जब सबने छोड़ा साथ, तब राधिका बनीं सहारा... 30 साल से महिला अत्याचार के खिलाफ लड़ रही, बगैर फीस लड़ी हजारों की कानूनी लड़ाई
फरीदाबाद की राधिका बहल तीन दशक से जरूरतमंद महिलाओं को निशुल्क कानूनी सहायता देकर उनके हक और इंसाफ की लड़ाई लड़ रही हैं.

Published : August 22, 2026 at 2:14 PM IST
फरीदाबाद: जब किसी गरीब, असहाय या पीड़ित महिला की कहीं सुनवाई नहीं होती... परिवार और समाज उसका साथ छोड़ देते हैं, तब फरीदाबाद की 50 वर्षीय राधिका बहल उसकी आवाज बनकर सामने आती हैं. दरअसल, पिछले करीब 30 वर्षों से वह बिना किसी फीस के जरूरतमंद महिलाओं को कानूनी मदद दिलाने और उनके अधिकारों की लड़ाई लड़ रही हैं. राधिका घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, धोखाधड़ी, नाबालिगों की शादी, दुष्कर्म समेत कई मामलों में वह अपनी टीम के साथ पीड़ित महिलाओं की मदद करती हैं.
समाजसेवा का भाव बचपन से मिला: ईटीवी भारत ने राधिका से और उन्होंने जिन महिलाओं की मदद की है, उनसे बातचीत की. ईटीवी भारत से बातचीत के दौरान राधिका बताती हैं कि महिलाओं की मदद और समाजसेवा का भाव मुझे अपने माता-पिता से मिला. मेरे पिता सरकारी नौकरी में थे और बचपन में मैंने अपने माता-पिता को जरूरतमंद लोगों की मदद करते देखा. बचपन से ही मेरे मन में जरूरतमंद लोगों की मदद करने की इच्छा थी. माता-पिता को सेवा करते देखकर मुझे भी समाज के लिए कुछ करने की प्रेरणा मिली."

शादी के बाद बदली जिंदगी की दिशा: राधिका बताती है कि, "19 वर्ष की उम्र में शादी के बाद जब मैने बाहरी दुनिया को करीब से देखा तो मुझे महसूस हुआ कि बड़ी संख्या में महिलाएं अत्याचार सहने के बावजूद अपनी बात सामने नहीं रख पातीं. इस बीच मैं एक ऑफिस में नौकरी ज्वाइन की. वहां कई महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार थीं और अपनी परेशानियां मेरे साथ साझा करने लगीं. उन महिलाओं की बातें सुनकर मुझे लगा कि अगर मैं इनके लिए कुछ कर सकती हूं तो जरूर करना चाहिए."
नौकरी छोड़ी, महिलाओं की मदद को बनाया मिशन: फिर क्या था...महिलाओं की समस्याओं ने राधिका को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने नौकरी छोड़कर जरूरतमंद महिलाओं की मदद को अपना जीवन समर्पित करने का फैसला किया. राधिका कहती है किं, " मैंने नौकरी छोड़ दिया और अपनी एक संस्था बनाई, जिसके जरिए जरूरतमंद महिलाओं की मदद करने लगी. शुरुआत में मुझे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा. महिलाओं की शिकायतों को लेकर जब मैं थानों और सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाती थीं तो कई लोग मुझे ताने भी देते थे. लेकिन मैंने उन पर ध्यान न देकर, लोगों की मदद की."
धीरे-धीरे बढ़ा लोगों का भरोसा: राधिका कहती है कि, "समय के साथ महिलाओं और उनके परिवारों का मुझ पर भरोसा बढ़ता गया. अब करीब 150 सदस्य उनके साथ जुड़े हुए हैं. संस्था से जुड़े सदस्य हर साल 750 रुपये का योगदान देते हैं, जिससे संस्था के कामकाज का खर्च चलता है. इसके अलावा कई अनुभवी महिला वकील भी संस्था से जुड़ी हैं, जो जरूरतमंद महिलाओं को कानूनी प्रक्रिया समझाने और आगे की कार्रवाई में सहयोग करती हैं."
हजारों मामलों में पहुंचाई मदद: राधिका ने हजारों महिलाओं की अब तक मदद की है. इस बारे में राधिका कहती हैं कि, "अब तक मैंने हजारों मामलों में महिलाओं की सहायता कर चुकी हूं. कई मामलों में आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई हुई और उन्हें सजा भी मिली. कई महिलाओं को उनके अधिकारों के तहत भरण-पोषण दिलाने में भी संस्था ने सहयोग किया. गरीब परिवार की महिला के लिए कानूनी लड़ाई लड़ना आसान नहीं होता. हमारी कोशिश रहती है कि वह खुद को इस संघर्ष में अकेला महसूस न करे."

