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EXPLAINER: वंदे मातरम् कहा तो सीने पर मारी गोली, वीर बलिदानियों की तपोभूमि पर गीत को लेकर राजनीति का नया राग, 2 लाइन पर भारी सियासत

वंदे मातरम् और छत्तीसगढ़ से जुड़ी आजादी के पहले की दास्तां, बाद की सियासत, ब्यूरो चीफ भूपेंद्र दुबे की रिपोर्ट-

VANDE MATARAM AND CHHATTISGARH
वंदे मातरम् और छत्तीसगढ़ से जुड़ी आजादी के पहले की दास्तां (ETV BHARAT CHHATTISGARH)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : August 27, 2026 at 4:14 PM IST

17 Min Read
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रायपुर: मन के सोपान में देश भक्ति की चंचलता का रंग. दिवाश्वन में भी देश भक्ति का गीत, तिरंगे के मान के लिए मन के साथ मर मिटने का जज्बा. जब भी जगृत हो जाए तो देश को आजाद कराने में अपने प्राणो की आहुति देने वालों कि यादें और उनके वीरता का भाव मन को देश भक्ति की अविरल शक्ति से जोड़ता है तो बरबस ही वंदे मातरम् का राग निकल पड़ता है. इसके लिए किसी समय की बात नहीं होती है. इसके लिए किसी नीति की बात नहीं होती है. आस्था और श्रद्धा के लिए किसी कानून की जरूरत नहीं होती है. यह आज के भारत की कहानी है. देश भक्ति के गीत को गाने के लिए कोई भी स्वतंत्र हैं स्वछंद हैं. देश में देश भक्त होने का प्रमाण आज के भारत में देने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि भारतीय संविधान का मान जो मन से रखता है उसके लिए देश भक्ति के गीत गाना किसी कानून के दायरे से बाहर ही होता है. यह एक लाइन अपने यहा कही जाती है. "यथा शक्ति तथा भक्ति". जितना आप कर सकते हैं उतना ही करिए, किसी भी पूजा और सम्मान के लिए बहुत है. लेकिन अगर किसी गीत को लेकर नियम बने, तो इतिहास के पन्नों में दर्ज कुछ तारीखें गवाह बन जाती है एक ऐसे पथप्रदर्शक की जो हमारे अतीत के वीरता का भव्य उदाहरण है.

एक गीत है

वंदे मातरम् एक गीत है. विवाद है- कितना गाया जाए, कितना गाना चाहिए. छत्तीसगढ़ की राजनीति भी इसी रंग में है. वंदे मातरम् कितना गाया जाए इसपर बात हो. वंदे मातरम् कितना गाना चाहिए इसकी चर्चा हो. यह आज के भारत में ही है. लेकिन एक भारत ऐसा भी रहा है जिसमें वंदे मातरम् चाहे जितना गाइए, वह गुनाह था. वर्तमान छत्तीसगढ़ की यही माटी जब किसी और नाम से जानी जाती थी, हुकूमत अंग्रेजों की थी, तब वंदे मातरम् की एक लाइन बोलना भी गुनाह था. वंदे मातरम् चाहे एक लाइन कहिए या पूरी लाइन या अधूरी लाइन, सजा जरूर मिलेगी. वंदे मातरम् गीत गाकर जिन लोगों ने देश को आजादी दिलाने के लिए अपने प्राण दिए, आज की बहस और आज की राजनीति एक सबक जरूर है कि सियासत अपने फायदे के लिए कुछ भी कर सकती है. ये बातें आज की प्रासंगिकता के साथ इसलिए भी जुड़ रही हैं, क्योकि वंदे मातरम् एक गीत है, इसपर राजनीति हो रही है. लेकिन एक भारत ऐसा भी था जिसमें वंदे मातरम् कहने पर गोली मारी गई है जिन्होंने शहादत दी वे यही चाहते थे कि पूरा हिन्द वंदेमातरम् कहे.

