Explainer: मेडल में हरियाणा का दबदबा, फिर क्यों नहीं मिली 2030 के कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी?
आपत्ति गुजरात को CWG 2030 की मेजबानी मिलने पर नहीं, सवाल 'मेडल की खान' हरियाणा के खेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर. चंडीगढ़ से भूपेंद्र जिष्टू की रिपोर्ट.

Published : August 14, 2026 at 1:01 PM IST
चंडीगढ़: भारत में जब भी खेल, खिलाड़ी और मेडल की बात होती है, तो हरियाणा का नाम सबसे आगे आता है. कुश्ती, बॉक्सिंग, शूटिंग, एथलेटिक्स, हॉकी और अब पैरा-स्पोर्ट्स तक, देश की अंतरराष्ट्रीय इवेंट्स में हरियाणा के खिलाड़ियों की धाक दिखाई देती है. यही धाक ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में दिखाई दी. भारत ने 39 पदकों के साथ चौथा स्थान हासिल किया. 39 में से 11 पदक हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीते. जो कुल मेडल का 28.2 प्रतिशत बनता है. इन 39 पदकों में देश ने कुल 13 स्वर्ण पदक जीते. जिसमें से 7 स्वर्ण पदक हरियाणा के हरियाणा के एथलीटों ने जीते. गोल्ड मेडल की जीत में हरियाणा का हिस्सा 53.85% बनता है. ओवरऑल मेडल की बात करें, तो महज 2.2% आबादी वाले राज्य की देश के पदकों में हिस्सेदारी 50 प्रतिशत के आसपास है. इस सफलता के बीच एक गंभीर नीतिगत और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी बहस छिड़ गई है. सवाल ये कि हरियाणा को अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन की जिम्मेदारी क्यों नहीं मिलती? जिम्मेदारी तो दूर की बात, गुजरात में होने वाले राष्ट्रमंडल खेल 2030 की को-होस्टिंग तक हरियाणा को नहीं मिली. ऐसा क्यों?
सवाल गुजरात की काबलियत पर नहीं, हरियाणा के स्पोर्टस इंफ्रास्ट्रक्चर पर है: यहां विरोध या आपत्ति गुजरात को राष्ट्रमंडल खेल 2030 की मेजबानी मिलने का नहीं है, बल्कि सवाल ये है कि जब हरियाणा के खिलाड़ियों का योगदान पदकों में सबसे आगे हैं, तो मेजबानी भी मिलनी चाहिए थी, या फिर गुजरात के साथ को-होस्टिंग मिलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसी बात को लेकर अब विपक्ष सरकार पर हमलावर है. सवाल बड़ा ये भी है कि आखिर चूक कहां हुई? ये सवाल गुजरात की योग्यता पर नहीं, बल्कि उस सिस्टम पर है. जिसने भारत की 'स्पोर्ट्स नर्सरी' को केवल पदक जीतने की मशीन तक सीमित कर दिया और उसे एक वैश्विक स्पोर्ट्स हब के रूप में विकसित होने का मौका नहीं दिया.
आंकड़ों की जुबानी- देश का 2.2% हिस्सा, 50% से ज्यादा का दम: यदि पिछले पांच बड़े अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट्स के आंकड़े देखें, तो हरियाणा की भूमिका सिर्फ एक राज्य जैसी नहीं, बल्कि भारतीय खेल जगत की रीढ़ की हड्डी जैसी दिखती है:
- पेरिस ओलंपिक 2024: भारत के कुल 6 पदकों में से 5 पदक (83.33%) हरियाणा के खिलाड़ियों की देन.
- बर्मिंघम CWG 2022: देश के 22 स्वर्ण पदकों में से 9 (40.9%) हरियाणा से आए थे.
- टोक्यो ओलंपिक 2020: भारत के कुल 7 पदकों में से 4 पदक (57.14%) हरियाणा के हिस्से थे. जिसमें एथलेटिक्स का ऐतिहासिक गोल्ड भी शामिल था.
इसके बावजूद, जब अरबों रुपये के खेल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स, विशाल एथलीट्स विलेज और अंतरराष्ट्रीय स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स की मेजबानी की बात आती है, तो हरियाणा इस दौड़ में कहीं नज़र नहीं आता.

