यूपी के अन्नदाताओं के लिए खुशखबरी ! मशरूम से बंपर कमाई का मौका, 35 डिग्री तापमान में कमा सकेंगे दोगुना मुनाफा
सालभर होगी बंपर कमाई: उत्तर प्रदेश के मौसम के अनुकूल ये 4 मशरूम वैरायटी किसानों की किस्मत बदल देगी.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : June 4, 2026 at 1:32 PM IST
लखनऊ: जब भी ज़ेहन में मशरूम की खेती का ख्याल आता है, तो दिमाग में एसी (AC) से लैस बंद कमरे और एक तय न्यूनतम तापमान की तस्वीर उभरती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि उत्तर प्रदेश के सामान्य तापमान में भी साल के 12 महीने मशरूम उगाया जा सकता है? बिल्कुल वैसे ही जैसे आप धान, गेहूं या गन्ना उगाते हैं. देखिए खुर्शीद अहमद की ख़ास रिपोर्ट...
'मशरूम फसल चक्र' अपनाएं
उत्तर भारत के बदलते मौसम के अनुसार, अगर सही किस्मों का चुनाव कर 'मशरूम फसल चक्र' (Mushroom Crop Cycle) अपनाया जाए, तो बिना किसी महंगे तामझाम के खाने वाले और औषधीय गुणों से भरपूर मशरूम की बंपर पैदावार ली जा सकती है. आइए जानते हैं इस नई और मुनाफेदार तकनीक का पूरा गणित.
उत्तर प्रदेश राज्य मशरूम प्रयोगशाला के प्रभारी और मशरूम विशेषज्ञ डॉक्टर बी. लाल ने बताया कि उत्तर प्रदेश में सर्दियों के दौरान तापमान जहां 5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है, वहीं गर्मियों में यह 45 डिग्री सेल्सियस तक चला जाता है.
नवंबर से फरवरी तक बटन मशरूम की खेती सबसे उपयुक्त
ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि राज्य में सफल और लाभदायक मशरूम उत्पादन के लिए मौसम के अनुसार विभिन्न प्रजातियों का फसल चक्र अपनाना आवश्यक है.
मशरूम विशेषज्ञ डॉक्टर बी. लाल के अनुसार नवंबर से फरवरी तक के ठंडे मौसम में बटन मशरूम की खेती सबसे उपयुक्त रहती है.

अक्टूबर से मार्च के बीच ऑयस्टर मशरूम का करें उत्पादन
वहीं अक्टूबर से मार्च के बीच ऑयस्टर मशरूम का उत्पादन किया जा सकता है. गर्म मौसम में मिल्की मशरूम किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो रही है, क्योंकि यह 25 से 35 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी अच्छी पैदावार देती है.
इसके अलावा पैडी स्ट्रॉ मशरूम भी उच्च तापमान वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है.

डॉक्टर बी. लाल कहना है कि उत्तर प्रदेश में सालभर उत्पादन के लिए नवंबर से फरवरी तक बटन मशरूम, मार्च से जून तक मिल्की मशरूम और जुलाई से अक्टूबर तक ऑयस्टर मशरूम की खेती का चक्र अपनाया जा सकता है. इससे तापमान नियंत्रण पर होने वाला अतिरिक्त खर्च भी कम हो जाता है और उत्पादन निरंतर बना रहता है.
ऑयस्टर, मिल्की, पैडी स्ट्रॉ और बटन मशरूम की खेती सबसे ख़ास
उन्होंने बताया कि खाने योग्य मशरूमों में ऑयस्टर, मिल्की, पैडी स्ट्रॉ और बटन मशरूम प्रमुख हैं. औषधीय गुणों वाली मशरूमों में रेशी, लायंस मेन, शिटाके और कॉर्डिसेप्स का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. इन मशरूमों की बाजार में मांग लगातार बढ़ रही है, विशेषकर स्वास्थ्य और पोषण के प्रति बढ़ती जागरूकता के कारण.

डॉक्टर बी. लाल के अनुसार यदि मशरूम को उसकी अनुशंसित तापमान सीमा में उगाया जाए, तो सामान्य तापमान में उत्पादन से उसकी गुणवत्ता या पोषण मूल्य पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ता. हालांकि अत्यधिक गर्मी या ठंड की स्थिति में उत्पादन, आकार, शेल्फ लाइफ और रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित हो सकती है.