इस माटी की एक कहानी ये भी है

1907 में वर्तमान छत्तीसगढ़ मध्य प्रांत और बरार का क्षेत्र माना जाता था. छत्तीसगढ़ के अधिकांश क्षेत्र इसी में आते थे और इसकी राजधानी नागपुर हुआ करती थी. 1956 में भारत सरकार ने मध्य प्रदेश के तौर पर नए राज्य की स्थापना की और तब छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का हिस्सा हुआ करता था. 118 साल पहले रायपुर के टाउन हॉल में वंदे मातरम् के गीत को गाने का जो प्रसंग मिलता है उसमें लॉर्ड कर्जन द्वारा 1905 में बंगाल विभाजन के बाद पूरे देश में एक नई क्रांति पैदा हुई. जिसे उस समय राष्ट्रवादी क्रांति का नाम दिया गया था. इसमें बंगाल का जिस तरीके से विभाजन किया गया था इसका विरोध प्रमुख रूप से था. इसे लेकर पूरे देश में भारतीय राष्ट्रवादियों ,बुद्धिजीवियों, धार्मिक नेताओं द्वारा विरोध किया गया. 1905 का यह राष्ट्रवादी आंदोलन अंग्रेजी हुकूमत के लिए काफी परेशान करने वाला भी रहा. देश आजादी के लिए 1907 में राष्ट्रवादी बुद्धिजीवियों का एक सम्मेलन छत्तीसगढ़ के टाउन हॉल में रखा गया था. जिसका नेतृत्व पंडित रवि शंकर शुक्ला ने किया था. उनके बीच इस बात को रखा गया था कि हम लोग वंदे मातरम् गीत को गाएंगे. हालांकि इसमें कुछ विभेद भी थे लेकिन बाद में उसे खत्म कर दिया गया और रायपुर के टाउन हॉल में पहली बार 1907 में वंदे मातरम् गीत गाया गया.

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वर्तमान के छत्तीसगढ़ में वंदेमातरम् की पहली राग (ETV BHARAT CHHATTISGARH)

क्या कहते हैं इतिहासकार?

छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ इतिहासकार डॉक्टर रमेन्द्रनाथ मिश्र ने बताया कि वंदे मातरम् पहली बार रायपुर के टाउन हॉल में गाया गया था. उन्होंने यह भी कहा कि पंडित रविशंकर शुक्ला के नेतृत्व में बड़ी संख्या में रायपुर के टाउन हॉल में लोग आए थे. वहां पर वंदे मातरम् गीत को गाया गया था. 1907 में पहली बार इस गीत को वहां गाया गया था जिसके 119 साल पूरे हो रहे हैं. आंध्र प्रदेश के वंदे मातरम् क्रांति को लेकर के डॉक्टर रविंद्र नाथ मिश्रा ने कहा कि क्योंकि देश की आजादी का आंदोलन पूरे देश में था तो जिस भी तरह के आंदोलन की शुरुआत पूरे देश में हुई उसका असर सभी राज्यों पर हुआ है. उन्होंने कहा कि क्योंकि बस्तर का इलाका आंध्र से जुड़ता है ऐसे में इसका असर निश्चित तौर पर बस्तर के क्षेत्र पर रहा है. उन्होंने कहा कि उस समय बहुत बड़ा प्रभाव तो नहीं लेकिन आंशिक तौर पर यह वहां देखने को मिला था जो इतिहास के कई अभिलेखों में अंकित भी है.

वंदेमातरम् के वीर बलिदानियों की तपोभूमि

यह धरती वंदे मातरम् गीत गाने की तपोभूमि रही है. वर्तमान छत्तीसगढ़ और उस समय के मध्य क्षेत्र और बरार के रायपुर जिले के टाउन हॉल में पहली बार 1907 में वंदे मातरम् गाया गया था. 1920 में जब पहली बार गांधी जी आए थे तो कई लोग वंदे मातरम् कहते हुए शहीद हो गए थे. देश को आजाद कराने का नारा लेकर जो लोग चले थे उनके लिए वंदे मातरम् गीत काफी जोरों से चलता था. अंग्रेजों के विरोध में जो लोग भी सामने खड़े होते थे वह वंदे मातरम् का ही नारा लगाते थे.

