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देवघर के अट्ठे मटन और सरायकेला की हल्दी को मिलेगी इंटरनेशनल पहचान, नौ प्रोडक्ट्स को GI टैग दिलाने की तैयारी

देवघर के अट्ठे मटन और सरायकेला की हल्दी के साथ नौ प्रोडक्ट्स को GI टैग मिलने की तैयारी है.

GI tag for Jharkhand products
जीआई टैग (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : November 21, 2025 at 5:16 PM IST

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रांची: झारखंड बनने के बाद से सिर्फ सोहराई पेंटिंग को ही GI टैगिंग मिल पाई है. अब, राज्य में कृषि और ग्रामीण इलाकों के विकास के विकास के लिए समर्पित संस्था NABARD ने झारखंड के नौ अद्भुत और सर्वोत्तम प्रोडक्ट्स के लिए GI टैगिंग हासिल करने की अपनी योजना के तहत सभी प्रोसेस पूरे कर लिए हैं. जरूरी डॉक्यूमेंट्स भी सेंट्रल एजेंसी को जमा कर दिए गए हैं.

NABARD झारखंड ने GI टैगिंग के लिए जो नौ प्रोडक्ट्स जमा किए हैं, उनमें देवघर का मशहूर अट्ठे मटन और सरायकेला खरसावां के आदिवासी किसानों द्वारा उगाई जाने वाली अधिक करक्यूमिन रसायन वाली हल्दी शामिल है.

अट्ठे मटन और हल्दी को मिलेगी इंटरनेशनल पहचान (Etv Bharat)

NABARD झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीपमाला घोष ने बताया कि अब तक सिर्फ एक प्रोडक्ट, सोहराई पेंटिंग को ही GI टैग मिला है. उन्होंने आगे कहा कि इस साल, NABARD की पूरी कोशिश है कि झारखंड के कम से कम आठ से नौ बेहतरीन और अनोखे प्रोडक्ट्स को GI टैग मिलें.

मूल रूप से देवघर के रहने वाले और रांची में मां अंबे अट्ठे रेस्टोरेंट के मालिक राहुल रॉय का कहना है कि अट्ठे को GI टैग मिलने का फायदा यह होगा कि इसे इंटरनेशनल पहचान मिलेगी और इससे झारखंड और देवघर के लोगों के साथ-साथ दूसरों को भी फायदा होगा.

अट्ठे मटन (देवघर) - अट्ठे मटन बाबा नगरी देवघर की एक खास डिश है. यह मटन पूरी तरह से शुद्ध घी में पकाया जाता है, इसमें पानी नहीं डाला जाता है, और इसे खास तौर पर लोहे की कड़ाही में पकाया जाता है. लहसुन या प्याज न होने के बावजूद, यह मटन जब बनता है, तो अपने तेज स्वाद और रसीले टेक्सचर से सभी मटन पसंद करने वालों का दिल जीत लेता है.

रांची में अट्ठे मटन की दुकान चलाने वाले राहुल राय कहते हैं कि उनके मटन का स्वाद अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी समेत कई देशों तक पहुंच चुका है.

कुचाई हल्दी – झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले की लाल लैटेराइट मिट्टी में उगने वाली एक खास तरह की देसी हल्दी के लिए GI टैग पाने की कोशिशें चल रही हैं. अपने ज्यादा करक्यूमिन कंटेंट, चमकीले रंग और खुशबूदार गुणों के लिए जानी जाने वाली यह हल्दी अपनी क्वालिटी में अनोखी है और इसे आदिवासी किसान ऑर्गेनिक तरीके से उगाते हैं.

बीरू गमछा - सिमडेगा जिले में हाथ से बुना हुआ यह सूती कपड़ा, जिसमें एक खास लाल और सफेद चेकर पैटर्न होता है, सिमडेगा में रोजाना इस्तेमाल और खास मौकों, दोनों के काम आता है. यह स्थानीय आदिवासी बुनकरों की कारीगरी को दिखाता है और सिमडेगा जिले की पहचान बनता जा रहा है.

कुचाई सिल्क साड़ी - ये साड़ियां सरायकेला-खरसावां के कुचाई ब्लॉक में पाले और बुने गए टसर सिल्क से बनती हैं. अपने नेचुरल सुनहरे रंग और इको-फ्रेंडली प्रोसेस के लिए जाना जाने वाला यह सिल्क आदिवासी परंपरा की पहचान है.

टसर सिल्क साड़ियां - गोड्डा जिले के भगैया में बुनी गई प्रीमियम टसर सिल्क साड़ियां अपने फाइन टेक्सचर और नेचुरल चमक के लिए जानी जाती हैं. ये बुनकर समुदायों की पीढ़ियों को सहारा देती आ रही हैं.

मीठी इमली - NABARD ने सिमडेगा की मीठी इमली के लिए GI टैग हासिल करने के लिए भी पहल शुरू की है. सिमडेगा जिले के जंगल के किनारे से काटी गई, यह नेचुरली मीठी, कम एसिड वाली इमली की किस्म बस कमाल की है! इसका इस्तेमाल खाना बनाने और दवा बनाने, दोनों में होता है और यह आदिवासी महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में भी अहम भूमिका निभाता है.

आदिवासी ज्वेलरी - NABARD ने झारखंड की राजधानी रांची में बनी आदिवासी ज्वेलरी के लिए GI टैग पाने का शुरुआती प्रोसेस भी पूरा कर लिया है. पीतल, बेल मेटल और चांदी से हाथ से बनी, झुमके और झुमके से लेकर हार तक, ये झारखंड के आदिवासी समुदायों की पहचान और कला की पहचान बन गए हैं.

बांस का काम - NABARD रांची और देवघर में कुशल बांस कारीगरों द्वारा बुने गए इको-फ्रेंडली घरेलू और सजावटी सामान के लिए GI टैग पाने के लिए भी काम कर रहा है. ये क्राफ्ट न केवल रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करते हैं बल्कि टिकाऊ, पारंपरिक तकनीकों को भी बनाए रखते हैं.

करणी शॉल - खूंटी जिले में बनी करणी शॉल को भी GI टैग के लिए माना जा रहा है. यह मिट्टी के रंगों में सिंपल आदिवासी ज्योमेट्रिक पैटर्न वाला हाथ से बुना हुआ कॉटन शॉल है. पारंपरिक रूप से खूंटी के कर्रा ब्लॉक में बुना जाने वाला यह शॉल सांस्कृतिक समारोहों और रोजमर्रा की जिदगी में पहना जाता है.

NABARD की CGM दीपमाला घोष ने कहा कि सभी प्रोसेस पूरे हो चुके हैं. अब पेटेंट देने वाली एजेंसी सारे प्रोसेस पूरे करने के बाद GI टैगिंग सर्टिफिकेशन जारी करेगी. उन्होंने कहा कि अभी तक मेघालय की हल्दी को पहचान मिली हुई थी, लेकिन जब हमारी सरायकेला खरसावां की हल्दी को GI टैग मिल जाएगा, तो इसे इंटरनेशनल और नेशनल लेवल पर भी पहचान मिलेगी. इसकी डिमांड बढ़ेगी, जिससे आखिर में हमारे किसानों और गांव की इकॉनमी को फायदा होगा.

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