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गोरखपुर में उद्योगों की बाढ़, लेकिन नदियों पर प्रदूषण की मार: आमी नदी के लिए 'काल' बना गीडा का औद्योगिक विकास !

सामाजिक संगठन लगातार क्या मांग कर रहे, क्या दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा, जानिए.

नदियों की बचाने की अपील लगातार की जा रही.
पूर्व राज्यपाल राम नाईक व राहुल गांधी से नदियों को बचाने की अपील की गई थी. (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 27, 2026 at 2:32 PM IST

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Updated : February 27, 2026 at 4:12 PM IST

7 Min Read
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गोरखपुर: 30 नवम्बर 1989 में गोरखपुर के सहजनवा में गीडा औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना हुई थी. वर्ष 2017 तक यहां जितने उद्योग लगे उससे ज्यादा 9 साल की योगी सरकार में लगे. करीब 400 से ज्यादा उद्योग यहां संचालित हो रहे हैं. यह तय है कि उद्योग लगेगा तो वायु और जल का प्रदूषण भी होगा, जिसमें जल प्रदूषण के निस्तारण के लिए इस औद्योगिक क्षेत्र में सीईटीपी (common afluent treatment plant) की स्थापना जरूरी है, जो कि आज तक स्थापित नहीं किया जा सका है, जिससे उद्योगों से निकलने वाला गंदा पानी आमी नदी, सरिया नाला में गिरकर न सिर्फ जल को प्रदूषित कर रहा, बल्कि यहां का जल स्रोत भी प्रभावित हुआ है. इसको लेकर जो भी आंदोलन की आवाज उठी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही.

नौ वर्षों से नहीं हो सकी स्थापना: CETP लगाने के जो प्रस्ताव बनते हैं वह शासन स्तर से बार- बार रिवाइज हो जाते हैं. जबकि यह आज की और पहले की भी बहुत बड़ी जरूरत है. करीब 9 साल समाजवादी पार्टी की सरकार में सीईटीपी की स्थापना के लिए जमीन भी चिन्हित हो गई, लेकिन मौजूदा सरकार के 9 वर्षों में वहां इसकी स्थापना नहीं हो सकी. यही वजह है कि लोगों की समस्या के साथ जो लोग इस आंदोलन को आगे बढ़ा रहे हैं. वह आज भी आवाज उठा रहे हैं और योगी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं.

विश्व विजय सिंह, संयोजक, आमी बचाओ मंच (Etv Bharat)


संगठन का क्या कहना है: आमी बचाओ मंच के संयोजक विश्व विजय सिंह कहते हैं कि इस नदी का बहुत ही पौराणिक इतिहास है. यह बुद्ध और कबीर के काल की नदी है, जो इसके आस-पास बसे गांव के लोगों के लिए एक विशेष प्रकार की जीवनदायनी रही है. पिछले डेढ़-दो दशक में यह लगातार प्रदूषण की इस कदर शिकार हुई है कि, अब इसमें लोगों को मछलियां भी नहीं उपलब्ध हो पाती.

न पशु पानी पीते, न सिंचाई करते किसान: पशुओं को लोग इसमें पानी नहीं पीने देते. आसपास के खेतों में इससे सिंचाई लोग नहीं करते क्योंकि इसका प्रदूषण स्तर काफी बढ़ चुका है. उन्होंने कहा कि हैरानी होती है 9 साल पहले जब कॉमन 'इन्फ्लुएंस ट्रीटमेंट प्लांट' के लिए पिछली सरकार ने जमीन अलाट कर दिया था तो इस सरकार को इस पर काम कर देना चाहिए था.

उन्होंने बताया कि वह इस मामले में लेकर एनजीटी में भी गए. एनजीटी के भी कई बार डायरेक्शन मिले लेकिन कोई काम नहीं हो रहा. पूर्व राज्यपाल राम नाईक से भी इस बात को भी वह उठा चुके हैं. कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी भी आमी नदी का मौके से निरीक्षण कर चुके हैं. विश्व विजय सिंह ने कहा कि प्रदूषण खासकर जल का और वायु का दोनों औद्योगिक क्षेत्र गीड़ा में बेहद खराब स्थिति में है.

