नक्सलगढ़ सुकमा में बदलाव की नई इबारत, हथियार छोड़ अब 5जी से जुड़े 101 सरेंडर नक्सली, नई कहानी की शुरुआत
नक्सल प्रभावित सुकमा में बदलाव की नई कहानी दिख रही है. यहां सरेंडर नक्सली आत्मनिर्भरता कायम कर रहे हैं.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : February 25, 2026 at 10:26 PM IST
सुकमा: कभी बम, बारूद से और गोलियों से हिंसा फैलाने वाले हाथ अब समाज में बदलाव की कहानी लिख रहे हैं. यह सब हो रहा है नक्सल प्रभावित सुकमा में हो रहा है. यहां सरेंडर नक्सलियों ने हिंसा का रास्ता छोड़ने के बाद अब समाज में सकारात्मक पहचान बनाने के उद्देश्य से पुनर्वास नीति का फायदा उठाया है. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के स्पष्ट निर्देशन में जिला प्रशासन ने आत्मसमर्पित माओवादियों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में एक और ठोस और प्रभावी पहल की है.
101 नक्सलियों का हुआ सफल पुनर्वास
सुकमा जिला मुख्यालय स्थित नक्सल पुनर्वास केंद्र में 70 आत्मसमर्पित नक्सलियों को अत्याधुनिक 5जी स्मार्टफोन बांटे गए. इसके साथ 31 सरेंडर नक्सलियों को रोजगारोन्मुख मेसन (राजमिस्त्री) किट वितरित की गई. यह केवल सामग्री वितरण का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि विश्वास, सम्मान और नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक बन गया.कार्यक्रम में कलेक्टर अमित कुमार, पुलिस अधीक्षक किरण चव्हाण और जिला पंचायत सीईओ मुकुंद ठाकुर मौजूद रहे.
डिजिटल दुनिया से जुड़ेंगे नए सपने
प्रशासन द्वारा 70 पुनर्वासित युवाओं को स्मार्टफोन बांटे गए. आधुनिक सुविधाओं से लैस यह स्मार्टफोन अब इन युवाओं को डिजिटल शिक्षा, ऑनलाइन प्रशिक्षण, कौशल विकास और विभिन्न शासकीय योजनाओं की जानकारी से सीधे जोड़ेगा.जिन हाथों में कभी हथियार थे, वे अब मोबाइल के माध्यम से ऑनलाइन क्लास, ई-लर्निंग और सरकारी पोर्टलों से जुड़ सकेंगे. यह तकनीक केवल एक गैजेट नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और नए अवसरों का माध्यम बनेगी. प्रशासन का मानना है कि डिजिटल कनेक्टिविटी से जुड़ना आज के समय में मुख्यधारा में शामिल होने की सबसे महत्वपूर्ण शर्त है. ऐसे में यह पहल इन युवाओं के लिए नई दिशा और नई दृष्टि लेकर आई है.

मेसन किट से आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव
सिर्फ डिजिटल सशक्तिकरण ही नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता पर भी विशेष ध्यान दिया गया है. 31 सरेंडर नक्सलियों को मेसन किट उपलब्ध कराई गई, जिससे वे निर्माण कार्यों में रोजगार या स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ा सकेंगे. राजमिस्त्री का प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके ये युवा अब गांवों और कस्बों में निर्माण कार्यों से अपनी आय अर्जित कर सकेंगे. इससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि समाज में उनकी सकारात्मक पहचान भी स्थापित होगी.