यूपी में ऑयस्टर और मिल्की मशरूम की खेती सबसे कारगर
मशरूम विशेषज्ञ डॉक्टर बी. लाल का मानना है कि उत्तर प्रदेश में कम लागत और अधिक लाभ के दृष्टिकोण से ऑयस्टर और मिल्की मशरूम की खेती किसानों के लिए सबसे व्यावहारिक विकल्प है.
वहीं औषधीय मशरूमों की खेती उच्च आय का अवसर प्रदान कर सकती है, हालांकि इसके लिए अधिक तकनीकी ज्ञान और नियंत्रित वातावरण की आवश्यकता होती है.

मशरूम विशेषज्ञ डॉ. बी. लाल का कहना है कि यदि धान और गेहूं की पारंपरिक खेती की तुलना की जाए तो मशरूम उत्पादन कहीं अधिक लाभदायक साबित होता है.
कम भूमि, कम लागत और कम समय में बेहतर मुनाफा मिलने के कारण किसान अब इसकी ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं.
मशरूम की कीमत सामान्यतः 200 से 250 रुपये प्रति किलो
डॉ. बी. लाल के अनुसार मात्र 200 वर्गफीट क्षेत्र में लगभग 35 बैग रखकर मशरूम का उत्पादन किया जा सकता है. एक बैग से औसतन 2 किलो मशरूम प्राप्त होता है. बाजार में मशरूम की कीमत सामान्यतः 200 से 250 रुपये प्रति किलो तक रहती है. इस प्रकार किसान केवल 200 वर्गफीट क्षेत्र में करीब 60 दिनों के भीतर 60 से 70 किलो तक मशरूम का उत्पादन कर अच्छी आय अर्जित कर सकते हैं.

औषधीय गुणों वाले मशरूम की कीमत 2,000 से 5,000 रुपये प्रति किलो
उन्होंने बताया कि मिल्की मशरूम, बटन मशरूम और ऑयस्टर मशरूम पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं तथा देशभर में इनकी मांग बनी रहती है.
वहीं औषधीय गुणों वाले विशेष प्रकार के मशरूम की कीमत 2,000 से 5,000 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. हालांकि इनकी मांग सीमित होती है और मुख्य रूप से फार्मा कंपनियां ही इन्हें खरीदती हैं.

साथ ही इनके विपणन में भी चुनौतियां आती हैं. यही कारण है कि अधिकतर किसान खाने वाले मशरूम की खेती को प्राथमिकता दे रहे हैं.
ऐसे करें मशरूम की खेती
मशरूम उत्पादन की प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. बी. लाल ने बताया कि 35 बैग तैयार करने के लिए लगभग 300 किलो भूसे का उपयोग किया जाता है. इसमें तीन-तीन किलो यूरिया और डीएपी के साथ चोकर मिलाया जाता है.
इसके बाद भूसे पर हल्का पानी छिड़ककर उसे तैयार किया जाता है. जब भूसा सफेद रंग का दिखाई देने लगे तो उसे मशरूम उत्पादन के लिए उपयुक्त माना जाता है. इसके बाद तैयार सामग्री को बैग में भरकर मशरूम के बीज डाल दिए जाते हैं.
मशरूम फसल की सुरक्षा को भी उन्होंने बेहद महत्वपूर्ण बताया. डॉक्टर बी. लाल अनुसार मशरूम निकलने के दौरान बहुत हल्का पानी का छिड़काव करना चाहिए, ताकि फसल को किसी प्रकार की क्षति न पहुंचे.
कीटों से बचाव के लिए उत्पादन स्थल पर बारीक जाली लगाना आवश्यक है. मशरूम से निकलने वाली गंध की वजह से कीट आकर्षित होते हैं, जो फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. आवश्यकता पड़ने पर कीटनाशकों का भी उपयोग किया जाता है. इसके अलावा चूहों से बचाव के लिए भी विशेष प्रबंध करने होते हैं.
उन्होंने बताया कि बैग में बीज डालने के बाद किसी भी प्रकार के अतिरिक्त खाद या उर्वरक का प्रयोग नहीं किया जाता.

