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125 किलो चांदी से तैयार हुआ ऐतिहासिक मंदिर का गर्भगृह, 7 तोले सोने का भी हुआ प्रयोग

125 किलो चांदी की आभा में दमका हिमाचल ये ऐतिहासिक मंदिर, नवनिर्मित गर्भगृह में विधि-विधान से विराजीं मां काली.

नाहन कालीस्थान मंदिर
नाहन कालीस्थान मंदिर (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : February 23, 2026 at 8:20 AM IST

6 Min Read
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सिरमौर : हिमाचल प्रदेश के जिला सिरमौर की पावन धरा पर आस्था का एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है. शहर के ऐतिहासिक कालीस्थान मंदिर के नवनिर्मित गर्भगृह में वैदिक मंत्रोच्चार, हवन और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच मां काली की प्रतिमा विधि-विधान से स्थापित कर दी गई. जैसे ही गर्भगृह के पट खुले, चांदी की दिव्य आभा और आध्यात्मिक वातावरण ने श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया.

दरअसल, नए गर्भगृह के निर्माण में अब तक 125 किलोग्राम चांदी का उपयोग किया जा चुका है, जबकि 8 से 10 किलोग्राम चांदी का कार्य अभी शेष है. गर्भगृह के शिखर पर स्थापित कलश 7 तोले सोने से तैयार किया गया है, जो दूर से ही इसकी भव्यता का संदेश दे रहा है. कालीस्थान मंदिर प्रबंधन समिति के सचिव देवेंद्र अग्रवाल के अनुसार इस समूचे कार्य पर लगभग 4 से 5 करोड़ रुपए व्यय किए जा चुके हैं. उल्लेखनीय है कि यह निर्माण कार्य स्थानीय श्रद्धालुओं एवं बाहरी दानी सज्जनों के सहयोग से संपन्न हुआ है. आस्था और समर्पण का अद्भुत संगम इस निर्माण में स्पष्ट रूप से झलकता है.

मंदिर का गर्भगृह
मंदिर का गर्भगृह (ETV Bharat)

बनारस-जयपुर से बुलाए गए थे कारीगर

इस भव्य निर्माण के पीछे कुशल कारीगरों की महीनों की तपस्या छिपी है. गर्भगृह में की गई बारीक चांदी की नक्काशी का कार्य बनारस से आए चार से पांच अनुभवी कारीगरों ने अत्यंत सूक्ष्मता और श्रद्धा के साथ संपन्न किया. हर आकृति और हर उभार में उनकी कला व भक्ति का सुंदर समन्वय दिखाई दे रहा है. वहीं शिखर पर स्थापित स्वर्ण कलश को जयपुर के पारंपरिक स्वर्णकारों ने तैयार किया. सोने की चमक में न केवल शिल्प कौशल, बल्कि सांस्कृतिक विरासत की गरिमा भी प्रतिबिंबित होती है. महज चार महीनों में इन कारीगरों ने दिन-रात परिश्रम कर इस दिव्य स्वप्न को साकार कर दिया.

आस्था, कला और आध्यात्म संगम

कालीस्थान मंदिर पहले से ही न केवल क्षेत्र बल्कि हरियाणा के कई इलाकों के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र रहा है, लेकिन इस भव्य गर्भगृह ने इसकी दिव्यता और गरिमा में एक नई आभा जोड़ दी है. यह स्थल अब सिरमौर की समृद्ध आध्यात्मिक परंपरा, सामूहिक सहयोग और श्रद्धा की सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में और अधिक गौरवान्वित हो उठा है. जब समाज एकजुट होकर आस्था की ज्योति जलाता है, तो स्थापित मंदिर भी नई ऊर्जा से आलोकित हो उठते हैं और कालीस्थान मंदिर इसका सजीव उदाहरण बन गया है.

चांदी की नक्काशी
चांदी की नक्काशी (ETV Bharat)

ऐतिहासिक विरासत व अटूट आस्था का संगम

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले का ऐतिहासिक शहर नाहन, जितना अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, उतना ही अपनी प्राचीन धार्मिक धरोहरों के लिए भी प्रसिद्ध है. यहां स्थित 'काली स्थान मंदिर' न केवल शक्ति उपासना का केंद्र है, बल्कि ये सिरमौर रियासत के राजाओं की धर्मपरायणता और समृद्ध इतिहास का जीवंत प्रमाण भी है.

