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Special: जयपुर नगर निगम के 32 साल, 70 वार्डों के सफर से 150 वार्डों की चुनौती तक, पहले मेयर ने बताया कैसे बदला शहर

जयपुर के पहले महापौर ने 1994 से 2026 तक के सफर और आगामी चुनावों पर बेबाकी से बात की. पढ़िए अंकुर जाकड़ की स्पेशल रिपोर्ट.

जयपुर नगर निगम
जयपुर नगर निगम (ETV Bharat GFX)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : September 2, 2026 at 5:34 PM IST

11 Min Read
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जयपुर: वक्त बदलता है, तो शहर का मिजाज और उसकी जरूरतें भी बदल जाती हैं. साल 1994 में जब मानसरोवर, वैशाली नगर और प्रताप नगर सिर्फ विकास के नक्शे पर उभर रहे थे, तब जयपुर नगर निगम की कमान संभालने वाले पहले शख्स थे मोहनलाल गुप्ता. आज वही जयपुर 150 वार्डों के साथ एक बड़े चुनावी मुहाने पर खड़ा है. विकास के लिए बजट तो अब हजारों करोड़ का है, लेकिन क्या वो जमीन पर दिखता है? आखिर क्यों पहले की 20 समितियां आज की व्यवस्था से ज्यादा ताकतवर थीं? ईटीवी भारत से एक विशेष और बेबाक बातचीत में जयपुर के पहले महापौर और तीन बार के पूर्व विधायक मोहनलाल गुप्ता ने 1994 के दौर से लेकर आज के 'ग्रेटर और हेरिटेज' के बंटवारे, बजट की हकीकत और विधायकों के दखल पर खुलकर अपनी बात रखी है.

भौगोलिक स्थिति और शुरुआती विकास: पिंकसिटी के इतिहास में 1994 का साल बेहद अहम रहा. इसी साल पहली बार जयपुर नगर निगम का गठन हुआ और 70 वार्डों में नगर निगम चुनाव कराए गए. चुनाव में भारतीय जनता पार्टी का बोर्ड बना और मोहनलाल गुप्ता जयपुर के पहले महापौर चुने गए. ईटीवी भारत से बातचीत में जयपुर के पहले महापौर मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि 1994 में गुलाबी नगरी की आबादी आज के मुकाबले करीब आधी थी, लेकिन नगर निगम का क्षेत्रफल लगभग वही था जो आज है. उस समय मानसरोवर, वैशाली नगर, प्रताप नगर, सिरसी रोड जैसे कई इलाके विकास के चरण में थे. उन्होंने बताया कि आज जिन इलाकों में बड़े-बड़े मकान, दुकानें, बाजार, सड़कें और पार्क दिखाई देते हैं, उस दौर में वे तेजी से विकसित हो रहे क्षेत्र थे. समय के साथ इन क्षेत्रों में आबादी बढ़ी, नई कॉलोनियां बसीं और शहर का विस्तार हुआ. गुप्ता के मुताबिक, आबादी के साथ वोटर बढ़े, नगर निगम का कार्यक्षेत्र बढ़ा और जनता की अपेक्षाएं भी बढ़ती गईं.

मोहनलाल गुप्ता से खास बातचीत (ETV Bharat Jaipur)

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कॉलोनी तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाना था लक्ष्य: मोहनलाल गुप्ता के अनुसार उनके कार्यकाल में विकास को सिर्फ नगर निगम तक सीमित नहीं रखा गया. प्रताप नगर, सांगानेर, मानसरोवर, सिरसी रोड, आगरा रोड और अजमेर रोड सहित विभिन्न क्षेत्रों में विकास कार्य शुरू किए गए. उन्होंने कहा कि चाहे क्षेत्र नगर निगम के अंतर्गत आता हो, जयपुर विकास प्राधिकरण, हाउसिंग बोर्ड या सहकारी समितियों के माध्यम से विकसित हो रहा हो, वहां सड़क, बिजली, पानी और सीवरेज जैसी मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने पर जोर दिया गया. उनके मुताबिक उस दौर में कोशिश यही थी कि प्रत्येक कॉलोनी तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचें और जनता को सुविधाएं उपलब्ध कराकर उनका विश्वास जीता जाए.

भाजपा के बोर्ड का इतिहास और प्रशासनिक प्रयोग: जयपुर में लगातार भाजपा के बोर्ड बनने के सवाल पर मोहनलाल गुप्ता ने कहा कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण काम और सेवा भाव रहा है. उनका कहना है कि भाजपा के बोर्ड ने प्रत्येक कॉलोनी में मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने का प्रयास किया. जनता तक सुविधाएं पहुंचीं और इसी काम के आधार पर लोगों का विश्वास हासिल हुआ. यही वजह है कि 1994 से लेकर अब तक जयपुर में जब-जब नगर निगम के चुनाव हुए, भाजपा का बोर्ड बनता रहा. हालांकि, इस दौरान जयपुर नगर निगम का स्वरूप कई बार बदला और अलग-अलग राजनीतिक प्रयोग भी हुए.

