बशीर बद्र: आम ज़बान में तसव्वुर के आसमान से हक़ीक़त की ज़मीन तक का एक नायाब शायर
मशहूर शायर व पद्मश्री डॉ बशीर बद्र का इंतकाल. 91 बरस की उम्र में भोपाल के अपने घर में आखिरी सांस ली.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : May 28, 2026 at 6:56 PM IST
|Updated : May 29, 2026 at 10:00 AM IST
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की माटी ने देश को एक से बढ़कर एक कई महान रचनाकार और सृजन के महारथी दिए हैं. इन्हीं में से एक बेहद मशहूर और सम्मानित नाम है, डॉ. बशीर बद्र. ऐसे तो ग़ज़ल हमेशा से हुस्न-ओ-इश्क़ का लयात्मक अफ़साना कहती रही है, लेकिन बशीर बद्र उर्दू शायरी के उन चंद नामोंम में हैं, जिन्होंने ग़ज़ल को राजा-महाराजाओं की अट्टालिकाओं और दरबारों से बाहर ले आकर सड़क और गली कूचों के किरदार और उनकी परेशानियों से जोड़ दिया. यही वजह है कि उनकी शायरी में सादगी है, गहरा दर्द है और सीधे दिलों में उतर जाने वाले लफ़्ज़ हैं. उनकी यही ख़ासियत उन्हें सभी उम्र के लोगों का पसंदीदा शायर बना देती है. बशीर बद्र का उत्तर प्रदेश से बेहद गहरा और ख़ास नाता रहा है.
उत्तर प्रदेश और बशीर बद्र का सफ़र
साल 1935 में बशीर बद्र का जन्म उसी अयोध्या में हुआ था, जहां भगवान राम पैदा हुए थे. इसी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरती ने उनके भीतर की संवेदनशीलता को गहराई दी थी. शुरुआती पढ़ाई की बुनियाद अयोध्या में ही पड़ी, लेकिन बाक़ी की स्टडी उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) से पूरी की. एएमयू से उन्होंने बी.ए., एम.ए. और फिर पी.एच.डी. की डिग्री प्राप्त की.
अलीगढ़ जाने के बाद उन्हें एक अदबी,यानी साहित्यिक माहौल मिला और इसी माहौल ने उनके भीतर की लय को शब्द बख़्शा और दोनों ने मिलकर उनकी शायरी की वह पगडंडी विकसित कर दी, जिस पर वह ताज़िंदगी चलते रहे. अपनी शैक्षणिक डिग्रियां पूरी करने के बाद उन्होंने मेरठ के एक कॉलेज ज्वाइन कर लिया, जहां वह तक़रीबन सत्रह सालों तक बतौर उर्दू के प्रोफ़ेसर के तौर पर अपनी सेवाएं दीं. अयोध्या,अलीगढ़ और मेरठ उनके लिए महज़ शहर नहीं थे, बल्कि उनकी ज़िंदगी और सृजनशीलत पर इन शहरों की बेहद गहरी छाप थी.
बशीर बद्र का झांसी से भी खास नाता रहा. वह कई बार झांसी आये और यहां के लोगों को अपनी शायरी का मुरीद बना दिया. झांसी में वह अपने दोस्त मशहूर शायर अयाज़ झांसवी के बुलावे पर आते थे. बशीर बद्र खुद भी अयाज़ झांसवी के चाहनेवालों में शामिल थे. अयाज झांसवी और बशीर बद्र दोनों ही मशहूर शायर थे. अयाज़ झांसवी के दामाद कमरुद्दीन ने बताया कि 1996 में अयाज़ झांसवी के इंतकाल के बाद भी वह झांसी आए. उनकी याद में 1997 में मुशायरा हुआ था. बशीर बद्र ने उसे मुशायरे की अध्यक्षता की थी.
