रंगभरियों की गली : राजशाही जमाने में यहां बनते थे गुलाल गोटे, अब व्यवसाय बदला, लाख की चुड़ियों से है पहचान
गुलाल गोटे बनाने का कार्य 1975 से 1980 तक चला, बाद में यहां गुलाल गोटे की मांग नहीं रहने से यह कार्य बंद हो गया.

Published : February 28, 2026 at 4:18 PM IST
अलवर : होली त्योहार नजदीक आने के साथ ही जिलेभर में रंग गुलाल दिखाई पड़ने लगे हैं. ब्रज से नजदीकी के चलते अलवर जिले में सदियों से होली पर रंग गुलाल की धूम रही है. राजशाही दौर में भी होली की उमंग अलग ही दिखाई पड़ती थी, तब पूर्व राजा-महाराजा गुलाल गोटे मारकर होली का आनंद लेते थे. रियासतकाल में होली त्योहार पास आते ही अलवर में गुलाल गोटे बनाने का जोर शोर से काम शुरू हो जाता था. इसी कारण जिस जगह गुलाल गोटे बनाने का कार्य होता था, उसका नाम ही रंगभरियों की गली पड़ा.
बदलते दौर में गुलाल गोटे बनाने का कार्य तो खत्म हो गया, लेकिन मोहल्ले की पहचान आज भी रंगभरियों की गली के नाम से कायम है. करीब 250 साल पहले इस मोहल्ले के कई परिवार होली त्योहार पर गुलाल गोटे बनाने का कार्य करते थे, लेकिन धीरे-धीरे होली पर रंग, गुलाल का प्रचलन बढ़ता गया और गुलाल गोटे का काम खत्म हो गया. इस कारण उन परिवारों ने भी अपना व्यवसाय बदल लाख की चूड़िया आदि बनाना शुरू कर दिया. रंगभरियों की गली में करीब 1980 तक गुलाल गोटे बनाने का काम बंद हो गया.
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अलवर शहर की रंगभरियों की गली में करीब 250 साल पहले गुलाल गोटे बनाने के कार्य से जुड़े परिवार के सदस्य निशा खान ने बताया कि उनकी पांचवीं पीढ़ी इस दुकान को संचालित कर रही है. उनके पूर्वज राजशाही दौर में अलवर के पूर्व राजा-महाराजाओं से जुड़े रहे और उस समय पूर्व राजपरिवार के लिए गुलाल गोटे बनाने का कार्य करते थे. गुलाल गोटे बनाने का कार्य 1975 से 1980 तक चला, बाद में यहां गुलाल गोटे की मांग नहीं रहने से यह कार्य बंद हो गया. निशा खान ने बताया कि पूर्व में यहां गुलाल गोटे का कार्य होने से इस गली का नाम रंगभरियों की गली पड़ गया. यहां अब गुलाल गोटे बनाने का कार्य बंद हो गया और उसकी जगह अब लाख की चूड़ियां बनाने का काम होने लगा, लेकिन इस गली की पहचान अब भी रंगभरियों की गली के रूप में कायम है.

ऐसे तैयार होते थे गुलाल गोटे : निशा खान ने बताया कि पूर्व राजशाही दौर में उनकी इस दुकान पर गुलाल गोटे बनाने का कार्य किया जाता था. होली त्योहार से कुछ दिन पूर्व यहां गुलाल गोटे बनाने का कार्य शुरू हो जाता था. पूर्व राजपरिवार से भी उन्हें गुलाल गोटे बनाने का ऑर्डर मिलता था. गुलाल गोटे के लिए पहले लाख की चपड़ी को कूटकर उसे नरम बनाया जाता था और उसे फूंकनी के जरिए गोल बनाया जाता था. यह अंदर से पोली होती थी, जिसके अंदर रंग भरे जाते थे. बाद में उसे फूंक मारकर फुलाया जाता था और गुलाल गोटे के बाहर आटे की लोई बनाकर उसकी लेप लगाई जाती थी. इस तरह गुलाल गोटे तैयार होते थे.
गुलाल गोटे फेंककर पूर्व राजा खेलते थे होली : अलवर के इतिहास के जानकार एडवोकेट हरिशंकर गोयल ने बताया कि राजशाही दौर में अलवर के पूर्व राजा- महाराजा को होली खेलने का शौक था. अलवर के पूर्व शासक जयसिंह होली त्योहार पर हाथी पर बैठकर राजशाही तरीके से महल चौक स्थित महलों से निकलते थे और सर्राफा बाजार होकर शहर के लालगेट तक निकलते थे. इस दौरान रास्ते में दोनों ओर अलवर के लोग पूर्व शासक का अभिनंदन करने के लिए कतार में खड़े रहते थे. पूर्व महाराजा हाथी पर बैठे-बैठे ही वहां खड़े लोगों पर गुलाल गोटे फेंककर होली खेलते थे. लोगों से होली खेलते हुए पूर्व महाराज की सवारी वापस महलों को लौट जाती थी.
शरीर से टकराते ही रंग बिखेरते थे गुलाल गोटे : गुलाल गोटे पतली परत वाले छोटे गोल खोल के रूप में बनाए जाते थे, जिनके अंदर सूखा गुलाल भरा जाता था. होली के अवसर पर इन्हें एक-दूसरे पर फेंका जाता था. जमीन या शरीर से टकराते ही गुलाल गोटे फूट जाते और रंग बिखेर देते थे. राजशाही दौर में होली खेलने के लिए गुलाल गोटे का ही मुख्य रूप से उपयोग किया जाता था. उस दौर में गुलाल व रंग आदि का प्रचलन बहुत कम होता था.

