चंडीगढ़ दिव्या कला मेला में चमका हुनर...डाउन सिंड्रोम से जूझ रहे आरव ने "फीट मी अप" से गढ़ी अपनी पहचान
चंडीगढ़ दिव्या कला मेला में दिल्ली से आए डाउन सिंड्रोम से जूझ रहे आरव ने "फीट मी अप" के जरिए जूतों पर कला उकेरी.

Published : February 17, 2026 at 3:13 PM IST
चंडीगढ़: चंडीगढ़ सेक्टर-34 में आयोजित दिव्या कला मेला में इस बार हुनरबाजों का जमावड़ा देखने को मिला. हालांकि दिल्ली से आए 17 साल के आरव की कला के कई लोग मुरीद बन गए. दरअसल, आरव डाउन सिंड्रोम से जूझ रहे हैं, लेकिन उनके आत्मविश्वास और रचनात्मकता कला ने हर किसी को प्रभावित किया. मेले में लगी उनकी स्टॉल पर लोगों की भीड़ उमड़ी और सभी ने उनके काम की जमकर सराहना की. आरव ने साबित कर दिया कि यदि हौसला बुलंद हो तो कोई भी चुनौती राह की रुकावट नहीं बन सकती.
"फीट मी अप" से बनाई अलग पहचान: आरव “फीट मी अप” नाम की अपनी रचनात्मक पहल के जरिए साधारण जूतों को आकर्षक कलाकृतियों में बदल देते हैं. वे जूतों पर रंग-बिरंगे पैटर्न, आकृतियां और अनोखे डिजाइन बनाते हैं. इसके साथ ही वे कस्टमाइज्ड कैप भी तैयार करते हैं, जिन पर ग्राहकों की पसंद के अनुसार डिजाइन उकेरे जाते हैं. आरव कहते हैं, “मुझे पेंटिंग करना बहुत पसंद है. जब मैं जूतों पर रंग भरता हूं तो मुझे बहुत खुशी मिलती है. मैं चाहता हूं कि लोग मेरे बनाए डिज़ाइन पहनें और मुस्कुराएं.”
टीमवर्क से आत्मनिर्भरता की ओर कदम: आरव बताते हैं कि वो अकेले नहीं, बल्कि छह अन्य विशेष जरूरतों वाले बच्चों के साथ मिलकर काम करते हैं. कोई रंग भरता है, कोई डिजाइन तैयार करता है और कोई फिनिशिंग का जिम्मा संभालता है. यह पहल इन बच्चों के लिए रोजगार के साथ-साथ आत्मनिर्भर बनने की दिशा में मजबूत कदम है. मेले में लोगों ने न सिर्फ उनके उत्पाद खरीदे, बल्कि उनका हौसला भी बढ़ाया. इस सामूहिक प्रयास ने यह संदेश दिया कि सही अवसर मिलने पर हर बच्चा अपनी प्रतिभा दिखा सकता है.

मां का विश्वास बना सबसे बड़ी ताकत: आरव की मां सुचिता महाजन अपने बेटे की उपलब्धियों पर गर्व महसूस करती हैं. वे कहती हैं, “आरव बचपन से ही पेंटिंग में रुचि रखता है. मुझे खुशी होती है कि वह अपने काम को बहुत पसंद करता है और उसे करने में मजा आता है. मैं अन्य माता-पिता से कहना चाहूंगी कि ये बच्चे भी आम बच्चों की तरह ही होते हैं. जहां एक बच्चा कुछ समझने में एक घंटा लेता है. वहीं, आरव जैसे खास बच्चे थोड़ा ज्यादा समय लेते हैं, लेकिन उनकी क्षमताएं किसी से कम नहीं होतीं.”

आरव की ये कहानी साफ बयां करती है कि अगर परिवार साथ हो तो, हालात जैसे भी हो, हर बच्चा सही मार्गदर्शन से आगे बढ़ सकता है. अपनी अलग पहचान बना सकता है. भले परिस्थितियां जैसी भी हो.

