मानसून के इंतजार में किसान, नर्सरी की जगह अब सीधे बुवाई की तैयारी
किसान सीताराम कहते हैं बारिश काफी लेट हो चुकी है, अब तक थरहा तैयार हो जाना चाहिए था. लेकिन प्रकृति पर बस नहीं चलता.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : June 28, 2026 at 7:39 AM IST
कोरबा: इस साल मानसून के रुठने से किसान काफी परेशान हैं. छत्तीसगढ़ के ज्यादातर जिलों में अभी तक बारिश शुरू नहीं हुई है. धान उत्पादन करने वाले किसान अब फसल लगाने को लेकर चिंतित हैं. किसानों का कहना है कि उनके खेत अभी तक सूखे हैं, ऐसे में वो कैसे फसल का रोपा करें. छत्तीसगढ़ के किसान सामान्य तौर पर नर्सरी तैयार करने के बाद खेतों में रोपा लगाते हैं, इससे पैदावार अच्छी रहती है, लेकिन इस वर्ष मानसून कमजोर रहने के कारण अब तक किसी भी किसान की नर्सरी(थरहा) तैयार नहीं हो पाई है.
मानसून के इंतजार में किसान
मानसून के नहीं पहुंचने से किसान अब सीधे बुवाई कर खेती करने की तैयारी कर रहे हैं. स्थानीय भाषा में इसे सूखा धान या बरानी धान भी कहा जाता है. एक अनुमान के मुताबिक इस तरह की खेती में 30 फ़ीसदी तक कम पानी का इस्तेमाल होता है. किसान इस पद्धति से खेती करने की सोच तो रहे हैं, लेकिन साथ ही साथ वह इस बात से आशंकित भी हैं कि पैदावार कम हो सकती है.
मानसून कमजोर रहने से नुकसान
धान की खेती करने वाले किसान सीताराम पटेल कहते हैं, ''इस वर्ष बारिश काफी लेट हो चुकी है, अब तक तो हमारा थरहा तैयार हो जाना चाहिए था. लेकिन प्रकृति पर किसी का बस नहीं चलता. पिछले वर्ष तो अब तक हमने खेतों में रोपा लगा दिया था, लेकिन इस वर्ष समय पर बारिश नहीं होने के कारण हम बारिश का इंतजार कर रहे हैं. खेतों की गुड़ाई और जुताई करके रखी है, लेकिन बारिश नहीं हो रही है. मैंने जानकार और दूसरे किसानों से सुना है कि सूखा धन 90 दिन में तैयार हो जाता है.''

सीधे बुवाई करने से ऐसे धान की खेती की जा सकती है, लेकिन थरहा पद्धति से धान की पैदावार करने पर फसल अच्छी रहती है, बारिश लेट हो तो भी मैं थरहा पद्धति से ही खेती करूंगा, लेकिन इससे नुकसान भी होगा. फसल लेट होगा और दूसरे फसलों को भी नुकसान हो रहा है: सीताराम पटेल, किसान
बुवाई पद्धति से खेती करने की तैयारी
एक और किसान मुन्ना राम कहते हैं कि पिछले वर्ष मैने थरहा लगाकर इसके बाद खेतों में रोपा लगाया था, लेकिन इस वर्ष तो बुवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं दिख रहा है. अब तक बरसात नहीं हुई है. 50 फीसदी का नुकसान लगभग हो चुका है, खाद के दाम भी बढ़ गए हैं. इस वजह से ज्यादा नुकसान उठाना पड़ सकता है. धान काटने पर ही वास्तविक नुकसान का पता चलेगा, लेकिन फिलहाल बारिश नहीं होने से काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

खेतों में सीधे बुवाई पद्धति से खेती करने पर पैदावार थोड़ी कम रहती है, लेकिन अब इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प दिख नहीं रहा है: मुन्ना राम, किसान
सामान्य तौर पर छत्तीसगढ़ में होती है इस तरह की खेती
मानसून के ठीक-ठाक रहने पर छत्तीसगढ़ में किसान थरहा (नर्सरी तैयार करना) से खेती की शुरुआत करते हैं. थरहा धान के खेती की एक प्रारंभिक प्रक्रिया है. जिसे सामान्य भाषा में नर्सरी या पौधशाला कहते हैं. मुख्य खेत में बीज सीधे बोने के बजाए एक छोटे से हिस्से में घने बीज डाले जाते हैं. ताकि छोटे पौधे तैयार हो सकें. जब ये पौधे लगभग 20-25 दिन के हो जाते हैं, तब इन्हें उखाड़कर मुख्य खेत में रोपने के लिए तैयार माना जाता है. इसे ही स्थानीय भाषा में 'थरहा डालना' या 'थरहा तैयार करना' कहते हैं.
इस प्रक्रिया के बाद इस थरहा को निकाल कर रोपा लगाया जाता है. 'रोपा' का अर्थ है नर्सरी (थरहा) से निकले हुए पौधों को मुख्य खेत में लगाना. पहले से तैयार थरहा (पौधों) को उखाड़ा जाता है, और उन्हें पानी से भरे मुख्य खेत में कतारबद्ध तरीके से लगाया जाता है. इस पद्धति में खेत में पानी का भराव होना आवश्यक है. छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों में 'रोपा' लगाना एक सामूहिक गतिविधि की तरह होता है.
कम पानी होने पर किसान सीधे करते हैं बुवाई
बुवाई या जिसे छत्तीसगढ़ में अक्सर बोता भी कहा जाता है, इसका मतलब सीधे मुख्य खेत में बीज डालना होता है. इसमें नर्सरी या थरहा तैयार करने की आवश्यकता नहीं होती. बीज को सीधे खेत की मिट्टी में या हल के पीछे छींटकर डाल दिया जाता है. इसमें पानी की खपत रोपा पद्धति की तुलना में कम होती है. लेकिन एक खतरा पैदावार के काम होने का बना रहता है. बीज के मरने से फसल की पैदावार कम हो सकती है, इसलिए ज्यादातर किसान थरहा पद्धति पर भरोसा रखते हैं.
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