ग़ज़ल को मिली एक नई ज़बान
जिस दौर में बशीर बद्र ग़ज़ल की दुनिया में दाख़िल हुए थे, वह ज़माना ग़ज़लों के लिए भाषाई स्तर पर बहुत मुश्किल, जटिल और भारी-भरकम शब्दों के इस्तेमाल का था. मगर, उन्हें ग़ज़ल को अगर आम लोगों तक पहुंचाना था, तो उसे एक ऐसी ज़बान भी बख़्शनी थी, जो आम लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाए और ग़ज़ल सिर्फ़ ग़ज़ल न रहे, बल्कि सोच को प्रोग्रेसिव करने का एक ज़रिया भी बने. बशीर बद्र ने अपनी शायरी में उन शब्दों का इस्तेमाल किया, जो हम और आप रोज़ अपने घरों और संगी-साथियों के साथ बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं.
चूंकि ज़िंदगी से मोहब्बत अलग नहीं किया जा सकता, ज़ाहिर है कि आम लोगों के जज़्बात को शब्दों में ढालने के उस्ताद बशीर बद्र की शायरी का मजमून भी मोहब्बत बना, लेकिन उनकी शायरी में सिर्फ़ मोहब्बत-इश्क़ या हुस्न ही नहीं है, बल्कि,जुदाई, समाज का सच और ज़िंदगी की जद्दोज़हद भी हैं.
उनके कुछ मशहूर शेर,जो आम लोगों की ज़ुबान पर हैं
बशीर बद्र के लिखे कई शेर आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। जब भी कोई अपनों से दूर होता है या जिंदगी की मुश्किलों से लड़ता है, तो उनके शेर हौसला देते हैं. उनका एक बेहद मशहूर शेर है:
"कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।"
ज़िंदगी की कोई मंज़िल नहीं होती।इंसान सफ़र में रहता है,लेकिन मुलाक़ात के मौक़े उन्हें को नसीब है,जो सफ़र में है। इस मौजूं पर उनका एक मशहूर शेर है-
"मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी।"
ज़िंदगी का इम्तिहान
आम आदमी की तरह बशीर बद्र की ज़िंदगी भी कई उतार-चढ़ाव से गुज़रती रही. एक वक्त ऐसा भी आया, जब वह भीतर तक हिल गए. साल था 1987 का और जगह थी मेरठ, जहां वह किसी कॉलेज में प्रोफ़ेसर थे. शहर में दंगे हो गए. बशीर बद्र साहब निश्चिंत थे, मगर दंगे शायर को कहां पहचानते. लोगों के घर जले, तो उन घरों में एक घर बशीर बद्र का भी था. उस घर में सिर्फ़ एक प्रोफ़ेसर नहीं था, उसमें उस प्रोफ़सर की सालों से संजोयी गई बेशक़ीमती किताबें थीं, सालों की कड़ी मेहनत से लिखी गईं कई नायाब ग़ज़लें थीं.
दंगों की आग में जलकर ये तमाम चीज़ें राख हो गईं. इस हादसे ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया. ज़ाहिर है यह उनकी ज़िंदगी का एक अहम मोड़ था, जहां से वह किसी और शहर की तरफ़ रुख़ कर लिया और मेरठ हमेशा के लिए छूट गया. उनका यह दर्द उनके एक बेहद मशहूर शेर के ज़रिए सामने आया:
"लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में।"
सम्मान भी मिला, पहचान भी मिली
उर्दू अदब में उनका योगदान बेमिसाल रहा. इसके लिए भारत सरकार ने उन्हें साल 1999 में 'पद्म श्री' से नवाज़ा. इस नागरिक सम्मान के अलावा उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. बशीर बद्र साहब अपने आख़िरी सालों में विस्मृति के शिकार होने लगे. उनकी मौजूदगी मंचों से ग़ायब होने लगी, लेकिन उत्तर प्रदेश के अयोध्या, अलीगढ़ और मेरठ की वादियों से उठी उनकी आवाज़ आज भी पूरी दुनिया में गूंजती है. उनकी जगह उर्दू ग़ज़ल के आसमान पर जगमगाते शायरों के बीच हमेशा अहम बनी रहेगी.
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