जयपुर नगर निगम
70 वार्ड से 150 वार्ड हुए (ETV Bharat GFX)

गुप्ता बोले- ऐसे प्रयोग नहीं होने चाहिए: नगर निगम के बदलते स्वरूप पर गुप्ता ने कहा कि पहले पूरे जयपुर के लिए एक महापौर होता था और सभी वार्डों के पार्षद उसके साथ मिलकर काम करते थे. बाद में कांग्रेस सरकार के समय महापौर का प्रत्यक्ष चुनाव कराया गया. प्रत्यक्ष चुनाव में कांग्रेस का महापौर चुना गया, लेकिन नगर निगम बोर्ड में भाजपा का बहुमत होने के कारण महापौर और बोर्ड के बीच टकराव की स्थिति बनी. इसके बाद जयपुर को दो नगर निगमों- हेरिटेज और ग्रेटर में बांट दिया गया और दो महापौर बनाए गए. गुप्ता इसे भी सफल प्रयोग नहीं मानते. उन्होंने कहा कि शहर के समग्र विकास के लिए इस तरह के राजनीतिक या प्रशासनिक प्रयोग नहीं होने चाहिए. जयपुर की समस्याएं पूरे शहर से जुड़ी हैं, इसलिए प्रशासनिक व्यवस्था भी पूरे शहर को ध्यान में रखकर होनी चाहिए.

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जयपुर को एक मजबूत एडमिनिस्ट्रेटिव बोर्ड चाहिए: गुप्ता के अनुसार जयपुर जैसे बड़े शहर के लिए ऐसा प्रशासनिक बोर्ड होना चाहिए जो पूरे शहर की जरूरतों को देखकर योजनाएं तैयार करे. ट्रांसपोर्टेशन, प्रदूषण, सड़क, सिविल लाइन, पार्क और दूसरी शहरी समस्याओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि पूरे जयपुर की तस्वीर को सामने रखकर देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि शहर के विस्तृत विकास की योजना बने और उसी के आधार पर काम आगे बढ़ाया जाए.

जयपुर नगर निगम
जयपुर के अब तक के मेयर (ETV Bharat GFX)

नगर निगम की आंतरिक कार्यप्रणाली और बजट: अपने कार्यकाल की नगर निगम व्यवस्था का जिक्र करते हुए मोहनलाल गुप्ता ने बताया कि उस समय नगर निगम में करीब 20 समितियां बनाई गई थीं और उनके चेयरमैन होते थे. उनका कहना है कि नगर निगम का पूरा काम केवल महापौर के हाथ में केंद्रित नहीं था. बोर्ड में प्रस्ताव आते थे, समितियों में प्रस्ताव जाते थे और समितियां अपने-अपने क्षेत्र से जुड़े विषयों पर काम करती थीं. काम का विकेंद्रीकरण होना चाहिए, यही व्यवस्था प्रभावी थी. उनके अनुसार अब व्यवस्था ज्यादा केंद्रित हो गई है. उनका सुझाव है कि समितियों को जिम्मेदारी दी जाए, उनके पास प्रस्ताव जाएं, प्रस्ताव पारित हों और फिर उसी के आधार पर काम हो.

हजारों करोड़ का बजट, लेकिन काम नहीं दिखता: आज नगर निगम में हजारों करोड़ रुपए के बजट प्रस्ताव पारित होते हैं, लेकिन कई बार उनका असर जमीन पर दिखाई नहीं देता. इस पर गुप्ता ने मौजूदा प्रशासनिक प्रक्रिया को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा कि नगर निगम का बजट पास होने के बाद राज्य सरकार से उसकी स्वीकृति, प्रशासनिक स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति और टेंडर जैसी लंबी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है. इस पूरी प्रक्रिया में काफी समय लग जाता है और कई बार बजट की अवधि ही समाप्त हो जाती है. गुप्ता का सुझाव है कि जरूरी विकास कार्यों को पहले से पाइपलाइन में डाल दिया जाए. टेंडर, प्रशासनिक और वित्तीय स्वीकृति की प्रक्रिया समानांतर रूप से चलती रहे, ताकि बजट स्वीकृत होने के बाद काम शुरू करने में अनावश्यक देरी न हो.

