उज्जैन टू अयोध्या, दिग्विजय सिंह की पदयात्रा पॉलिटिक्स के पीछे आखिर क्या है?
दिग्गज कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की उज्जैन टू अयोध्या तक 904 किलोमीटर की यात्रा के पीछे असली मकसद क्या है. समझने की कोशिश करती शिफाली पांडेय की रिपोर्ट.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : July 4, 2026 at 8:20 PM IST
|Updated : July 4, 2026 at 8:51 PM IST
भोपाल: दिग्विजय सिंह के बीते पांच दिन के बयानों पर गौर कीजिए तो समझना मुश्किल होगा कि वह अचानक फिर एक पदयात्रा की तैयारी में क्यों जुट गए हैं. 79 वर्ष की उम्र में उज्जैन से अयोध्या तक की 904 किलोमीटर की यात्रा को बेशक दिग्विजय सिंह गैर राजनीतिक बता रहे हों, लेकिन लेकिन उनकी यात्रा की शुरुआत और अंत, दोनों पॉइंट वो जगह हैं जो एक मध्य प्रदेश और दूसरी इस समय पूरे देश की राजनीति का केन्द्र बनी हुई है.
ये अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का निर्णय नहीं है. ये शुद्ध रूप से दिग्विजय का प्लान है. तो सवाल कि ये अयोध्या के गंतव्य और चंदा चोरी को लक्ष्य करके शुरू की जा रही इस यात्रा का मंतव्य क्या है? बीते 72 घंटों में बुरी तरह से अपनों के निशाने पर आए दिग्विजय का ये दांव क्या सेल्फ डिफेंस के दायरे में कहा जाएगा? गैर राजनीतिक होते हुए भी दिग्विजय की इस यात्रा के पीछे असल राजनीति क्या है?
चंद घंटों में दिग्विजय की यात्रा का ऐलान.., राजनीति क्या है
भोपाल में महिला कांग्रेस के धरने में शामिल हुए दिग्विजय सिंह अयोध्या के राम मंदिर में हुई चंदा चोरी पर जब बोल रहे थे, तब तक उनका बयान यहीं तक सीमित था कि उन्होने भी चंदा दिया है. और वे जल्द ही अपने वकील से बात करके इस मामले अयोध्या जाकर मुकदमा करेंगे.
मीडिया को दिए गए बयान में बोले कि घर पर बैनर लगाएंगे चंदा चोरों से सावधान. यही अपील उन्होंने मठ-मंदिरो के पुजारियों से भी की. लेकिन डेढ़ घंटे के भीतर के घटनाक्रम के बाद दिग्विजय ने अपने सरकारी बंगले पर बैनर तो लगाया लेकिन साथ में ये भी बताया कि वे एक बार फिर यात्रा पर निकलने जा रहे हैं. इस बार यात्रा उज्जैन से अयोध्या तक की होगी... गैर राजनीतिक होगी. हांलाकि अचानक से इस यात्रा का ऐलान कई सवाल खड़े कर रहा है.

दिग्विजय सिंह का देख-भाल कर सोच-समझकर खेला है डैमेज कंट्रोल का दांव
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रकाश भटनागर कहते हैं, दिग्विजय सिंह की सियासत की खासियत यही है कि वे अगर किसी के कंधे पर हाथ रखे हैं तो ये बिल्कुल मत मानिए कि वो हाथ सहारे का है. हो सकता है निशाने पर वही हो. इस नजरिए से देखें तो भले अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी विवाद के समय ये यात्रा का ऐलान सामयिक दिखाई दे, लेकिन इसके पीछे कहानी इतनी भर नहीं है.
पॉलिटिकल टाइमलाइन वो भी देखी जानी चाहिए कि बीते पांच दिनों में मध्य प्रदेश में दिए गए दिग्विजय सिंह के बयानों से कांग्रेस की किस तरह से किरकिरी हुई है. कैसे उनके एक बयान ने सीधे पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष की फजीहत हुई और उसके बाद किस तरह से पार्टी के भीतर से ही उनके खिलाफ आवाज़ें बुलंद होने लगीं. इस नजरिए से देखिए समझिए तो दिग्विजय सिंह ने देख-भाल कर सोच-समझकर डैमेज कंट्रोल का दांव खेला है. ये यात्रा असल में पार्टी के भीतर उनकी वजह से जो मुश्किलें बढ़ी हैं उसकी संभाल की कोशिश दिखाई देती है.

हजार किलोमीटर की यात्रा में आम जन से अपील
दिग्विजय सिंह के डेढ़ घंटे में किए गए इस सियासी मूव के बाद उन्होंने मीडिया को बयान जारी किया और कहा कि मैं ये घोषणा करता हूं कि वीएचपी और आरएसएस के संगठनों ने जिस तरह से चंदा चोरी की है. उसी तरह से महाकाल मंदिर के निकट एक बहुत कीमती भूमि है जिसे सुंदर लाल पटवा ने आरएसएस ट्रस्ट को दे दिया था. उसका पूरा रिकॉर्ड मेरी सरकार में मेरे पास है. उसके बाद वहां रेस्ट रूम बना लिया. वहां अब सौ कमरों का होटल बना रहा है.
