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धड़ों में बंटे राजस्थान कांग्रेस के नेता, क्या राहुल गांधी की नसीहत पर करेंगे अमल ?

कांग्रेस जिलाध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर में राहुल गांधी ने राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को गुटबाजी छोड़ एकजुटता का संदेश दिया था.

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राजस्थान कांग्रेस के नेताओं से मुलाकात करते हुए राहुल गांधी (सोर्स : आईएनसी इंडिया एक्स हैंडल)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : June 2, 2026 at 2:40 PM IST

9 Min Read
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जयपुर: संगठन सृजन अभियान के जरिए चुनकर आए राजस्थान कांग्रेस के जिलाध्यक्षों के 10 दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के अंतिम दिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जिलाध्यक्षों के साथ-साथ कांग्रेस के प्रदेश नेताओं को भी कई संदेश दिए. उनमें एक प्रमुख संदेश यह भी था कि राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को गुटबाजी और मतभेद छोड़कर एकजुट होकर मजबूत रहना चाहिए. अगर नेता मजबूत रहेंगे तो पार्टी मजबूत रहेगी.

राहुल गांधी ने स्वयं का भी उदाहरण देते हुए कहा कि कांग्रेस में कई नेता ऐसे हैं जो मेरी आलोचना करते हैं. मैं चाहूं तो उनका बहुत कुछ बिगाड़ सकता हूं, लेकिन यह कांग्रेस की परंपरा नहीं है. कांग्रेस की परंपरा सबको साथ लेकर चलने की है. इसीलिए तमाम नेता इधर-उधर चलने की बजाय एक साथ रहे और पार्टी को मजबूत करें.

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हालांकि, राहुल गांधी के इस मंत्र का राजस्थान कांग्रेस के नेताओं पर कितना असर होगा यह सवाल कल से सियासी गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. चर्चा इस बात की है कि क्या धड़ों में बंटी राजस्थान कांग्रेस राहुल गांधी की इस नसीहत पर अमल करेगी या फिर पूर्व की भांति ही एक दूसरे पर बयानबाजी जारी रखेंगे.

कई धड़ों में बंटी हुई है राजस्थान कांग्रेस : राजस्थान कांग्रेस कई धड़ों में बंटी हुई है. कांग्रेस में एक खेमा पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का है तो वहीं दूसरा खेमा पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट का है. इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा का भी अपना खेमा है, तो वहीं पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह, सीपी जोशी और हरीश चौधरी का भी अलग गुट है. वहीं, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह दोनों ही खेमे के माने जाते हैं.

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गहलोत-पायलट खेमे के बीच अदावत जग जाहिर : राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट के खेमों के बीच अदावत जग जाहिर है. साल 2018 में कांग्रेस पार्टी की जीत के बाद ही मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों ही खेलों में लगातार तनातनी रही थी. 2020 में सचिन पायलट कैंप की ओर से बगावत करने के चलते गहलोत सरकार पर सियासी संकट आ गया था. जिसके चलते गहलोत सरकार को 40 दिन बाड़ेबंदी में रहना पड़ा था.

उसके बाद से ही लगातार दोनों खेमों में खूब बयानबाजी चलती रही है. गहलोत सरकार में पेपर लीक की घटनाओं को लेकर पूर्व डिप्टी सीएम सचिन पायलट ने अपनी ही सरकार को निशाने पर लिया था और अजमेर से जयपुर तक पदयात्रा की थी. हालांकि, गुटबाजी का नतीजा यह हुआ कि विधानसभा चुनाव में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद भी कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. लेकिन विपक्ष में आने के बावजूद भी दोनों खेमों के बीच तनातनी कम नहीं हुई है. आए दिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत मानेसर कांड का जिक्र करते हुए बगैर नाम लिए सचिन पायलट पर कई बार निशाना साध चुके हैं. सचिन पायलट कैंप के नेताओं की ओर से भी कई बार पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर सियासी हमले होते रहे हैं.

डोटासरा ने गहलोत को छोड़ खुद का कैंप बनाया : प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पहले अशोक गहलोत कैंप के नेता माने जाते थे, लेकिन सियासी संकट के समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद डोटासरा की भी अशोक गहलोत से अदावत होती चली गई. वहीं, अब डोटासरा ने स्वयं का कैंप खड़ा कर लिया है. विधानसभा और लोकसभा चुनाव में भी डोटासरा ने टिकट वितरण में अपने समर्थकों को ज्यादा टिकट दिलाए और उन्हें चुनाव भी जितवाया. इसके बाद से ही डोटासरा पार्टी हाई कमान के नजदीक होते चले गए. संगठन को प्रदेश स्तर से लेकर बूथ स्तर तक खड़ा करने पर भी कई बार हाईकमान ने उनकी प्रशंसा की है. यही वजह है कि कांग्रेस जिलाध्यक्षों के प्रशिक्षण शिविर में भी राहुल गांधी ने दो बार प्रशंसा की.

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हरीश चौधरी और गहलोत कैंप में भी अदावत जग जाहिर : पूर्व मंत्री और मध्य प्रदेश के प्रभारी हरीश चौधरी और अशोक गहलोत कैंप के बीच भी अदावत जग जाहिर है. कई ऐसे मौके आए जब हरीश चौधरी ने खुलकर गलत कैंप को निशाने पर लिया था. बाड़मेर से ही आने वाले पूर्व मंत्री अमीन खान और पूर्व विधायक मेवाराम जैन को पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद उनकी घर वापसी की राह में हरीश चौधरी बड़ा रोड़ा बने हुए थे. लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने दोनों ही नेताओं की घर वापसी करवाई. इसे लेकर भी हरीश चौधरी खासे नाराज हुए थे.

