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अबूझमाड़ में पहली बार लाइट कैमरा एक्शन, नक्सल प्रभाव से उबरते गांवों में छत्तीसगढ़ी फिल्म की शूटिंग

फिल्म के डायरेक्टर कहते हैं कि अबूझमाड़ में बदलाव की बयार साफ महसूस की जा रही है.

FILM SHOOTING IN ABUJHMAD
अबूझमाड़ मूवी शूटिंग (ETV Bharat Chhattisgarh)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : November 3, 2025 at 2:19 PM IST

6 Min Read
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आकाश सिंह ठाकुर की रिपोर्ट

नारायणपुर: छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में स्थित अबूझमाड़ के जंगल में कई खूबसूरत लोकेशन है. यहां की प्राकृतिक सुंदरता किसी का भी मन मोह सकती है. लेकिन नक्सली दहशत की वजह से लोगों ने इस इलाके से दूरी बना ली. अब लगातार नक्सली ऑपरेशन में मिल रही कामयाबी और बड़ी संख्या में नक्सली सरेंडर के बाद इस इलाके की तस्वीर बदल रही है. यहां कभी नक्सलियों की चहलकदमी, मुठभेड़, धमाकों की गूंज सुनाई देती थी, लेकिन अब इस इलाके के मसपुर गांव में फिल्म की शूटिंग चल रही है.

10 महीने पहले गांव से 200 मीटर की दूरी पर पुलिस कैंप खोला गया. जिसके बाद से मसपुर और आसपास के कई गांव नक्सल हिंसा से उबरने लगे हैं. अब कभी नक्सल दहशत का केंद्र माने जाने वाले मसपुर में छत्तीसगढ़ी फिल्म ''दण्डा कोटुम'' की शूटिंग चल रही है. मसपुर के साथ ही गारपा, फौरादी गांव में भी इस फिल्म की शूटिंग की जा रही है. रायपुर से फिल्म डायरेक्टर, एक्टर और दूसरे कलाकार अबूझमाड़ पहुंचे हैं. खास बात है कि फिल्म में स्थानीय लोगों को भी जगह दी गई है.

अबूझमाड़ मूवी शूटिंग (ETV Bharat Chhattisgarh)

नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ में फिल्म की शूटिंग और यहां दिखने वाले परिवर्तन के बारे में ETV भारत ने दण्डा कोटुम फिल्म के निर्देशक और अभिनेता अमलेश नागेश से फिल्म के सेट पर खास बात की. अमलेश नागेश ने बताया कि उन्हें ऐसी फिल्म बनानी थी, जो छत्तीसगढ़ी सिनेमा की पारंपरिक लव स्टोरी या कॉमेडी से हटकर आदिवासी जनजीवन, प्रकृति और संस्कृति को यथार्थ रूप में दिखा सके. इस वजह से उन्होंने अबूझमाड़ को चुना. वे बताते हैं कि वह पहली बार अबूझमाड़ पहुंचे और यहां की खूबसूरती को देखकर मंत्रमुग्ध हो गए. नागेश ने ये भी बताया कि गांव पहुंचने के दौरान उन्होंने 5 सुरक्षा कैंप पार किए. गांव से कुछ दूर आगे जाने पर भी 2 पुलिस कैंप है, जिससे उन्हें काफी सुरक्षा महसूस हुई. फिल्म के निदेशक ने अबूझमाड़ की तुलना रायपुर, बिलासपुर गरियाबंद से की.

अबूझमाड़ पहले और अब निर्देशक की जुबानी: दण्डा कोटुम फिल्म के निर्देशक और अभिनेता अमलेश नागेश ने बताया कि वह पहली बार अबूझमाड़ आए हैं. लेकिन यहां के लोगों से बात करने पर उन्हें ऐसा महसूस होता कि जैसे पहले वे यहां के लोगों से मिल चुके हैं. यहां के लोग उन्हें परिवार की तरह लगते हैं. वे कहते हैं कि अबूझमाड़ की हवा-पानी बाहरी दुनिया से बहुत अलग है. यहां की शांति, सुकून, चिड़िया की आवाज सिर्फ फिल्म में देखने को मिलती रही है, लेकिन अब हकीकत में यहां वो सब महसूस हो रहा है.