राजकीय मशरूम प्रयोगशाला लखनऊ से खरीद सकते हैं बीज
डॉ. बी.लाल ने बताया कि मशरूम की खेती शुरू करने के इच्छुक किसान लखनऊ स्थित राजकीय मशरूम प्रयोगशाला, अलीगंज से बीज प्राप्त कर सकते हैं. एक पैकेट बीज की कीमत लगभग 150 रुपये है और 200 वर्गफीट क्षेत्र के लिए तीन पैकेट बीज पर्याप्त होते हैं. बीज पूरे वर्ष उपलब्ध रहता है, हालांकि इसकी ऑनलाइन आपूर्ति नहीं की जाती है. बीज खरीदने के लिए किसानों को स्वयं लखनऊ आना पड़ता है.
प्रशिक्षण कार्यक्रम से उन्नत किसान बन सकते हैं आप
उन्होंने यह भी बताया कि राजकीय मशरूम प्रयोगशाला में किसानों के लिए छह दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किया जाता है. इस प्रशिक्षण में मशरूम उत्पादन की मूलभूत जानकारी से लेकर उन्नत तकनीकों तक का विस्तृत प्रशिक्षण दिया जाता है. प्रशिक्षण पूरा होने पर प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किया जाता है. यह प्रशिक्षण वर्षभर चलता है और इसकी पंजीकरण फीस मात्र 50 रुपये है.
इसके अलावा कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाता. हालांकि रहने और खाने की व्यवस्था प्रशिक्षुओं को स्वयं करनी होती है. प्रशिक्षण कक्षाएं प्रतिदिन सुबह 10 बजे से 11:30 बजे तक संचालित की जाती हैं.
मशरूम की खेती के लिए मिलता है सरकारी अनुदान
उत्तर प्रदेश हॉर्टिकल्चर विभाग के डायरेक्टर भानु प्रकाश ने बताया कि उत्तर प्रदेश में किसानों की आय बढ़ाने और कृषि के वैकल्पिक साधनों को प्रोत्साहित करने के लिए मशरूम की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है.

राज्य सरकार और उद्यान विभाग की विभिन्न योजनाओं के तहत मशरूम उत्पादन इकाइयों की स्थापना पर किसानों को 40 प्रतिशत तक अनुदान प्रदान की जा रही है.
डायरेक्टर भानु प्रकाश के अनुसार मशरूम की खेती कम जगह में अधिक आय देने वाला व्यवसाय साबित हो रही है. किसान अपने घर या खेत में उपलब्ध छोटे कमरों से भी इसकी शुरुआत कर सकते हैं.
व्यावसायिक स्तर पर 500 से 1000 वर्ग फुट क्षेत्र में मशरूम उत्पादन शुरू किया जा सकता है, जबकि बड़ी इकाइयों के लिए 1500 से 5000 वर्ग फुट तक का क्षेत्र उपयोग में लाया जाता है.

उन्होंने बताया कि 500 से 1000 वर्ग फुट की छोटी मशरूम यूनिट स्थापित करने में करीब 2 से 5 लाख रुपये तक की लागत आती है, जिस पर किसानों को 80 हजार रुपये से लेकर 2 लाख रुपये तक का अनुदान मिल सकता है.
वहीं 1500 से 3000 वर्ग फुट की मध्यम श्रेणी की यूनिट पर 3 से 6 लाख रुपये तक की सब्सिडी प्राप्त की जा सकती है.
हाईटेक और वातानुकूलित (एसी) मशरूम उत्पादन इकाइयों को भी सरकार प्रोत्साहन दे रही है. लगभग 4000 से 5000 वर्ग फुट क्षेत्र में स्थापित होने वाली ऐसी इकाइयों की लागत 40 से 55 लाख रुपये तक हो सकती है, जिस पर 16 से 22 लाख रुपये तक का अनुदान उपलब्ध कराया जाता है.
उन्होंने कहा कि मशरूम उत्पादन इकाई स्थापित करने के इच्छुक किसान अपने जनपद के जिला उद्यान अधिकारी कार्यालय से संपर्क कर सकते हैं.
आवेदन और अनुदान से संबंधित विस्तृत जानकारी उद्यान विभाग की योजनाओं के तहत उपलब्ध कराई जाती है.

