15 हजार बच्चों ने एक साथ किया हनुमान चालीसा का पाठ, रामभद्राचार्य महाराज ने बताई महिमा
कथा स्थल राम नाम और हनुमान चालीसा के सामूहिक पाठ से गूंज उठा.

Published : January 10, 2026 at 11:07 PM IST
जयपुरः सीकर रोड स्थित नींदड़ में चल रही 10 दिवसीय श्रीराम कथा का तीसरा दिन भक्ति, अनुशासन और राम नाम के अनूठे संदेश से सराबोर रहा. तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी, रामभद्राचार्य महाराज ने 'हनुमान जी' को राम नाम का सर्वोत्तम विद्यार्थी बताते हुए श्रद्धालुओं को भक्ति का सरल और प्रभावी मार्ग दिखाया. इससे पहले कथा स्थल राम नाम और हनुमान चालीसा के सामूहिक पाठ से गूंज उठा.
नींदड़ में हो रही राम कथा में शनिवार को दो लाख हनुमान चालीसा का सामूहिक पाठ किया गया. इस दौरान 15 हजार बच्चे भी शामिल हुए. उन्होंने एक साथ हनुमान चालीसा का पाठ कर श्रद्धा और संस्कार का अनुपम उदाहरण पेश किया. बच्चों की सामूहिक सहभागिता ने कथा को एक जीवंत राम नाम की पाठशाला में बदल दिया. इस दौरान रामकथा कहते हुए स्वामी रामभद्राचार्य महाराज ने कहा कि जब पाठ के लिए छात्रों को बुलाने की बात आती है, तो वे स्वयं को पहला छात्र मानते हैं. उन्होंने कहा कि हनुमान चालीसा केवल स्तुति नहीं, बल्कि संकटों से मुक्ति का सशक्त साधन है. कोई व्यक्ति 49 दिनों तक प्रतिदिन 108 बार हनुमान चालीसा का पाठ करता है, तो जीवन की कठिनाइयां स्वतः दूर होने लगती हैं.

पढ़ेंः जब रामलला को ला सकते हैं तो मथुरा और काशी का ज्ञानवापी भी लाकर दिखाएंगे : रामभद्राचार्य महाराज
हनुमान चालिसा के बारे में बतायाः उन्होंने ये भी कहा कि हनुमान चालीसा गोस्वामी तुलसीदास की प्रथम रचना है. इसमें अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति निहित है. कथा के दौरान रामभद्राचार्य ने नए दृष्टिकोण से समझाया कि हनुमान चालीसा का प्रथम दोहा रामचरित मानस के अयोध्या कांड के पहले दोहे से जुड़ा है. 'रघुबर' शब्द केवल भगवान राम के लिए ही नहीं, बल्कि 'हनुमान जी' के लिए भी प्रयुक्त हुआ है. एक चौपाई का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि भगवान राम 'हनुमान जी' को अपने भाई भरत के समान प्रिय मानते हैं.
हनुमान का जन्म प्रसंग बतायाः हनुमान के जन्म प्रसंग को रामभद्राचार्य ने भक्ति के चमत्कार के रूप में प्रस्तुत किया. उन्होंने बताया कि 'हनुमान जी' का प्राकट्य सांसारिक कारणों से नहीं, बल्कि श्रीराम भक्ति की शक्ति से हुआ. पुत्रेष्टि यज्ञ की खीर का अंश पवन देव के माध्यम से माता अंजना तक पहुंचा और उसी से 'हनुमान जी' का जन्म हुआ. इसी कारण वे पवनसुत कहलाए. प्रवचन के अंत में स्वामी रामभद्राचार्य ने कहा कि जो व्यक्ति 'हनुमान जी' की तरह राम नाम को जीवन का आधार बना लेता है, वह प्रभु राम को अपने हृदय में बसा लेता है. 'हनुमान जी' ने सूर्य को मुख में धारण किया, लेकिन सीता-राम को हृदय में स्थान दिया, यही सच्ची भक्ति का संदेश है.