योगी आदित्यनाथ भी उठा चुके आवाज: मौजूदा मुख्यमंत्री और पूर्व सांसद के रूप में योगी आदित्यनाथ ऐसे प्रदूषण को लेकर खूब आवाज उठाते रहे हैं. लेकिन अब अपनी ही सरकार में वह इसे दूर नहीं कर पा रहे. इससे यह लगता है कि सरकार उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को लाभ पहुंचाने के लिए तो पूरा काम कर रही है लेकिन, आम जनता को समस्या से उबारने पर उसका कोई ध्यान नहीं है. उन्होंने कहा कि उद्योगों की स्थापना बहुत अच्छी बात है लेकिन इससे निकलने वाले कचरे और गंदे पानी का निस्तारण भी हो यह सरकार को तय करना होगा जो फिलहाल होता दिखाई नहीं दे रहा.

अफसर क्या बोले: इस संबंध में अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी गीडा राम प्रकाश कहते हैं कि जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जल्द ही उद्यमियों के साथ बैठक होगी बैठक में प्लांट के निर्माण संचालन की रूपरेखा, संभावित लागत और उद्योगों की भागीदारी पर चर्चा होगी. इसके बाद एक ठोस कार्य योजना बनाकर शासन को भेजा जाएगा. वही जो पूर्व में कार्य योजना शासन को भेजी गई थी उसको शासन ने वापस भेज दिया है. जिसमें इसके संचालन और निर्माण को लेकर नए सिरे से विचार करने को कहा गया है. जिसके क्रम में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जल्द मीटिंग होगी.

उन्होंने कहा कि औद्योगिक विकास प्राधिकरण ने इसके लिए करीब 94 करोड़ रुपए के लागत से सीईटीपी के निर्माण की मंजूरी दी थी. जिसमें अगले 15 साल तक इसके मेंटेनेंस और संचालन खर्च को मिलाकर कुल 198 करोड़ की परियोजना लागत पहुंच गई. जो शासन को प्रेषित हुई तो उसमें फिर नए निर्देश जारी हो गया.

उन्होंने कहा कि जो प्लांट बनाया जाना है उसके माध्यम से सभी औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट जल का सामूहिक रूप से पर्यावरण के मानकों के अनुरूप निस्तारण किया जाना प्रस्तावित है. लेकिन शासन के निर्देश के बाद फिर से संशय पैदा हो गया है. इसके संचालन पर होने वाले खर्च को लेकर शासन की ओर से आपत्ति जताई गई है.

उन्होंने कहा कि इस बार भी यह प्रोजेक्ट होगा तो गिरा क्षेत्र में प्रदूषण की समस्या और बढ़ती जाएगी, जिससे भविष्य में नए निवेश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है. चेंबर का इंडस्ट्रीज के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि कॉमन इन्फ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण यहां स्थापित उद्योगों के लिए जीवनदान जैसा है, क्योंकि एकल ट्रीटमेंट प्लांट लगाना छोटी इकाइयों के लिए आर्थिक रूप से संभव नहीं है.

गीडा की स्थापना के 37 साल बाद भी इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को लेकर असमंजस की स्थिति का बना होना जन स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है. इस प्लांट की क्षमता को लेकर भी कई बार बदला हुआ पहले या 10 एमएलडी की क्षमता का लगाने का निर्णय लिया गया, फिर इसकी क्षमता घटाकर 4 एमएलडी कर दी गई, जिसकी स्थापना के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सितंबर 2025 में करीब 12 एकड़ क्षेत्रफल में इस प्लांट का शिलान्यास भी किया गया था, जिसमें हाल में लिए का निर्णय के अनुसार आधुनिक प्लांट के निर्माण पर करीब 98 करोड़ रुपए खर्च होना था.

करीब 15 वर्षों के संचालन और रख-रखाव को मिलाकर कुल 198 करोड़ का खर्च रखा गया था. लेकिन शासन स्तर से फिर से कार्य योजना बनाने के निर्देश के बाद संकट गहरा गया है. कोई दूसरी तरफ बढ़ते प्रदूषण को लेकर के आम नागरिकों का आंदोलन गांव से लेकर प्रदूषण कार्यालय तक हो रहा है लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही. सत्ता पक्ष के जन्म प्रतिनिधि कुछ बोलने की स्थिति में नहीं हैं. विरोधी दल में भी न जाने क्यों चुप्पी है. जनता मुखर है और आमी बचाओ मंच के विश्व विजय सिंह का संघर्ष जारी है.

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Last Updated : February 27, 2026 at 4:12 PM IST