कोरबा में जली कंडों की होलिका, दशकों पुरानी परंपरा का विधि विधान से हुआ पालन
होलिका दहन से पहले लोगों ने होलिका की परिक्रमा की. भक्तों ने अपने दुख और दरिद्रता को खत्म करने की मंगल कामना की.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : March 3, 2026 at 2:21 PM IST
कोरबा: ऊर्जाधानी के नाम से मशहूर कोरबा में ईको फ्रेंडली होलिका दहन किया गया. शुभ मुहूर्त में आधी रात रात के 1:30 बजे शहर के पुराना बस स्टैंड में कंडे की होलिका दहन कर लोगों ने खुशियां मनाई. इस साल चंद्रग्रहण के कारण होलिका दहन और रंगोत्सव के दिन होली खेलने को लेकर काफी भ्रम है. अलग-अलग तिथियां में लोग पर्व को मना रहे हैं.
2 मार्च को ही होलिका दहन का मुहूर्त था. कुछ स्थानों पर रात के 8 से 9 के बीच होलिका दहन किया गया. ज्यादातर लोगों ने आधी रात को लगभग 1:30 बजे होलिका दहन किया. पुराना बस स्टैंड में भी रात के ठीक 1:30 बजे होलिका दहन किया गया. इस दौरान पुराने शहर के लोग बड़ी तादाद में पुराना बस स्टैंड में जमा हुए.
हर साल ईको फ्रेंडली होलिका दहन का होता आयोजन
पुराना बस स्टैंड में हर साल कंडों की होलिका बनाई जाती है. होलिका दहन के लिए लकड़ी का उपयोग नहीं किया जाता. इसमें औषधिय गुण वाले कपूर, लौंग इत्यादि सामग्रियों को भी होलिका के साथ जलाया जाता है, जो की काफी ईको फ्रेंडली है. वातावरण को भी स्वच्छ बनाने में मदद करता है. कोरबा में यह परंपरा दशकों पुरानी है. बड़ी तादाद में यहां लोग होलिका दहन के लिए जमा होते हैं, जिसमें सामान्य लोगों से लेकर वीआईपी लोग भी शामिल हैं.
होलिका दहन और होली के प्रति लोगों की गहरी आस्था
पुराना बस स्टैंड के होलिका दहन कार्यक्रम में पहुंचे शहरवासी जगविंदर सिंह ने बताया कि वो यहां कई वर्षों से आ रहे हैं. यहां त्योहार को लेकर काफी भव्यता से होलिका दहन किया जाता है. लोग पहले विधिवत होलिका की परिक्रमा करते हैं. अपनी आस्था अनुसार पूजा पाठ करते हैं फिर मनोकमाना भी मांगते हैं. दुख और दरिद्रता के नाम की कामना करते हैं.
क्या है मान्यता
होलिका दहन में शामिल होने पहुंचे राधेश्याम अग्रवाल ने बताया कि होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है. हिरण्यकश्यप जो की एक क्रूर शासक था. उसका पुत्र प्रहलाद भगवान विष्णु का परम भक्त था. उसे मारने के लिए कई प्रपंच किए गए. अंत में राक्षस ने अपनी बहन होलिका को बुलाया, लेकिन जब होलिका स्वयं भस्म हो गई और प्रहलाद का बाल भी बांका का नहीं, हुआ तब लोग काफी खुश हुए और उस रात होलिका के राख से से पहली बार होली मनाई गई. तब से यह परंपरा चली आ रही है. होलिका पर्व में हमारी गहरी आस्था है.
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