भारत में जरूरत के मुकाबले सिर्फ 25-30 प्रतिशत कॉर्नियल ट्रांसप्लांट, जानिए विशेषज्ञों ने और क्या कहा ?
नेत्रदान पखवाड़े के मौके पर एम्स के विशेषज्ञों ने नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने और डोनर कॉर्निया की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया.

Published : September 1, 2026 at 7:49 PM IST
नई दिल्ली: आंखें हर इंसान के लिए ईश्वर की वो नेमत है जिसके होने से उसकी दुनिया रौशन रहती है, जिसके बगैर किसी का जीवन अंधकारमयी हो जाता है. इसलिए नेत्रदान को महादान माना जाता है. इसलिए हर इंसान अपनी मौत के बाद आंखें दान करने का फैसला लें तो कितने लोगों की अंधेरी दुनिया में रोशनी ला सकता है. इसके मद्देनजर 41वें राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़े के मौके पर एम्स के विशेषज्ञों ने नेत्रदान को लेकर जागरूकता बढ़ाने और डोनर कॉर्निया की उपलब्धता बढ़ाने पर जोर दिया है. भारत में आज भी जरूरत और उपलब्धता के बीच बड़ा अंतर है. देश में हर साल करीब एक लाख कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की जरूरत बताई जाती है, जबकि 25 से 30 हजार ट्रांसप्लांट ही हो पा रहे हैं. यानी जरूरत का सिर्फ 25 से 30 फीसदी हिस्सा ही पूरा हो रहा है.
आंखों का दान किसी के जाने के बाद किसी दूसरे के लिए 'जिंदगी की नई शुरुआत' है. इसी सोच के साथ देश में हर साल राष्ट्रीय नेत्रदान पखवाड़ा मनाया जाता है. साल 1985 में शुरू हुआ ये अभियान अब 41वें साल में पहुंच चुका है. इस साल 25 अगस्त से 8 सितंबर तक देशभर में नेत्रदान को लेकर जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. दिल्ली के एम्स स्थित डॉ. आर.पी. सेंटर का नेशनल आई बैंक भी इस अभियान का अहम हिस्सा है. यहां लोगों को नेत्रदान की जरूरत, इससे जुड़े भ्रम और मृत्यु के बाद समय पर आई बैंक से संपर्क करने के महत्व के बारे में जागरूक किया जा रहा है.
सिर्फ 25 से 30 फीसदी ही हो पा रहे कॉर्नियल ट्रांसप्लांट
भारत में कॉर्नियल ब्लाइंडनेस से जूझ रहे मरीजों के लिए कॉर्नियल ट्रांसप्लांट एक अहम इलाज है, लेकिन ट्रांसप्लांट के लिए सबसे जरूरी है उपयुक्त कॉर्निया डोनर. विशेषज्ञों के मुताबिक देश में सर्जरी करने की क्षमता, प्रशिक्षित कॉर्नियल विशेषज्ञ और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार बढ़ रहा है, लेकिन डोनर टिशू की उपलब्धता अभी भी बड़ी चुनौती है. हर साल करीब एक लाख कॉर्नियल ट्रांसप्लांट की जरूरत के मुकाबले सिर्फ 25 से 30 हजार ट्रांसप्लांट हो पा रहे हैं.
कॉर्नियल रिट्रीवल छह घंटे के अंदर करने का लक्ष्य
चुनौती सिर्फ नेत्रदान की संख्या बढ़ाने की नहीं है. नेत्रदान के बाद भी एक पूरी प्रक्रिया होती है. परिवार के फैसले से लेकर आई बैंक को सूचना देने, समय पर कॉर्निया रिट्रीव करने, टिशू की जांच, सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन और फिर जरूरतमंद मरीज तक उसे पहुंचाने तक हर कदम बेहद महत्वपूर्ण है. विशेषज्ञों के मुताबिक उचित परिस्थितियों में कॉर्नियल रिट्रीवल आमतौर पर करीब छह घंटे के भीतर करने का लक्ष्य रखा जाता है. किसी की मृत्यु के बाद परिवार जितनी जल्दी आई बैंक से संपर्क करेगा, डोनर टिशू के उपयोगी होने की संभावना उतनी बेहतर हो सकती है.
नेत्रदान या कॉर्निया दान की प्रक्रिया
- यह प्रक्रिया आम तौर पर मृत्यु के 12 घंटे के भीतर होती है.
- कोई अस्पताल, अंग खरीद संगठन या कोई अन्य तीसरा पक्ष नेत्र बैंक को कॉल करके सूचित करता है कि किसी की मृत्यु हो गई है और वह दान के लिए मानदंड पूरा कर सकता है.
- नेत्र बैंक निकटतम रिश्तेदार से संपर्क करता है और सहमति प्राप्त करता है. यदि मृतक पंजीकृत दाता था, तो नेत्र बैंक तुरंत आगे बढ़ सकता है.
- मृत्यु के कुछ घंटों के भीतर एक प्रशिक्षित पेशेवर आंख के ऊतक को निकालता है. यह आमतौर पर अस्पताल में होता है, लेकिन अगर मृत्यु घर पर या किसी अन्य सुविधा में हुई है, तो मुर्दाघर या अंतिम संस्कार गृह में भी हो सकता है.
- नेत्र बैंक में आँखों का विश्लेषण और प्रक्रिया की जाती है.
- कॉर्निया को 96 घंटों के भीतर प्रत्यारोपित किया जाता है.
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