मेजबानी का गणित बनाम जमीनी हकीकत: अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (IOC) या राष्ट्रमंडल खेल महासंघ (CGF) किसी शहर को मेजबानी सौंपते वक्त ये नहीं देखते कि उस राज्य के पास मेडल कितने हैं. उनके मानदंड 'लॉजिस्टिक्स', 'एकीकृत इंफ्रास्ट्रक्चर' और 'वित्तीय क्षमता' पर आधारित होते हैं. यहीं पर हरियाणा की नीतियां और स्टेडियमों की बदहाली आड़े आ जाती है:
- राजा नाहर सिंह स्टेडियम (फरीदाबाद): ये स्टेडियम कभी 8 अंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय (ODI) क्रिकेट मैचों की मेजबानी कर चुका है, पिछले कई सालों से ₹115 करोड़ से अधिक के बजट के बावजूद 'री-डेवलपमेंट' के नाम पर बदहाली का शिकार है. बार-बार मिस होती डेडलाइंस के कारण ये प्रोजेक्ट आज भी अधूरा है.
- ताऊ देवी लाल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स (गुरुग्राम): दिल्ली-एनसीआर से सटा और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के पास होने के बावजूद यहां कभी ओलंपिक-साइज का एकीकृत स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स नहीं विकसित किया गया. गुरुग्राम कॉर्पोरेट हब तो बना, लेकिन खेल इंफ्रास्ट्रक्चर में पीछे रह गया.
- राजीव गांधी खेल परिसर (रोहतक) व महावीर स्टेडियम (हिसार): रेसलिंग, बॉक्सिंग और एथलेटिक्स का गढ़ होने के बावजूद इन सेंटरों में विश्व स्तरीय दर्शक क्षमता, आधुनिक रिकवरी/फिजियो सेंटर और ऑल-वेदर एक्वाटिक्स कॉम्प्लेक्स की भारी कमी है.
- ताऊ देवी लाल खेल परिसर (पंचकूला): पंचकूला के पास 'खेलो इंडिया यूथ गेम्स' की मेजबानी का सफल अनुभव और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर जरूर है, लेकिन जब बात राष्ट्रमंडल खेलों जैसे महाकुंभ की आती है, तो इसकी 10-15 हजार की सीमित दर्शक क्षमता और एथलीट्स विलेज न होना राह का रोड़ा बन जाता है.

गुजरात को क्यों मिली CWG 2030 की मेजबानी? इसके विपरीत, गुजरात के अहमदाबाद में सरदार वल्लभभाई पटेल स्पोर्ट्स एन्क्लेव के तहत 1.3 लाख की क्षमता वाला नरेंद्र मोदी स्टेडियम, एकीकृत एक्वाटिक्स सेंटर, इनडोर एरेना और 2036 ओलंपिक के विजन के साथ एथलीट्स विलेज का खाका तैयार है. Commonwealth Sport ने अहमदाबाद को केवल इसलिए नहीं चुना कि वह गुजरात में है. आधिकारिक मूल्यांकन में तकनीकी डिलीवरी, एथलीट एक्सपीरियंस, इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस जैसे कई मानदंड शामिल थे. 2030 के खेलों में 15 से 17 खेल होने हैं. एथलेटिक्स, पैरा एथलेटिक्स, तैराकी, पैरा तैराकी, टेबल टेनिस, पैरा टेबल टेनिस, बॉल्स, वेटलिफ्टिंग, पैरा पावरलिफ्टिंग, आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स, नेटबॉल और Boxing जैसे खेल पहले से कार्यक्रम का हिस्सा हैं, जबकि बाकी खेलों पर आगे फैसला होना है. वहीं खिलाड़ियों के लिए रहने और ट्रैवल की अच्छी व्यवस्था है. यानी अहमदाबाद की दावेदारी सिर्फ स्टेडियम की नहीं थी. ये एक शहर के रूप में आयोजन करने की क्षमता की दावेदारी थी.

सियासत के केंद्र में खेल- 'मेडल हरियाणा के, प्रोजेक्ट्स कहीं और': इस मुद्दे ने देश और राज्य में एक बड़ा राजनीतिक मोड़ भी ले लिया है. हरियाणा के विपक्षी दल और वरिष्ठ नेता इस पर लगातार सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष का तर्क है कि जब देश के 50 फीसदी से अधिक स्वर्ण पदक हरियाणा लाता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स और मेगा बजट का बड़ा हिस्सा भी हरियाणा को मिलना चाहिए. संसद से लेकर सड़क तक ये आवाज उठ रही है कि केंद्र को 'राजधर्म' का पालन करते हुए हर राज्य को समान नजर से देखना चाहिए, ना कि केवल एक राज्य को प्राथमिकता देनी चाहिए.