वंदे मातरम्- पहली कहानी

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए गांधीजी 1920 में छत्तीसगढ़ आए थे. कंडेल में धमतरी जिले में नहर सत्याग्रह हुआ था और महात्मा गांधी के विचारों को सुनने के लिए दूर-दूर से लोग आए थे. उनके विचारों से हर कोई प्रभावित था, यह जनजातीय बाहुल्य क्षेत्र था उसके बाद भी गांधी जी के विचारों से प्रभावित हुए. गांधी जी को सुनने के लिए कांकेर के दुर्गा कोतल गांव के भेलवा पानी से सुखदेव पंतल जी आए थे. उनके विचारों से इतना प्रभावित हुए कि यहां पर एक नया बदलाव शुरू हो गया. नागपुर अधिवेशन में हुई बैठक और वहां पर ब्रिटिश हुकूमत को टैक्स न देने को लेकर फैसले से यहां के लोग काफी प्रभावित हुए थे. नागपुर की बैठक के बाद वह चरखा युक्त तिरंगा लेकर वापस आये थे. तिरंगा लेकर इन लोगों ने इस क्षेत्र में विरोध की इतनी बड़ी लाइन खींची की अंग्रेजी हुकूमत ने किसी भी तरह के जुलूस और प्रदर्शन पर रोक लगा दी. हालांकि उसके बाद भी देश के सपूतों ने इसे नहीं रोका. सुखदेव पातर जी को पकड़ा गया, 25 रुपये का जुर्माना लगाते हुए जेल भेज दिया गया.

वंदे मातरम् कहते हुए शहीद, दूसरी कहानी

1939 में हमारे यहां गांधी जी के विचारों से प्रभावित थे. राजनांदगांव का एक टोला है बाजरा टोला में एक डोंगरी है. उसपर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जंगल सत्याग्रह किया था. सत्याग्रह कर रहे लोगों को रोकने के लिए पुलिस ने गोली चलाई ताकि भीड़ तीतर बितर हो जाए. यहां पर जंगल सत्याग्रह कर रहे लोगों पर पुलिस ने गोली चलाई और सबसे आगे होने के नाते रामाधार गौड़ जी को गोली लगी और वे वंदे मातरम् वंदे मातरम् कहते वहीं शहीद हो गए. जंगल सत्याग्रह के नायक रामाधार गौड़ की मौत के बाद वहां पर सत्याग्रह ने और जोर पकड़ लिया और लोगों ने इसका पुरजोर विरोध किया.

वंदे मातरम्- अंग्रेजी हुकूमत के विरोध की पहली लाइन

इतिहासकार रमेन्द्रनाथ मिश्र ने कहा कि 1907 में वंदे मातरम् छत्तीसगढ़ के विक्टोरिया हॉल में गया गया. उसके बाद अंग्रेजों की हुकूमत जिस तरीके से आगे बढ़ी आदिवासी जनजाति भी उससे प्रताड़ित होने लगी. नागपुर में हुए अधिवेशन में जो लोग वर्तमान छत्तीसगढ़ के जिलों से गए थे वह तिरंगा युक्त चरखा लेकर लौटे थे. और उसके बाद कई क्रांतियां यहां हुई थी. जहां भी अंग्रेजों का विरोध होता था वहां वंदे मातरम् का ही नारा लगाया जाता था. उन्होंने कहा कि इसमें चाहे राजनांदगांव की घटना हो या फिर कांकेर की बात घटना हो. अंग्रेजी हुकूमत के लोग स्वतंत्रता सेनानियों को जहां रोकते थे वे लोग अंग्रेजी हुकूमत के विरोध की पहली लाइन ही वंदे मातरम् ही कहते थे.

वंदे मातरम् के 150 साल को लेकर कार्यक्रम

छत्तीसगढ़ में वंदे मातरम् को लेकर साल भर चलने वाला कार्यक्रम शुरु हुआ है. इस कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए सीएम विष्णु देव साय ने कहा कि “वंदे मातरम्” की 150वीं वर्षगांठ केवल एक स्मरणीय अवसर नहीं, बल्कि राष्ट्र की एकता, आत्मगौरव और मातृभूमि के प्रति समर्पण का जीवंत संदेश है. यह आयोजन छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी को भारत की सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ते हुए उनमें देशभक्ति, कर्तव्यनिष्ठा और राष्ट्रीय चेतना की भावना को और गहराई देगा. वंदे मातरम् केवल गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का स्वर है, जिसकी गूंज हर नागरिक के हृदय में नई ऊर्जा और गर्व का संचार करेगी.

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भारतीय जनता पार्टी संकल्प (ETV BHARAT CHHATTISGARH)

राजनीति का राग

वंदेमातरम् कितना गाया जाए इसे लेकर सियासत है. हालांकि आजादी का नायकों को सिर्फ वंदे मातरम् बोलने पर ही गोली मारी गई. अब वंदे मातरम् कितना गाना है इसमें राजनीति का अपना राग रंग है. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने वंदे मातरम् को लेकर कहा कि 1947 में जब नेहरू जी की सरकार बनी उस समय श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी थे. विधानसभा में भी थे. उसमें वंदे मातरम् का विरोध नहीं हुआ. राजेंद्र बाबू ने प्रस्ताव रखा उसमें विरोध नहीं किया. अब सवाल इस बात का है कि इतने विद्वत् लोगों ने जो प्रस्ताव पास किया, स्वीकार किया तो ये लोग क्या उससे बड़े हो गए हैं? जो लोकसभा का सामना नहीं कर पा रहे हैं.