वहां जो ठहरता है उसको वीआईपी दर्शन हो जाते हैं. वहां भी चंदा में गड़बड़ी है. मैं दो अक्टूबर से पदयात्रा शुरू करूंगा गांधी जयंती से. ये यात्रा गैर-राजनीतिक होगी. दस से पंद्रह किलोमीटर रोज चलूंगा. उन दिनों में ना मैं व्हाट्सअप इस्तेमाल करूंगा ना फेसबुक. जो भी चंदा चोरी के खिलाफ हैं उनका इस यात्रा में स्वागत है. दिग्विजय सिंह जोर देकर कहते हैं कि इस यात्रा में कांग्रेस का झंडा बैनर नहीं होगा.
क्या राजनीतिक उद्देश्य के लिए है ये पदयात्रा
लेकिन घोषित रूप से भले ना कहा जाए ये यात्रा राजनीतिक उद्देश्य के लिए ही है. दिग्विजय सिंह के सियासी कार्यकाल को बेहद करीब से देखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित लिखते हैं, कई साल पहले की बात है. माधवराव सप्रे संग्रहालय के एक आयोजन में दिग्विजय सिंह और रामेश्वर नीखरा भी आए थे. इसी कार्यक्रम में गपशप करते हुए मैंने दिग्विजय सिंह जी से पूछा कि उनका रिटायरमेंट प्लान क्या है?
गंभीरता से उन्होंने बताया कि नरसिंहपुर जिले में नर्मदा तट पर उन्होंने एक जमीन देखी है आश्रम के लिए. वहीं जाकर बसेंगे. अब जब वे किसी पद पर नहीं है और राज्यसभा से भी विदा ले चुके हैं, उन्हें अपने उस आश्रम में तुरंत पहुंच जाना चाहिए. उन्होंने राजनीति में पचास साल गुजार लिए. इस दौरान उन्होंने बेहद कठिन चुनौतियों का सामना भी किया और शिखर पर भी रहे.
कभी कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद के संभावित उम्मीदवार थे दिग्गी राजा
एक समय था जब उन्हें कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद का संभावित उम्मीदवार होने तक की अटकलें लगती थीं. उन्हीं दिग्विजय सिंह को कल एक पत्रकार वार्ता में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के बगल में दीन-हीन अवस्था में सफाई देते सुनकर बुरा लगा. क्या से क्या हो गए देखते देखते.. वक़्त और वक़्त के साथ राजनीति बदलने का एहसास दिग्विजय सिंह जी को भी होगा. वे इसके चतुर खिलाड़ी रहे हैं.
" पुत्रवत " जीतू की एक समय दिग्विजय सिंह के सामने एक मामूली नौजवान कार्यकर्ता की हैसियत थी. ठीक वैसे ही जैसे एक समय दिग्विजय सिंह की स्वर्गीय अर्जुन सिंह और स्वर्गीय श्यामाचरण शुक्ल के मुकाबले थी. हमने दिग्विजय सिंह को ठाठ से राजनीति की ऊंचाइयों पर चढ़ते देखा है. एक समय वे कांग्रेस आलाकमान के सबसे विश्वस्त थे. बेशक 79 की उम्र में भी अपनी चुस्ती -फुर्ती में दिग्विजय सिंह अपने से तीस साल छोटों को भी मात दे सकते हैं लेकिन राजनीति "शरीर सौष्ठव प्रतियोगिता" नहीं है. मुझे दिग्विजय सिंह के आश्रम पहुँचने का इंतज़ार रहेगा.
परिक्रमा के साथ 110 सीटों का सीन बदला दिग्विजय ने
ये पहला मौका नहीं है. इसके पहले 2018 के विधानसभा चुनाव के ऐन पहले मध्य प्रदेश में सितंबर 2017 से अप्रैल 2018 के बीच दिग्विजय सिंह नर्मदा परिक्रमा पर निकले थे. 192 दिनों की इस यात्रा में उन्होने 3300 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा की. नरसिंहपुर के बरमान घाट से उन्होने अपनी पत्नी अमृता राय के साथ यात्रा शुरू की थी और भरूच गुजरात में जाकर इस यात्रा का समापन हुआ.
तब भी दिग्विजय सिंह ने कहा था कि ये परिक्रमा है... पूरी तरह से गैर-राजनीतिक. हांलाकि उन्होंने इसका ख्याल भी यात्रा में रखा. लेकिन ये उनकी यात्रा का ही असर था कि मध्य प्रदेश की नर्मदा किनारे की 110 सीटों का सियासी सीन बदला और 2018 में कांग्रेस सत्ता में आ सकी थी.