कांग्रेस विधायक दल ने सर्वसम्मति से ये फैसला किया है कि जो हमारे सांसदों ने संसद में मांग रखी है कि कॉमनवेल्थ खेल 2030 भारत में हो रहे हैं. हरियाणा उसमें को-पार्टनर होना चाहिए. 2010 के कॉमनवेल्थ हो या अब दो प्रतिशत की आबादी वाले हमारे राज्य के खिलाड़ियों ने सबसे ज्यादा मेडल जीते हैं. इसलिए हरियाणा में अलग-अलग जगह कॉमनवेल्थ के खेलों को आयोजित किया जाए. जैसे भिवानी में बॉक्सिंग है, झज्जर में शूटिंग है. बीजेपी ने कुछ नहीं किया. एक नया स्टेडियम नहीं बनाया. खिलाड़ियों की मेहनत से मेडल आए हैं. इसलिए हम कह रहे हैं कि हरियाणा को-होस्ट होना चाहिए. उससे हमें नहीं, खिलाड़ियों को लाभ होगा.- नेता प्रतिपक्ष और हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा
दीपेंद्र हुड्डा ने उठाए सवाल: रोहतक से कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने संसद परिसर में प्रदेश के अन्य कांग्रेस सांसदों के साथ हरियाणा को कॉमनवेल्थ खेल 2030 का मेजबान या सह-मेजबान राज्य बनाए जाने की मांग उठाई. इस दौरान उनके साथ सांसद जयप्रकाश, वरुण मुलाना, सतपाल ब्रह्मचारी और कर्मबीर बौद्ध मौजूद रहे. प्रदर्शन के दौरान दीपेंद्र हुड्डा ने कहा कि "हरियाणा देश को सबसे अधिक पदक विजेता खिलाड़ी देने वाले राज्यों में शामिल है, इसलिए कॉमनवेल्थ खेलों की मेजबानी का अधिकार भी हरियाणा को मिलना चाहिए. जब देश के लिए सबसे ज्यादा मेडल हरियाणा के खिलाड़ी जीतकर लाते हैं, तो फिर कॉमनवेल्थ खेल 2030 केवल गुजरात में क्यों?" सांसदों ने केंद्र सरकार से मांग की कि खिलाड़ियों के योगदान का सम्मान करते हुए हरियाणा को मेजबानी या कम से कम सह-मेजबानी का अवसर दिया जाए.
मेडल हरियाणा देता है, खेल गुजरात मे क्यों?
— Deepender Singh Hooda (@DeependerSHooda) August 3, 2026
आज संसद परिसर में कॉमनवेल्थ खेल 2030 के लिए हरियाणा को मेजबान या सह-मेजबान राज्य बनाने की मांग को लेकर हरियाणा के साथी सांसदों - सांसद जयप्रकाश जेपी जी, सांसद @VarunMullana जी, सांसद सतपाल ब्रह्मचारी जी और सांसद कर्मबीर बौद्ध जी के साथ… pic.twitter.com/E83Ugt9Yo1
सीएम नायब सैनी ने गिनवाई विपक्ष की खामियां: दूसरी ओर, सत्तापक्ष का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय खेल किसी एक राज्य के नहीं बल्कि पूरे देश का गौरव होते हैं. अहमदाबाद में पहले से मौजूद विश्व स्तरीय इंफ्रास्ट्रक्चर और 2036 ओलंपिक की दावेदारी की रणनीति के तहत ही CWG 2030 का रोडमैप तैयार किया गया है. सीएम नायब सिंह सैनी कांग्रेस पर सवाल उठते हुए कहा कि "आज जो भी खेलों में हो रहा है, वो केंद्र में मोदी सरकार की नीति का परिणाम है. हमारे युवाओं ने संघर्ष किया, पसीना बहाया. और ये (कांग्रेस) कहते हैं कि सीएम को खेल नीति के बारे मैं क्या पता? उन्होंने (कांग्रेस) ने तो दो शब्दों की नीति बनाई थी. पदक लाओ, पद पाओ. हमारी सरकार ने हरियाणा में दो हजार खेल नर्सरियां बनाई, जो ग्राउंड ज़ीरो पर बच्चों को तैयार करती है. हम खेल नर्सरियां में 9 से 14 साल के बच्चों को 1500 देते हैं, 15 से 19 साल के बच्चों को दो हजार देते हैं, हॉस्टल में डाइट के 600 सौ रुपये देते हैं."
