 हजार करोड़ रुपए सालाना की यील्ड यानी उपज है.

पहले क्या आती थी परेशानी?
उल्लेखनीय है कि पूर्व में जंगलों में वन संपदा के विभिन्न पहलुओं का आकलन करने में परंपरागट तरीके अपनाए जाते थे. वनों में कैसे बदलाव आ रहे हैं, उसका अध्ययन करने के लिए दस साल का इंतजार करना होता था. अब एआई के प्रयोग से वनों में होने वाले बदलाव को लेकर हर महीने जानकारी मिल सकेगी. एआई तकनीक से 10 मीटर हाई रिजोल्यूशन डेटा और बार-बार प्राप्त हो रही सेटेलाइट सूचनाओं से वनों में हो रहे परिवर्तन की लगातार निगरानी हो सकेगी. इससे फॉरेस्ट फायर मैनेजमेंट में भी सहायता मिलेगी.
इस तकनीक से न केवल वनों में पेड़ों का आकलन हो पा रहा है, बल्कि पेड़ों द्वारा सोखे गए कार्बन की मात्रा का भी सटीक आकलन हुआ है. वन रक्षकों के लिए भी इस अभियान में शामिल होना एक रोमांचक अनुभव रहा. उन्हें केवल फॉरेस्ट गार्ड्स ही नहीं, बल्कि वैज्ञानित डाटा संग्रह करने वालों के रूप में पहचान दी गई. वन रक्षकों ने जीपीएस आधारित उपकरणों व मोबाइल एप्लीकेशन के माध्यम से पेड़ों की स्थिति और तस्वीरों को इकट्ठा किया.
रिपोर्ट तैयार करने वाली टीम की सराहना करते हुए सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा, 'राज्य में पहली बार पारंपरिक गणना से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीकों का प्रयोग हुआ है. राज्य के वन विभाग के फॉरेस्ट गाडर्स ने बेहतरीन काम किया है. एआई व मशीन लर्निंग सिस्टम से एक अहम रिपोर्ट तैयार हुई है'.
राज्य सरकार के पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं जलवायु परिवर्तन सचिव सुशील कुमार सिंगला का कहना है, 'एआई तकनीक से तैयार ये रिपोर्ट मात्र इन्वेंट्री नहीं, बल्कि राज्य के लिए क्लाइमेट इन्फ्रास्ट्रक्चर के समान है. जंगलों में मौजूद पेड़ों के कार्बन स्टाक का स्पीशिज और उस स्पीशिज के पेड़ों की ऊंचाई के अनुसार विश्लेषण ये समझने में मदद करेगा कि जलवायु परिवर्तन का राज्य के वनों पर क्या प्रभाव हो रहा है? रिपोर्ट तैयार करने में एआई, एमएल यानी मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग का प्रयोग करने से ये प्रक्रिया वैश्विक मानकों के समकक्ष हो गई है'.

राज्य के निदेशक पर्यावरण, विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं जलवायु परिवर्तन डॉ. पुष्पेंद्र राणा का कहना है, 'आधुनिक तकनीक से तैयार इस रिपोर्ट एआई व एमएल अल्गोरिदम का प्रयोग हुआ है. पेड़ों के कार्बन स्टाक मूल्यांकन से तकनीक के इन्वोशन का शानदार उदाहरण स्थापित हुआ है'.
रिपोर्ट में पता चला है कि हिमाचल के वनों में सालाना दोहन के लिए 4800 करोड़ रुपए के जंगली आम, 8700 करोड़ रुपए के आंवले, 1200 करोड़ रुपए के बुरांश के फूल, 5500 करोड़ रुपए की चीड़ की पत्तियां यानी पाइन नीडल्स मौजूद है. इस वन संपदा को लेकर ईटीवी भारत ने पहले ही खबर प्रकाशित की है'
ये भी पढ़ें: जलवायु चुनौतियों से निपटने को लोक निर्माण विभाग में बड़े सुधार, गुणवत्ता और आधुनिक तकनीक पर जोर: CM सुक्खू

