DU के मिरांडा हाउस कॉलेज में शुरू हुई पहली मिलेट कैंटीन, जानें क्या है इसकी खासियत
दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस कॉलेज में पहली मिलेट कैंटीन आज पोषण, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण की एक सशक्त मिसाल बनकर उभर रही है.

Published : January 6, 2026 at 8:36 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के मिरांडा हाउस कॉलेज में शुरू हुई पहली मिलेट कैंटीन आज पोषण, स्वास्थ्य और महिला सशक्तिकरण की एक सशक्त मिसाल बनकर उभर रही है. यह कैंटीन न सिर्फ मिलेट जैसे पारंपरिक और पौष्टिक अनाज को बढ़ावा दे रही है, बल्कि निम्न वर्ग की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाकर उनके जीवन में सकारात्मक बदलाव भी ला रही है.
इस अनोखी पहल की शुरुआत मिरांडा हाउस के डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिकल साइंस की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. सोनाली चितालकर के प्रयासों से हुई. उन्होंने बताया कि वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स घोषित किए जाने के बाद उन्हें यह विचार आया कि इस अभियान को कॉलेज स्तर पर भी आगे बढ़ाया जाना चाहिए. एनसीसी से जुड़ाव के दौरान उन्होंने छात्राओं में पोषण की कमी और कम हीमोग्लोबिन लेवल जैसी समस्याओं को करीब से देखा, जिससे यह जरूरत महसूस हुई.
रागी, ज्वार और बाजरा जैसे मिलेट का हो रहा उपयोग: उन्होंने बताया कि आज के समय में हाइब्रिड गेहूं में अधिक मात्रा में मौजूद ग्लूटेन कई स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रहा है. ऐसे में रागी, ज्वार और बाजरा जैसे मिलेट न केवल अधिक पौष्टिक हैं, बल्कि हमारी पारंपरिक भोजन संस्कृति का भी हिस्सा रहे हैं. इसी सोच के साथ उन्होंने कॉलेज की प्रधानाचार्य प्रोफेसर विजया लक्ष्मी नंदा से इस विचार को साझा किया. प्रधानाचार्य ने इस पहल को पूरा समर्थन दिया और कॉलेज परिसर में कैंटीन के लिए जगह, ग्रांट और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराई.
मिलेट कैंटीन महिला सशक्तिकरण का दे रहा उदाहरण: डॉ. सोनाली ने बताया कि यह मिलेट कैंटीन महिला सशक्तिकरण की दिशा में भी एक मजबूत कदम है. कैंटीन का संचालन पूरी तरह महिलाओं द्वारा किया जा रहा है. यह महिलाएं प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना से जुड़ी हुई हैं और पहले से कॉलेज में कार्यरत थीं. उन्हें मिलेट आधारित भोजन तैयार करने की विशेष ट्रेनिंग दी गई, क्योंकि मिलेट से स्वादिष्ट और संतुलित भोजन बनाना आसान नहीं होता. प्रशिक्षण और मेहनत के बाद इन महिलाओं ने इस कला में दक्षता हासिल की.

मिलेट थाली से कैंटीन की हुई शुरुआत: कैंटीन की शुरुआत मिलेट थाली से हुई, जिसमें मिलेट की रोटी, सब्जी और रायता शामिल था. धीरे-धीरे मेन्यू में मिलेट के केक, मफिन, कुकीज, लड्डू, इडली और नमकीन जैसे कई उत्पाद जोड़े गए.खास बात यह है कि यहां रिफाइंड शुगर की जगह गुड़ का इस्तेमाल किया जाता है और रिफाइंड तेल की बजाय फिल्टर्ड तेल और घी का प्रयोग होता है, जिससे भोजन अधिक स्वास्थ्यवर्धक बनता है.
घर जैसा मिलता है स्वाद: छात्राओं के बीच इस कैंटीन को लेकर काफी सकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है. छात्रा एलिजा ने बताया कि यहां का खाना बहुत कंफर्टिंग, घर जैसा और बेहद हाइजीनिक है. यहां काम करने वाली दीदियों का व्यवहार भी बहुत अपनापन देता है. छात्रा तनुश्री आचारजी ने बताया कि इस कैंटीन में उन्हें घर से दूर रहते हुए भी मां के हाथ से बने खाने महसूस होते है. रागी की इडली और मिलेट के कपकेक ज्यादा पसंद हैं.

इडली, केक और लड्डू की अधिक मांग: कैंटीन में काम कर रही महिलाएं खुद को एक परिवार की तरह मानती हैं. वनीला ने बताया कि छात्राएं मिलेट की रोटी, थाली, केक और लड्डू सभी चीजें बड़े चाव से खाती हैं. रागी और ज्वार से बने खाने की सबसे ज्यादा मांग होती है. सुनीता ने बताया कि इस कैंटीन से होने वाली आय से न सिर्फ अपना खर्च निकाल पा रही हूं, बल्कि अपने परिवार का भी सहयोग कर रही हूं. डॉ. सोनाली ने बताया कि यह मिलेट कैंटीन एक तरह से इनक्यूबेटर की तरह काम कर रही है. भविष्य में इसे स्टार्टअप के रूप में आगे बढ़ाने की भी योजना है, ताकि और अधिक महिलाओं को रोजगार और आत्मनिर्भरता का अवसर मिल सके.
रेट:
- आलू पराठा - 60 रुपये
- पनीर पराठा - 80 रुपये
- थाली - 70 रुपये
- इडली सांभर - 60 रुपये
- कप केक - 40 रुपये
- लड्डू - 20 रुपये
- केक - 500 रुपये
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