सीएम नायब सिंह सैनी के नेतृत्व में हरियाणा खेल के क्षेत्र में प्रगति कर रहा है. नर्सी हो, डाइट हो, इंश्योरेंस हो, चोट लगने पर इलाज की बात हो, अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर देने की बात हो. सबकुछ मुहैया करवाया जा रहा है. कांग्रेस ने अपने दस साल के कार्यकाल में कितनी प्रोत्साहन राशि खिलाड़ियों को दी और कितनी नौकरियां दी उसका आकलन हमारी सरकार से करके देख ले. उन्हें खुद अंदाजा हो जाएगा कि किसने अच्छा काम किया. हमने लगातार खिलाड़ियों के लिए अच्छी चीजें देने का काम किया और आगे भी देते रहेंगे. खिलाड़ियों को लेकर राजनीति नहीं करनी चाहिए, बल्कि उनके भीतर भविष्य को लेकर सोचना चाहिए. वो ज्यादा ठीक रहेगा. -गौरव गौतम, खेल मंत्री
'गुजरात जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर हरियाणा में खड़ा होगा तो हरियाणा मेजबानी कर लेगा': हरियाणा बीजेपी अध्यक्ष अर्चना गुप्ता ने कहा कि "गुजरात जैसा इंफ्रास्ट्रक्चर हरियाणा में खड़ा होगा तो मेजबानी हरियाणा कर लेगा, हरियाणा को मना नहीं है. हरियाणा में कांग्रेस व इनेलो की सरकारें रही, भाजपा को तो 12 साल ही सत्ता में आते हुए हैं, बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में समय लगता है." कमियों के सवाल पर उन्होंने कहा कि "ये सवाल उठाने वाली कांग्रेस व इनेलो से पूछो, इतने सालों तक ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की कि हरियाणा कॉमनवेल्थ की मेजबानी कर पाता." इस दौरान उन्होंने स्टेडियम और खेल मैदान में कमियों को दूर कराने का आश्वासन दिया."
खेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर कितना ध्यान दे रही सरकार? हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने दावा किया है कि आने वाले दिनों में हरियाणा के खेल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाएगा.
- इंटरनेशनल लेवल की सुविधाओं से लैस 11 सेंटर पहले चरण में होंगे विकसित
- सरकार ने 800 करोड़ का बजट रखा
- इन केंदों में स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी राई, स्टेट स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स पलवल, टीडीएल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स पंचकूला, अंबाला, कुरुक्षेत्र स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, प्राइवेट एकेडमी करनाल, जींद, गोहाना और यमुनानगर शामिल.
- सरकार का फोकस 13 से 16 साल के बच्चों पर फिक्स रहेगा.
- करीब 1200 बच्चों को विभिन्न खेलों के लिए तैयार किया जाएगा.
- सरकार का फोकस 2028 के आशियां खेलों पर भी रहेगा.
- ओलंपिक पदक विजेता कोच खिलाड़ियों को प्रशिक्षण देंगे
- वहीं 23 अन्य खेल सेंटर भी विकसित किए जाएंगे.
खिलाड़ियों की ज़मीन पर बुनियादी सवाल: हरियाणा की माटी ने हमेशा देश को 'धाकड़' खिलाड़ी दिए हैं. मिट्टी के अखाड़ों और सीमित संसाधनों के दम पर हरियाणा के एथलीटों ने पूरी दुनिया में तिरंगा लहराया है. लेकिन अब सवाल ये उठ रहा है कि क्या राज्य के खिलाड़ियों को जीवन भर सिर्फ पदक जीतने की जिम्मेदारी ही दी जाएगी, या उन्हें अपने ही घर में अपने समर्थकों के सामने विश्व स्तरीय प्रतियोगिताओं में खेलने का मौका भी मिलेगा?