ऐतिहासिकता और आध्यात्मिक महत्व के कारण विशेष स्थान

नाहन एक ऐतिहासिक नगर है, जिसकी धार्मिक धरोहरें भी उतनी ही प्राचीन और समृद्ध हैं. इस शहर के मंदिरों का निर्माण अधिकांश रियासत काल के दौरान हुआ. पिछले तीन दशकों में कुछ नए मंदिर भी बने, लेकिन कालीस्थान मंदिर अपनी ऐतिहासिकता और आध्यात्मिक महत्व के कारण विशेष स्थान रखता है. यह मंदिर शहर के उत्तर-पूर्व में स्थित है और इसे 'कालीस्थान' के नाम से भी जाना जाता है.

कुमाऊं वाली रानी स्वयं कुमाऊं से लेकर आई थीं मां की मूर्ति

क्षत्रिय समुदाय में मां काली को युद्ध और शक्ति की देवी के रूप में पूजा जाता है. इसी कारण पूरे देश में काली मंदिरों की स्थापना की गई. शाही परिवार के सदस्य कंवर अजय बहादुर सिंह ने बताया कि नाहन में काली मंदिर का निर्माण 1830 ई. (विक्रमी संवत् 1887) में सिरमौर के राजा विजय प्रकाश द्वारा करवाया गया था. कहा जाता है कि इस मंदिर की मूर्ति को कुमाऊं वाली रानी साहिबा स्वयं कुमाऊं से लेकर आई थीं. उनकी श्रद्धा और आस्था को देखते हुए राजा विजय प्रकाश ने मंदिर का निर्माण करवाने का निर्णय लिया.

मंदिर में हुई चांदी की नक्काशी
मंदिर में हुई चांदी की नक्काशी (ETV Bharat)

महंत परंपरा और मंदिर की देखरेख

मंदिर में पूजा-अर्चना की जिम्मेदारी जोगीनाथ महंत को सौंपी गई थी. बाद में राजा फतेह प्रकाश ने इसी मंदिर परिसर में 24 भुजा वाली देवी के मंदिर का निर्माण करवाया, जिसे आज श्रद्धालु बाला सुंदरी माता के रूप में पूजते हैं. इस मंदिर के पहले महंत बाबा भृडंग नाथ कनफटा योगी थे. उनके बाद आमनाथ, तोपनाथ, ज्वाला नाथ और वीरनाथ ने महंत की गद्दी संभाली. महंत जगन्नाथ की मृत्यु के बाद उनके चेले ने कार्यवाहक के रूप में मंदिर की देखरेख की, लेकिन स्वभाव सही न होने के कारण राजा ने उसे महंत नियुक्त नहीं किया. इसके बाद राजा ने संस्कृत भाषा के ज्ञाता मोतीनाथ नामक साधु को मंदिर की देखरेख की जिम्मेदारी सौंपी. सिरमौर रियासत के शासक मंदिरों और धार्मिक अनुष्ठानों में गहरी रुचि रखते थे, जिसका प्रमाण आज भी यहां के प्राचीन मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में देखा जा सकता है.

मंदिर परिसर और धार्मिक महत्व

मां बाला सुंदरी माता त्रिलोकपुर के हूबहू मंदिर की एक प्रतिकृति आज भी नाहन के शाही महल में मौजूद है. शहर के पहले महंत का दर्जा बाबा बनवारी दास जी को प्राप्त है, जिनका जन्म नाहन की स्थापना के वर्ष में ही हुआ था. कालीस्थान मंदिर के एक कोने में विशाल वट वृक्ष के नीचे हनुमान जी की भव्य प्रतिमा स्थापित है. हालांकि, इसकी प्राण-प्रतिष्ठा की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है. माना जाता है कि इस मंदिर की मूर्ति की स्थापना शहर के ही कुछ लोगों द्वारा मूल स्थान पर की गई थी. शनिदेव की नई मूर्ति की स्थापना भी कुछ साल पहले मंदिर परिसर में की गई थी.

उपासना स्थल और श्रद्धालुओं की आस्था

कालीस्थान मंदिर नाहन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि इसकी ऐतिहासिकता भी इसे विशेष बनाती है. नवरात्रि और अन्य धार्मिक अवसरों पर यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं. यह मंदिर शक्ति साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्वितीय संगम है, जहां भक्तगण मां काली की कृपा प्राप्त करने के लिए आराधना करते हैं.

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