दुष्कर्म और एसिड अटैक पीड़िताओं का भी सहारा: खास बात यह है कि राधिका की संस्था गरीब परिवारों से आने वाली दुष्कर्म पीड़िताओं, एसिड अटैक पीड़िताओं और घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं को भी कानूनी सहायता उपलब्ध कराती है. उनका कहना है कि आर्थिक मजबूरी के कारण कई महिलाएं न्याय की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ा पातीं. ऐसे मामलों में संस्था उन्हें जरूरी कानूनी जानकारी और सहयोग उपलब्ध कराने का प्रयास करती है.
रात में भी मदद के लिए पहुंचती हैं: राधिका की सेवा का दायरा केवल दिन के समय तक सीमित नहीं है. कई बार उन्हें देर रात पीड़ित महिलाओं की मदद के लिए फोन आते हैं. राधिका कहती है कि, "कई बार रात 12 या 1 बजे फोन आया कि किसी महिला को तत्काल मदद चाहिए. ऐसे समय में मैं अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंचने की कोशिश करती हूं. इस काम में मेरे परिवार ने भी हमेशा मेरा सहयोग किया है."

काउंसलिंग से सुलझाया प्रेम विवाह का मामला: राधिका की मदद से लाभ पाने वाली फरीदाबाद निवासी सुनीता बताती हैं कि, " मेरे भतीजे का एक लड़की से प्रेम संबंध था. दोनों एक दिन घर से साथ आ गए, जिसके बाद लड़की के परिवार ने पुलिस में शिकायत कर दी. परिवार पुलिस के चक्कर काट रहा था और हमें समझ नहीं आ रहा था कि मामला कैसे सुलझाया जाए. इसके बाद मैं राधिका के पास पहुंचीं. राधिका ने दोनों परिवारों से बातचीत कर काउंसलिंग कराई और दोनों को समझाया. बाद में दोनों की शादी कराने में भी मदद की. आज दोनों अपने बच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी रहे हैं."
आर्थिक धोखाधड़ी में भी दिलाया हक: वहीं, संस्था से मदद ले चुकीं रचना सागर आर्थिक धोखाधड़ी का शिकार हुई थीं. रचना ने कहा कि, "डर के कारण मैंने शुरुआत में परिवार को भी इसकी जानकारी नहीं दी. पुलिस में शिकायत के बाद भी मुझे लगातार थाने के चक्कर लगाने पड़ रहे थे. एक परिचित से मुझे राधिका की संस्था के बारे में जानकारी मिली. इसके बाद राधिका और उनकी टीम ने पुलिस से बातचीत कर कानूनी प्रक्रिया में सहयोग किया. राधिका और उनकी टीम की मदद से आखिरकार मुझे मेरा पूरा पैसा वापस मिल गया."

महिला की मुस्कान को मानती हैं सबसे बड़ी कमाई: राधिका कहती हैं कि, "मेरे लिए सबसे बड़ी कमाई कोई सम्मान या पुरस्कार नहीं, बल्कि उस महिला के चेहरे की मुस्कान है जिसे उसका हक और इंसाफ मिल जाता है." राधिका की कहानी बताती है कि समाजसेवा केवल बड़े मंचों और भाषणों तक सीमित नहीं है. पिछले करीब तीन दशकों से वह उन महिलाओं के साथ खड़ी हैं, जिनके पास अपनी लड़ाई लड़ने के लिए न पर्याप्त आर्थिक संसाधन हैं और न ही कानूनी जानकारी.