जयपुर में बढ़ता ट्रैफिक
जयपुर में बढ़ता ट्रैफिक (ETV Bharat Jaipur)

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हर तीन महीने में बोर्ड बैठक का प्रावधान: नगर पालिका अधिनियम में बोर्ड की बैठक हर तीन महीने में होने का प्रावधान है, लेकिन गुप्ता के अनुसार व्यवहार में ऐसा नहीं हो रहा. उन्होंने कहा कि शहर के विकास के लिए बोर्ड की बैठक नियमित होना जरूरी है. जरूरत के अनुसार हर दूसरे या तीसरे महीने बैठक होनी चाहिए और आवश्यकता होने पर इससे भी ज्यादा बैठकें हो सकती हैं. उनका मानना है कि समितियों की बैठक हर महीने होनी चाहिए, क्योंकि विकास से जुड़े अधिकांश फैसले इन्हीं समितियों के माध्यम से आगे बढ़ने चाहिए. उन्होंने स्वीकार किया कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं में समय लगने के कारण समितियों की बैठकें भी कम होती हैं और बोर्ड की बैठकें उससे भी कम. इस व्यवस्था में सुधार की जरूरत है.

विधायकों का दखल और कानूनी स्थिति: नगर निगम के कामकाज में विधायकों की भूमिका और दखल को लेकर भी मोहनलाल गुप्ता ने स्पष्ट राय रखी. उन्होंने कहा कि राजनीतिक रूप से विधायकों का प्रभाव जरूर रहता है, लेकिन कानूनी तौर पर नगर निगम के कामकाज में विधायक की भूमिका महापौर और पार्षदों से ऊपर नहीं है. उनके अनुसार विधायक राजनीतिक प्रभाव, पार्टी में पकड़ और टिकट वितरण जैसी ताकतों के आधार पर अपनी बात मनवा सकते हैं, लेकिन नगर निगम का बोर्ड अपने अधिकार क्षेत्र में स्वतंत्र है. उन्होंने कहा कि जयपुर का मालिकाना प्रशासनिक अर्थ में नगर निगम बोर्ड के पास है और महापौर को ज्यादा से ज्यादा अधिकार मिलने चाहिए. विधायक इस व्यवस्था का हिस्सा हैं, लेकिन महापौर से ऊपर नहीं.

लगातार बढ़ रही पार्किंग की समस्या,
लगातार बढ़ रही पार्किंग की समस्या, (ETV Bharat Jaipur)

नए बोर्ड की प्राथमिकताएं और पर्यावरण: अब जयपुर में 150 वार्डों पर चुनाव होने हैं. ऐसे में नए बोर्ड और महापौर से उम्मीदों को लेकर गुप्ता ने कहा कि आने वाला बोर्ड शहर की वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता दे. उनके मुताबिक आज जयपुर की सबसे बड़ी जरूरतें हैं- पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन, व्हीकल्स पार्किंग, सड़कों की स्थिति, सड़क पर बढ़ती भीड़ को व्यवस्थित करना, पैदल चलने वालों के लिए पर्याप्त जगह, प्रदूषण से निजात दिलाना, हरियाली और पार्क.

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500 से ज्यादा पार्क विकसित किए गए: उन्होंने कहा कि बाजारों और कॉलोनियों के आसपास पर्याप्त पार्किंग स्थल विकसित किए जाने चाहिए, ताकि सड़कों पर वाहनों का दबाव कम हो सके. मोहनलाल गुप्ता ने अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए दावा किया कि उनके दौर में 500 से ज्यादा पार्क विकसित किए गए थे. आज जयपुर की बढ़ती आबादी और प्रदूषण को देखते हुए ज्यादा से ज्यादा स्थानों पर पार्क विकसित किए जाने चाहिए. इन पार्कों को केवल मनोरंजन स्थल नहीं, बल्कि 'ऑक्सीजन सेंटर' के तौर पर विकसित करने की जरूरत है. उनके मुताबिक शहर के नागरिकों को साफ हवा, स्वच्छ वातावरण और बेहतर जीवन देने के लिए हरियाली बढ़ाना आने वाले बोर्ड की बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए.

जयपुर नगर निगम कार्यालय
जयपुर नगर निगम कार्यालय (ETV Bharat Jaipur)

1994 का जयपुर बनाम 2026 का जयपुर: 1994 में 70 वार्डों वाले जयपुर में आबादी और वोटरों की संख्या कम थी. शहर का विस्तार आज जितना दिखाई देता है, उतना विकसित नहीं था. कई बड़े इलाके उस समय विकास के चरण में थे. आज जयपुर 150 वार्डों तक पहुंच चुका है. आबादी बढ़ी, मतदाताओं की संख्या बढ़ी, कॉलोनियां बढ़ीं, वाहन बढ़े और नागरिक सुविधाओं की मांग भी बढ़ी. साथ ही शहर के सामने ट्रैफिक, पार्किंग, प्रदूषण, सड़क और हरियाली जैसी नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. अब 150 वार्डों वाले जयपुर में चुनावी मुकाबला शुरू हो चुका है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है, किस राजनीतिक दल का बोर्ड बनता है, कौन महापौर की कुर्सी संभालता है और नया बोर्ड 2026 के जयपुर की बदलती जरूरतों के मुताबिक कितना काम कर पाता है?

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