प्रशासन की सोच स्पष्ट है पुनर्वास का अर्थ केवल जंगल से बाहर आना नहीं, बल्कि स्थायी आजीविका के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जीना है. हमारा उद्देश्य इन युवाओं को समाज की मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन देना है- अमित कुमार, कलेक्टर

सम्मानजनक जीवन हमारी प्राथमिकता – कलेक्टर अमित कुमार
सुकमा कलेक्टर अमित कुमार ने कहा कि पुनर्वास केंद्र के माध्यम से सरेंडर नक्सलियों को कौशल, शिक्षा और रोजगार से जोड़ने का काम किया जा रहा है. जिससे वे मजबूती से आगे बढ़ सके. प्रशासन हर कदम पर उनके साथ है और उन्हें सुरक्षित, स्थायी एवं उज्ज्वल भविष्य देने के लिए प्रतिबद्ध है.
भीमा की कहानी: 15 साल बाद बदला जीवन का रास्ता
प्रतापगिरी, तोंगपाल निवासी भीमा की आंखों में नई उम्मीद साफ दिखाई दे रही थी. लगभग 15 वर्षों तक नक्सल संगठन से जुड़े रहने के बाद उन्होंने पुनर्वास का निर्णय लिया.भीमा बताते हैं कि यह उनके जीवन का सबसे बेहतर फैसला साबित हुआ. पुनर्वास केंद्र में उन्हें बेहतर आवास, भोजन और प्रशिक्षण की सुविधा मिल रही है.

मैंने राजमिस्त्री का प्रशिक्षण भी पूरा कर लिया है और अब मुझे 5जी मोबाइल भी दिया गया है. अब मैं अपने परिवार के साथ सम्मानपूर्वक जीवन जीना चाहता हूं. सरकार की पुनर्वास नीति के लिए मुख्यमंत्री का आभार व्यक्त करता हूं- भीमा, सरेंडर नक्सली
बुधरा की मुस्कान: जंगल से सुरक्षा और सम्मान की ओर
सिंघनपारा, बड़े सेट्टी निवासी बुधरा ने भी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि जंगल के कठिन और असुरक्षित जीवन की तुलना में यह जीवन अच्छा है. पुनर्वास केंद्र का जीवन कहीं अधिक सुरक्षित और सम्मानजनक है. उन्होंने बताया कि प्रशासन द्वारा मोबाइल और मेसन किट के साथ-साथ आधार कार्ड, आयुष्मान कार्ड, राशन कार्ड और जॉब कार्ड भी बनवाए गए हैं. किसी भी समस्या की स्थिति में कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक से तुरंत बात हो जाती है.
विश्वास, विकास और समरसता की मिसाल
सुकमा जैसे अति संवेदनशील जिले में यह पहल केवल प्रशासनिक कार्यक्रम भर नहीं है. यह विश्वास बहाली, सामाजिक समरसता और विकास की एक सशक्त मिसाल बनकर उभर रही है.जहां कभी भय और असुरक्षा का वातावरण था, वहीं अब संवाद, सहयोग और पुनर्निर्माण की भावना दिखाई दे रही है. पुनर्वास नीति ने यह साबित किया है कि यदि संवेदनशीलता और दूरदर्शिता के साथ प्रयास किए जाएं तो सबसे कठिन परिस्थितियों में भी सकारात्मक बदलाव संभव है.
बदलाव की ओर बढ़ता नक्सलगढ़ सुकमा
सुकमा अब केवल संघर्ष की पहचान नहीं, बल्कि परिवर्तन और पुनर्निर्माण की नई मिसाल बनता जा रहा है. शासन की पुनर्वास नीति उन युवाओं के लिए आशा की किरण बनकर सामने आई है, जो भटके रास्तों से लौटकर सम्मानजनक जीवन जीना चाहते हैं. आज सुकमा में जो पहल हुई है, वह आने वाले समय में पूरे बस्तर अंचल के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है. हथियार छोड़कर अब ये हाथ निर्माण की ईंटें जोड़ेंगे, अपने घर-परिवार और समाज का भविष्य संवारेंगे.यह केवल 70 मोबाइल और 31 किट का वितरण नहीं, बल्कि 101 नई कहानियों की शुरुआत है आत्मविश्वास, सम्मान और विकास की कहानी.