हरियाणा के खिलाड़ियों और जनता की मांग जायज है, क्योंकि अभी आप ने देखा कि कॉमनवेल्थ में भी भारत की टीम में आधे से ज्यादा बच्चे हरियाणा के थे. सबसे ज्यादा गोल्ड देश के लिए हरियाणा के खिलाड़ियों ने जीते. हम तो चाहते हैं कि अगर अभी भी कुछ हो सकता है, तो कॉमनवेल्थ या एशियन गेम्स हरियाणा में करवाया जाए. इससे हरियाणा के अधिक बच्चे आगे बढ़ेंगे और देश और हरियाणा का नाम रोशन करेंगे. - एसीपी दिनेश कुमार, पूर्व बॉक्सिंग खिलाड़ी, अर्जुन अवार्डी
क्या कहते हैं स्पोर्ट्स मामलों के जानकार? "अखाड़ा" पुस्तक के लेखक और पूर्व में एक बड़े मीडिया हाउस के स्पोर्ट्स एडिटर रहे सौरभ दुग्गल ने इस मुद्दे पर कहा कि "कॉमनवेल्थ खेलों के लिए जो बीडिंग थी, वो पिछले साल पूरी हो चुकी थी. नवंबर 2025 में इसको अहमदाबाद में करवाने का ऐलान हो गया था. ऐसे में कांग्रेस को उसी वक्त मुद्दा उठाना था जब बिडिंग किनॉरक्रिया शुरू हुई थी. उस वक्त कहते कि अहमदाबाद के साथ किस अन्य शहर को इसमे शामिल किया जा सकता है. अब जब ये प्रक्रिया हो चुकी है, तो इसकी मांग करने का कोई औचित्य नहीं. भारत के अहमदाबाद को मेजबानी मिल चुकी है. ग्लासगो कॉमनवेल्थ में तो सिर्फ फ्लैग हैंडओवर किया गया. इस मामले में राजनीति नहीं होनी चाहिए. अगर केंद्र सरकार की बात करें तो उनको देखना चाहिए कि अगर कोई शहर इसमें को-होस्ट बन सकता है, तो जो अहमदाबाद के आस पास के राज्यों के शहर हैं, उनको जोड़कर को-होस्ट किया जा सकता है. जब 2030 कॉमनवेल्थ खेलों की बात हुई थी, तो दो शहरों की बात हुई थी. जिसमें भुवनेशर और अहमदाबाद थे. जब इसकी जमीनी हकीकत देखी गई और बिडिंग की बात हुई, तो अहमदाबाद को ज्यादा अहमियत मिली. वहां ज्यादा फैसलिटी दिखी, या यूं कहे कि राज्य सरकार की ज्यादा कमिटमेंट दिखी. उसके बाद नवंबर 2025 में ये बिड अहमदाबाद को मिली."
पदक विजेता खिलाड़ियों को सम्मान: ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी को हरियाणा सरकार 6 करोड़, सिल्वर लाने वाले को 4 करोड़ और कांस्य पदक जीतने वाले को 2.5 करोड़ रुपये का कैश प्राइज देती है. इसके अलावा चौथे स्थान पर रहने वाले को भी 50 लाख रुपये कैश दिए जाते हैं. वहीं कॉमनवेल्थ के गोल्ड मेडल खिलाड़ी को 1.50 करोड़, सिल्वर मेडल को 75 लाख और कांस्य पदक को 50 लाख का इनाम सरकार देती है. ऐसे ही एशिया खेलों मैं स्वर्ण पदक जीतने वाले खिलाड़ी को तीन करोड़, रजत पदक पर 1.5 करोड़ और कांस्य पदक पर 75 लाख का इनाम देती है.
क्या अब भी संभल सकता है हरियाणा? हरियाणा के लिए ये समय केवल शिकायत करने का नहीं, बल्कि ठोस रणनीति बनाने का है. यदि राज्य को भविष्य में एशियन गेम्स या ओलंपिक की सह-मेजबानी (Co-hosting) का दावा ठोकना है, तो उसे 'मेडल फैक्ट्री' के साथ-साथ 'स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर हब' बनना होगा. गुरुग्राम या फरीदाबाद जैसे एनसीआर शहरों में एक एकीकृत मेगा स्पोर्ट्स सिटी का निर्माण, अधूरे प्रोजेक्ट्स को तेजी से पूरा करना और कॉर्पोरेट इन्वेस्टमेंट को खेल अवसंरचना में शामिल करना ही हरियाणा को अगला 'होस्ट स्टेट' बना सकता है.

