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बुलंदशहर में नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता को उम्रकैद की सजा, जानिए पूरा मामला

कोर्ट ने कहा है कि ऐसे अपराधी समाज के लिए कैंसर हैं, जिसने पिता-पुत्री जैसे पवित्र रिश्ते को कलंकित किया है.

जिला कोर्ट
जिला कोर्ट (Photo Credit: ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : May 7, 2026 at 3:00 PM IST

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बुलंदशहर: विशेष न्यायाधीश पॉक्सो कोर्ट विनीत चौधरी ने नाबालिग बेटी से दुष्कर्म के दोषी पिता को उम्रकैद सजा सुनाई है. सजा सुनाते हुए उन्होंने कड़ी टिप्पणी भी की है कि ऐसे अपराधी समाज के लिए कैंसर हैं, जिसने पिता-पुत्री जैसे पवित्र रिश्ते को कलंकित किया है. दोषी पर 20 हजार रुपये अर्थदंड भी लगाया है.

विशेष लोक अभियोजक पॉक्सो महेश राघव ने बताया कि छह अप्रैल 2021 को वादनी मुकदमा ने कोतवाली डिबाई में एक तहरीर दी थी, जिसमें उन्होंने बताया था कि वह रोजाना की भांति खेत पर कटाई कर रही थी. जबकि उसकी 14 वर्षीय पुत्री अपनी बुआ के साथ दूसरे खेत में चारा काटने गई हुई थी.


कुछ देर बाद पड़ोस की महिला के फोन पर उसकी पुत्री ने रोते हुए पिता द्वारा अपने साथ दुष्कर्म किए जाने की जानकारी दी, उसके घर पहुंचने पर आरोपी पति वहां से भाग गया. कोतवाली पुलिस ने मामले में रिपोर्ट दर्ज करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था.

पुलिस ने जांच कर तीन जून 2021 को आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल किया था. न्यायाधीश ने गवाहों के बयान, साक्ष्यों का अवलोकन और दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं की दलीलों को सुनकर किशोरी से दुष्कर्म की घटना में आरोपी पिता को दोषी करार दिया.

न्यायाधीश ने अभियुक्त पिता को उम्रकैद और 20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है. अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि ऐसे अपराध केवल कानून का उल्लंघन नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक मूल्यों और मानवता पर सीधा हमला हैं. न्यायालय की इस सख्त टिप्पणी को समाज में बढ़ते दुष्कर्म जैसे अपराधों के खिलाफ एक कड़ा संदेश माना जा रहा है.

दोषी समाज के लिए कैंसर की तरह, उसे समाज से काटना ही उपयुक्त अभियुक्त द्वारा पिता-पुत्री के पवित्र रिश्ते को कलंकित किया गया है. ऐसा व्यक्ति जो कि अपनी पुत्री के साथ इस प्रकार का घृणित अपराध कर सकता है, वह व्यक्ति समाज के लिए एक कैंसर की तरह है, जिसे कि समाज से काटना ही उपयुक्त होगा.

पीड़िता ने अपनी प्रतिपरीक्षा में तथा वादनी अर्थात अभियुक्त की पत्नी ने अपने साक्ष्य में अभियुक्त को बचाने के लिए अभियोजन कथानक का समर्थन नहीं किया गया है. इसका अभिप्राय यह है कि उनके द्वारा अभियुक्त के अपराध को क्षमा कर दिया गया है, लेकिन न्यायालय इस घृणित अपराध को क्षमा नहीं कर सकता है.

न्यायालय का दायित्व समाज में संदेश देने का भी होता है. यदि अभियुक्त के साथ दंड के प्रश्न पर किसी प्रकार की दया का प्रदर्शन किया गया तो इसका समाज में विपरीत संदेश जाएगा. न्याय के उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति यह न्यायालय दोषसिद्ध अभियुक्त को निम्न दंड से दंडित करने का पर्याप्त आधार पाती है.

सुनवाई के दौरान मां, बेटी ने बदल दिए थे बयान, जांच रिपोर्ट के आधार पर सुनाई सजा विशेष लोक अभियोजक पॉक्सो ने बताया कि पीड़िता की मां ने बेटी को न्याय दिलाने के लिए रिपोर्ट तो दर्ज करा दी थी. मामला पारिवारिक होने के कारण बाद में मां और बेटी ने अपने बयान बदल दिए थे, जिसके चलते आरोपी के दोषमुक्त होने की संभावना प्रबल हो गई थी.

ऐसे में बेटी से दुष्कर्म की वारदात को अंजाम देने वाले और रिश्तों को कलंकित करने वाले वहशी दरिंदे के फिर से समाज में खुलेआम घूमने की संभावना प्रबल होने लगी थी. बताया पीड़िता के मां की तहरीर के आधार पर रिपोर्ट दर्ज की गई थी.

पुलिस और न्यायालय के समक्ष मां ने अपने बयान में बेटी के साथ दुष्कर्म होने की बात को स्वीकार किया था. वहीं, पीड़िता ने भी पुलिस और कोर्ट में पिता पर दुष्कर्म किए जाने के आरोप लगाते हुए बयान दिए थे, लिकेन सुनवाई के दौरान मां, बेटी पुलिस, न्यायालय को दिए बयान से मुकर गईं थी. प्रयोगशाला की रिपोर्ट में स्पर्म मैच हो गए थे, जिसके बाद कोर्ट ने एफएसएल रिपोर्ट के आधार पर अपना फैसला सुनाया है.

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