Abujhmad Film Danda Kotum
बस्तर के जल जंगल जमीन और उसके हक की लड़ाई पर फिल्म (ETV Bharat Chhattisgarh)

दण्डा कोटुम यानी बस्तर का जंगल: दण्डा कोटुम फिल्म के बारे में अमलेश नागेश ने बताया कि ''दण्डा कोटुम'' जल जंगल जमीन की कहानी है. दण्डा यानी बस्तर (बस्तर को दंडकारण्य कहते हैं) और कोटुम यानी जंगल (गोंडी में जंगल को कोटुम कहते हैं) यानी बस्तर का जंगल. इसलिए फिल्म को बस्तर में ही शूट करने का फैसला लिया. शूटिंग शुरू करने से पहले जिला प्रशासन, पुलिस विभाग और 12 ग्राम सभाओं से अनुमति ली गई. यहां के पटेल अर्जुन दादा ने कहा कि आप यहां फिल्म की शूटिंग कर सकते हैं.

Abujhmad Film Danda Kotum
दण्डा कोटुम मूवी की शूटिंग करते कलाकार (ETV Bharat Chhattisgarh)

नागेश ने बताया कि शुरुआत में यहां भाषा की दिक्कत आई, क्योंकि यहां के लोग माड़िया बोली में बात करते हैं. यह गोंडी भाषा की एक बोली है, जिसे माड़िया जनजाति के लोग बोलते हैं. नागेश बताते हैं कि यहां कई लोग छत्तीसगढ़ी भाषा नहीं समझते हैं. शुरुआत में कुछ दिक्कत आई लेकिन अब सब कुछ सही है. गांव वाले बहुत मदद करते हैं, ऐसा लगता है जैसे अपने गांव पहुंच गए हैं.

बस्तर में बदलाव लेकिन आदिवासियों ने संस्कृति बचाकर रखा: अमलेश नागेश कहते हैं कि बस्तर के बारे में जो बताया जाता है, ये उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत है. यहां विकास के काम हो रहे हैं. गांव में सड़क पहुंच रही है. सभी के घर में नल भी है. सोलर पैनल से बिजली भी पहुंची है. यहां के लोग बहुत अच्छा जीवन जी रहे हैं. लेकिन सबसे खास बात है कि विकास के बाद भी यहां के आदिवासियों ने अपनी संस्कृति को बचाकर रखा है. सरकार से भी गुहार है कि आदिवासी संस्कृति को बचाकर रखें.

Abujhmad Film Danda Kotum
नक्सल प्रभावित अबूझमाड़ में बम बारूद की जगह कैमरा और लाइट (ETV Bharat Chhattisgarh)

अबूझमाड़ में चप्पे चप्पे पर सुरक्षा: अभिनेता और निर्देशक अमलेश नागेश कहते हैं कि पिछले 15 से ज्यादा दिनों से उनकी टीम अबूझमाड़ में है, लेकिन फिल्म की शूटिंग शुरू करने से दो महीने पहले से ही वे और उनकी टीम ने अबूझमाड़ के कई गांवों का दौरा किया. इस दौरान कोई नक्सल गतिविधि देखने को नहीं मिली. मसपुर गांव पहुंचने के दौरान 5 पुलिस कैंप देखने को मिले. गांव से आगे भी तीन से चार सुरक्षा कैंप है. नागेश कहते हैं कि पूरा इलाका काफी सुरक्षित लग रहा है. यहां ऐसा लग रहा है जैसे वे अपने खुद के गांव जो गरियाबंद में है, वहां है. रायपुर के आसपास के गांवों जैसा महसूस हो रहा है. यहां सुकून ज्यादा है.

Abujhmad Film Danda Kotum
अबूझमाड़ के मसपुर गांव में हो रही छत्तीसगढ़ी फिल्म की शूटिंग (ETV Bharat Chhattisgarh)

फिल्म दण्डा कोटुम का मुख्य किरदार खुद अमलेश नागेश निभा रहे हैं, हालांकि उन्होंने इसकी कहानी और भूमिका को अभी सीक्रेट रखा है. इस फिल्म से बस्तर की संस्कृति, प्रकृति और जीवनशैली को नई पहचान मिलने की उम्मीद है.

अबूझमाड़ में बदलाव की बयार: अबूझमाड़ में फिल्म शूटिंग की शुरुआत सिर्फ एक सांस्कृतिक घटना नहीं, बल्कि विकास, विश्वास और बदलाव की कहानी है. कभी भय का प्रतीक रहे इस क्षेत्र में जब कैमरे की रोशनी पड़ती है, तो यह संदेश देती है कि छत्तीसगढ़ के दूरस्थ अंचलों में भी अब अमन, अवसर और आशा का नया अध्याय शुरू हो चुका है. अमलेश नागेश और उनकी टीम की यह पहल न केवल छत्तीसगढ़ी सिनेमा को नई दिशा देगी बल्कि अबूझमाड़ के जनजीवन को राष्ट्रीय पटल पर नई पहचान भी दिलाएगी.

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