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भूपेश बघेल ने क्या कहा (ETV BHARAT CHHATTISGARH)

आज इसी को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है. आज कहते हैं कि जो वंदे मातरम् नहीं गा रहे हैं वह देशद्रोही है. इसका मतलब यह है कि ये क्या जब खुद नहीं गा रहे थे तब क्या देशद्रोही थे. इनके पूर्वज देशद्रोही थे. ये खुद स्वीकार कर रहे हैं और अपनी बात में फंस रहे हैं. ये भ्रामक प्रचार प्रसार कर रहे हैं. हम लोग तो जब से यह प्रस्ताव पारित हुआ है. पिछले 90 सालों से हम लोग वंदे मातरम् गा रहे हैं.

भाजपा का विरोध और तर्क क्या है?

19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा 1937 के अपने प्रस्ताव को फिर से स्वीकार किया और कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘वन्दे मातरम्’ के केवल प्रथम दो पदों को ही गाने का फैसला लिया. 22 अगस्त 2026 की बैठक में कांग्रेस ने इस प्रस्ताव के फिर से पास किया उसके बाद भाजपा ने इस पर अपना विरोध जारी कर दिया है. राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने भाजपा के लिए निर्देश जारी कर अपनी बात को सार्वजनिक किया है. नितिन नवीन द्वारा पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि भारतीय जनता पार्टी ने 22 अगस्त 2026 को वंदे मातरम् के सम्मान और उसकी ऐतिहासिक विरासत की रक्षा के संबंध में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किया. भारतीय जनता पार्टी 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा 1937 के अपने प्रस्ताव को पुनः स्वीकार करने के फैसले की कड़ी निंदा और स्पष्ट शब्दों में विरोध करती है. भाजपा वन्दे मातरम् को भारत का राष्ट्रीय गीत, भारत माता के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति, स्वतंत्रता संग्राम का मंत्र और भारत की राष्ट्रीय चेतना का अमर प्रतीक मानती है.

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भाजपा ने क्या कहा (ETV BHARAT CHHATTISGARH)

नितिन नवीन ने कहा है कि यह केवल किसी राजनीतिक दल से जुड़ा विषय नहीं है. यह भारत के सम्मान और उन असंख्य देशभक्तों की विरासत का प्रश्न है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. भारतीय जनता पार्टी देशवासियों से आह्वान करती है कि वे स्मरण रखें- वन्दे मातरम् के शब्द कभी इतने शक्तिशाली थे कि एक साम्राज्य उनसे भयभीत हो उठा था. अंग्रेजों ने इन्हें दबाने का प्रयास इसलिए किया क्योंकि इन शब्दों ने प्रतिरोध की चेतना जगाई थी. पीढ़ियों के भारतीयों ने इन्हें स्वतंत्रता, बलिदान और राष्ट्रगौरव के मंत्र के रूप में अपनाया. इस विरासत को आज की वोट-बैंक राजनीति की गणित में सीमित नहीं किया जा सकता. 1947 में भारत की स्वतंत्रता का जयघोष 'वंदे मातरम्' था और आदरणीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के नेतृत्व में 2047 के 'विकसित भारत' का महाघोष भी 'वंदे मातरम्' ही होगा.

वंदे मातरम्' भारत की एकता, अखंडता का अमर मंत्र

वंदे मातरम् गीत को लेकर हो रही राजनीतिक बयानबाजी के बीज सीएम साय ने कहा कि शुरू से ही कांग्रेस की आदत रही है और तुष्टीकरण की जो नीति कांग्रेस की रही है, उसके कारण देश का भी विभाजन हुआ है. आज हम समझते हैं कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग में दोनों में कोई अंतर नहीं रहा. वंदे मातरम् वही गीत है, जिसे आजादी की लड़ाई में स्वतंत्रता सेनानियों ने गाकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया. इतनी ताकत इस राष्ट्रीय गीत में है तो इसका सम्मान होना चाहिए. सीएम ने कहा कि लोकसभा में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक, 2026 का पारित होना राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम्' के सम्मान और राष्ट्रीय प्रतीकों की गरिमा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है. इस विधेयक के माध्यम से 'वंदे मातरम्' को भी अब राष्ट्रगान के समान विधिक संरक्षण प्राप्त होगा.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के दूरदर्शी नेतृत्व में राष्ट्र प्रथम का संकल्प निरंतर सशक्त हो रहा है. राष्ट्र की अस्मिता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव को नई मजबूती प्रदान करने वाले इस ऐतिहासिक निर्णय के लिए माननीय प्रधानमंत्री जी का हार्दिक अभिनंदन. विष्णु देव साय, मुख्यमंत्री.

