डीडीयू के फाइन आर्ट डिपार्टमेंट को आधुनिक तकनीक की दरकार, परिसर बदहाल
विभाग में छात्र हैं भरपूर, शिक्षकों की कमी, वाद्य यंत्र आधुनिक संसाधनों 'डिजिटल कंप्यूटर लैब' की आवश्यकता.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : May 29, 2026 at 1:20 PM IST
गोरखपुर: पद्मश्री सम्मान से लेकर संगीत और चित्रकला की दुनिया में गोरखपुर विश्वविद्यालय के जिस "ललित कला और संगीत" विभाग की एक समय में धूम और पहचान थी, वह नए दौर में काफी फीकी पड़ती जा रही है. विद्यार्थी पढ़ने को तो मिल रहे लेकिन पढ़ाने वाले प्रोफेसर का यहां अभाव है. फाइन आर्ट से जुड़ी हुई आधुनिक तकनीकों का इस विभाग को आज के दौर में बड़ी जरूरत है.
बता दें, यहां स्थापित ललित कला की प्रतिमाएं भी अपना स्वरूप खो चुकी हैं. परिसर को जाने वाली सड़क भी बदहाल है. तो संगीत के साधन भी बेकार पड़ते जा रहे हैं. गिटार को छोड़ दिया जाय तो यहां बजाने के लिए कोई और वाद्य यंत्र नहीं है.
यहां के रिसर्च स्कॉलर्स कहते हैं कि समय की मांग है कि इसको संवारा जाय क्योंकि यह संस्कार और कला की पहचान देता और दिलाता है. रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के साथ-साथ कला और संगीत में व्यक्तिगत पहचान का भी बड़ा माध्यम बनता है. लेकिन पूर्वांचल के इस महत्वपूर्ण ललित कला और संगीत के केंद्र में नई शिक्षा नीति और तकनीकी के अनुरूप, व्यवस्थाओं का अभाव यहां के विद्यार्थियों के साथ-साथ रिसर्च स्कॉलर्स के शोध को प्रभावित करता है. जो उपलब्ध संसाधन हैं, उनका वह डिजिटल नहीं बल्कि मैन्युअल उपयोग करते हुए अपने शोध को तो आगे बढ़ा रहे हैं लेकिन, प्रतिस्पर्धा में उन्हें पिछड़ जाने का डर है.

शोध छात्रों में अभिषेक श्रीवास्तव और शिवम कुमार गुप्ता कहते हैं कि विश्वविद्यालय का ललित कला एवं संगीत विभाग कला और संस्कृति के क्षेत्र में विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने में निरंतर प्रयासरत है लेकिन, वर्तमान समय की मांग और तकनीकी विकास को देखते हुए यह विभाग इस समय बुनियादी आधुनिक संसाधनों और संकाय सदस्यों (Faculty) की भारी कमी से जूझ रहा है. विभाग के सुचारू संचालन और छात्रों के भविष्य को अंधकार से बचाने के लिए 2 मुख्य बिंदुओं पर कार्य होना अत्यंत आवश्यक है.

कैम्पस में इन चीजों का अभाव: जिसमें अप्लाइड आर्ट (Applied Art) हेतु 'डिजिटल कंप्यूटर लैब' की आवश्यकता है. मैनुअल बनाम डिजिटल का अंतर जो छात्र जानता है वह मुख्य सुविधा न होने से परेशान है. वर्तमान में विभाग में 'अप्लाइड आर्ट' (व्यावहारिक कला) के अंतर्गत इलस्ट्रेशन, ग्राफिक डिजाइनिंग, एनिमेशन और आर्ट डायरेक्शन जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई तो हो रही है लेकिन, आज के वैश्विक बाजार (Market) में ये सभी कार्य पूर्णतः डिजिटल माध्यम से होते हैं जो यहां उपलब्ध नहीं है.

विभाग में शिक्षकों की कमी: शोधार्थियों ने बताया कि संगीत विभाग में शिक्षकों और संगतकारों (Accompanists) का घोर संकट है. संगीत विंग में गायन, वादन और तबला जैसे महत्वपूर्ण विषयों की शिक्षा दी जाती है. लेकिन अत्यंत खेद का विषय है कि वर्तमान समय में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उषा सिंह के अलावा संगीत विषय का कोई भी अन्य विशेषज्ञ शिक्षक विभाग में उपलब्ध नहीं है. इसके अतिरिक्त, संगतकारों (Accompanists) के पद भी लंबे समय से रिक्त पड़े हैं. उन्होंने कहा कि हमारी वर्तमान विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर उषा सिंह अगले माह सेवानिवृत्त (Retire) हो रही हैं. उनके सेवानिवृत्त होने के पश्चात संगीत विभाग पूर्ण रूप से कुशल मार्गदर्शकों और विषय-विशेषज्ञों से विहीन हो जाएगा, जिससे इस विंग का अस्तित्व ही संकट में पड़ जाएगा.

विद्यार्थी "प्लान बी'' भी रखे तैयार: शिवम गुप्ता ने इस दौरान कहा कि ललित कला और संगीत विभाग के विद्यार्थियों को "प्लान बी" को भी बनाकर चले. शिक्षा लेकर सिर्फ शिक्षक बनने के रास्ते पर नहीं बल्कि इन कलाओं में माहिर होने के साथ फ्रीलांसर के रूप में अपनी बड़ी पहचान कायम करें. अपने यहां के कई छात्र देश और विदेश में भी कंपोजिंग, एडिटिंग जैसे कार्यों में लाखों रुपए कमा रहे हैं.
फाइन आर्ट्स की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर उषा सिंह ने बताया, एकेडमिक स्टाफ की कमी को पूरा करने के साथ आधुनिक तकनीक से विभाग को लैश करने के लिए उन्होंने प्रस्ताव तैयार करके वीसी प्रोफेसर पूनम टंडन तक पहुंचाया है. कुलपति ने आश्वासन भी दिया है कि समय के साथ इसको छात्र हित में पूरा करने में जुटे हैं. परिसर की बदहाल स्थिति और यहां स्थापित मूर्तियों के खंडित होने और बदरंग होने के सवाल पर उन्होंने कहा, किसी प्रोग्राम के तहत ही इनका रंग- रोगन और जीर्णोद्धार कराया जाता है. जैसे ही कोई स्थिति बनती है स्वरूप में नयापन देखने को मिलेगा.
उन्होंने कहा कि संगीत और ललित कला एक ऐसा विषय है जो किसी भी विद्यार्थी को बेकार नहीं रहने देता. इसमें विद्यार्थियों को बस अपने परफॉर्मिंग पर पूरा जोर देना चाहिए. लाइट, कैमरा, कंपोजिंग, बाइंडिंग, पेंटिंग, मूर्ति कला, गिटार, तबला के साथ संगीत वह क्षेत्र है जो अपना डिमांड हमेशा बनाए रखेगा. उन्होंने कहा कि इस विभाग की पहचान ऐसे समझी जा सकती है, यहां के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. राजेश्वर आचार्य पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजे जा चुके हैं.
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