गुटबाजी जैसी कोई बात नहीं : इस मामले में प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने गुटबाजी को लेकर कहा कि ऐसी कोई बात नहीं है. पार्टी में गुटबाजी नहीं है. छोटी-मोटी बात होती है, वो सब पार्टी फोरम पर बैठकर सुलझा लेते हैं. राहुल गांधी ने सबको एकजुट रहकर पार्टी की रीति नीति, कल्चर और विचारधारा को आगे बढ़ाने की बात कही है. किसी एक व्यक्ति के लिए राहुल गांधी का संदेश नहीं था. पार्टी के तमाम नेताओं और कार्यकर्ताओं के लिए उन्होंने यह बात कही है कि सबको एकजुट रहकर काम करना है और संगठन को मजबूत करना है पार्टी को आगे बढ़ाना है.

कांग्रेस के तमाम नेता और कार्यकर्ता राहुल गांधी के इस संदेश को बहुत सकारात्मक तौर पर ले रहे हैं और पूरे जी जान से जनता के मुद्दों पर सड़कों पर उतरेंगे. निकाय-पंचायत चुनाव में भाजपा का सुपड़ा साफ करेंगे तो वहीं साल 2028 में राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनाएंगे. जबकि साल 2029 में केंद्र में इंडिया गठबंधन की सरकार बनाएंगे.

गुटबाजी का खमियाजा पार्टी ने विधानसभा चुनाव में भुगता : राजनीतिक विश्लेषक योगेश शर्मा का कहना है कि राहुल गांधी ने अपनी पुष्कर यात्रा के दौरान राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को गुटबाजी छोड़कर एक होकर मजबूत होने का मंत्र दिया. राहुल ने कहा कि अगर नेता मजबूत रहेंगे तो पार्टी मजबूत होगी, लेकिन क्या राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी खत्म होगी. 2018 से 2023 के बीच राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी के चलते पार्टी को विधानसभा चुनाव में खामियाजा भुगतना पड़ा था.

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राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के बीच अच्छा तालमेल है. दोनों तालमेल से काम कर रहे हैं, इसे लेकर राहुल गांधी ने दोनों के पीठ भी थपथपाई और कहा कि अन्य प्रदेशों को भी इनका अनुसरण करना चाहिए. बड़ा सवाल यह है कि जैसे ही 2028 का चुनाव नजदीक आएगा, राजस्थान कांग्रेस में गुटबाजी और ज्यादा देखने को मिलेगी, क्योंकि तब कुर्सी की दौड़ शुरू होगी और सभी की मंशा कुर्सी तक पहुंचने की होगी. कुर्सी किसी एक को मिलेगी, बाकी सब लोग उसे रोकने में लग जाएंगे.

ऐसे में राहुल गांधी ने जो मंत्र दिया है, उसकी पालना कितनी होगी यह आने वाला वक्त बताएगा, क्योंकि भाजपा सरकार का आधा कार्यकाल निकल चुका है. कांग्रेस सोचती है कि एंटी इनकंबेंसी की वजह से कांग्रेस सत्ता में आ जाएगी, लेकिन अगर गुटबाजी खत्म नहीं हुई तो यहां कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता है. कांग्रेस के लिए 2028 उतना आसान नहीं रहने वाला, जितना राजस्थान कांग्रेस के नेता सोचकर चल रहे हैं. योगेश शर्मा का कहना है कि राहुल गांधी ने जो एकजुटता का मंत्र दिया है उस पर कितना अमल होगा. क्या राजस्थान कांग्रेस के नेता उस पर अमल करेंगे या फिर उसे मंत्र को हवा में उड़ा देंगे, यह भी हमें आने वाले दिनों में देखने को मिलेगा.

कांग्रेस में एक दूसरे को नीचा दिखाने की पॉलिटिक्स चली आ रही है : वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मनीष गोधा का कहना है कि राहुल गांधी ने जो एकजुटता का पाठ राजस्थान कांग्रेस के नेताओं को पढ़ाकर गए हैं. वो कांग्रेस के पिछले इतिहास को देखते हुए बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आने वाले दिनों में राजस्थान कांग्रेस को नगर-निगम,पंचायत और उसके बाद विधानसभा चुनाव में जाना है.

चुनाव की दृष्टि से राहुल गांधी का यह संदेश की खींचतान छोड़ो और आपसी मतभेद बुलाकर एक हो जाओ का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है और इसकी बहुत ज्यादा जरूरत भी है, क्योंकि हमने देखा है कि 2014 से लेकर 2024 तक कांग्रेस में जबरदस्त गुटबाजी और एक दूसरे को नीचा दिखाने की राजनीति चल रही थी. कल जिस तरह से राहुल गांधी ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के तालमेल को लेकर जो टिप्पणी की है, वो राजस्थान कांग्रेस के पुराने नेताओं के लिए भी एक सबक है.

राहुल गांधी का यह बयान कांग्रेस के लिए एक अच्छी शुरुआत माना जा सकता है. मनीष गोधा का कहना है कि नए जिलाध्यक्षों को फील्ड में रहकर काम करना है उस दृष्टि से राहुल गांधी का संदेश बहुत महत्वपूर्ण है और मुझे लगता है कि कांग्रेस के लिए बहुत अच्छा होगा कि वो राहुल गांधी के इस मंत्र पर पूरी तरह से अमल करेंगे तो आने वाला समय कांग्रेस के लिए बेहद अच्छा होगा.