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भारतीय जनता पार्टी संकल्प (ETV BHARAT CHHATTISGARH)
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भारतीय जनता पार्टी संकल्प (ETV BHARAT CHHATTISGARH)

मुस्लिम लीग की राह पर कांग्रेस- डिप्टी सीएम

कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में वंदे मातरम् के केवल दो पद गाने का फैसले को लेकर छत्तीसगढ़ के डिप्टी सीएम अरुण साव ने कहा कि यह बेहद निराशाजनक है. कांग्रेस की यह हठधर्मिता देश की भावनाओं के साथ धोखा है. उन्होंने कहा कि वंदे मातरम् देश की स्वतंत्रता के संघर्ष का अभिन्न हिस्सा रहा है. अनेक वीर शहीदों ने इसे गाते हुए अपना जीवन बलिदान किया. कांग्रेस का यह फैसला उन महान शहीदों का अपमान है. यह संविधान और देश की 140 करोड़ जनता की भावनाओं का भी अपमान है. कांग्रेस आज भी तुष्टिकरण की राजनीति से बाहर नहीं निकल पाई है. कांग्रेस की राजनीति एक बार फिर मुस्लिम लीग के रास्ते पर जाती दिखाई दे रही है. CWC का यह प्रस्ताव कांग्रेस की इसी सोच को स्पष्ट करता है.

वंदे मातरम् का अपमान डीएनए का दोष- संतोष पांडे

भाजपा के मुख्य प्रवक्ता और सांसद संतोष पांडे ने कहा कि "मावलंकर सभागृह में जिस प्रकार से भौंडा प्रदर्शन संदीप दीक्षित के साथ राहुल गांधी ने किया. इसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है. इसके साथ ही 15 अगस्त के दिन जिस प्रकार से इंडियन नेशनल कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपस्थिति में सोनिया गांधी, राहुल गांधी ने वंदे मातरम् अपमान किया है. इसकी पूरी देश ने निंदा की है. वास्तव में इनके डीएनए में है विभाजन. वंदे मातरम् को भी इन्होंने विभाजित करने की कोशिश की है. किंतु देश उसको आज स्वीकार कर चुका है.

ये राजनीति का गीत है

वंदे मातरम् के गाने के लेकर उठे विवाद को लेकर बात करने पर वरिष्ठ राजनीतिक समीक्षक और पत्रकार दुर्गेश भटनागर ने कहा कि जो लोग वंदे मातरम् गाकर अपना बलिदान दिए हैं उन्होंने कितना गाया है यह पूछकर उन्हें सजा नहीं दी गई थी. छत्तीसगढ़ ऐसे वीरों की भूमि रही है. नागपुर अधिवेशन के बाद के तमाम अभिलेख हैं जो बताते हैं वंदे मातरम् का जुनून किस तरह आजादी के नायकों पर सवार था. वंदे मातरम् कितना गाया जाए इसे कौन पूछ रहा था. बस गीत को गाना है. यही उस समय की देश भक्ति थी. यही देश की बंदगी थी. यही आजादी के नायकों की शक्ति थी. यह गीत नहीं, गौरव था. सोचिए कोई सिर्फ वंदे मातरम् कहे और उसे गोली मार दी जाए इस गीत को गाकर आजादी की जीत को छत्तीसगढ़ ने जिया है. वंदे मातरम् को लेकर सरकार जो भी कर रही है वह राष्ट्रगौरव का विषय है और इस पर कोई बहस या प्रतिक्रिया नहीं हो सकती है. वंदे मातरम् के सम्मान पर हम जैसे लोग एक और गीत ही गा सकते हैं- हम जिएंगे और मरेगें ए वतन तेरे लिए और वह वंदे मातरम् ही है. यह हमारा गीत है. बाकी जो कुछ भी हो रहा हो वह राजनीति का गीत है.

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