जन्म से मृत्यु तक की जिम्मेदारी निभाने वाली मितानिनों की जनदर्शन में पुकार, कहा-24 घंटे लोगों के लिए खड़े, लेकिन हमारे लिए कोई नहीं
मितानिनों को स्वास्थ्य व्यवस्था में रीढ़ की हड़्डी माना जाता है. बस्तर जैसे इलाकों में इनकी भूमिका बहुत बड़ी है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : January 8, 2026 at 7:28 PM IST
रायपुर: जिन हाथों में ज़िंदगी को सुरक्षित रखने की ताकत है, आज वही हाथ सरकार के सामने मदद के लिए उठे हुए हैं. गांव-गांव जाकर गर्भवती महिलाओं की देखभाल, बच्चों का टीकाकरण, प्रसव से लेकर मौत तक की हर जिम्मेदारी उठाने वाली छत्तीसगढ़ की मितानिनें आज खुद बदहाली की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. पिछले चार-पांच महीनों से बिना एक पैसा पाए ये मितानिनें लगातार काम तो कर रही हैं, लेकिन उनके घरों के चूल्हे ठंडे पड़ने की नौबत आ गई है. इसी दर्द को लेकर छत्तीसगढ़ मितानिन नागरिक जागरूकता संस्था मुख्यमंत्री निवास पहुंची और जनदर्शन में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से मिलकर अपनी पीड़ा सुनाई.
मुख्यमंत्री ने कार्रवाई का आश्वासन तो दिया, लेकिन सवाल वही है कि क्या इस बार मितानिनों की आंखों के आंसू पोंछे जाएंगे, या फिर यह भरोसा भी कागज़ों में ही दम तोड़ देगा?
“हम 24 घंटे लोगों के लिए जीते हैं, लेकिन हमारे लिए कोई नहीं”
मुख्यमंत्री से मिलकर बाहर आई मितानिनों की आंखें भरी हुई थीं. ईटीवी भारत से बातचीत में उन्होंने कहा कि “गर्भवती महिला हो या नवजात बच्चा, रात हो या आधी रात, फोन आते ही हम दौड़ पड़ते हैं. कई बार अपने बीमार बच्चे को छोड़कर दूसरों के बच्चों की जान बचाने जाते हैं. लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है?चार महीने से एक रुपया तक नहीं मिला ऐसे में परिवार चलाना मुश्किल हो रहा है, लोगों के ताने सुनने पड़ रहे हैं.
”घर में बच्चे भूखे, और हम दूसरों के बच्चों की जान बचा रहे”
मितानिनों ने बताया कि जो मानदेय मिलता है, वह वैसे ही बहुत कम है, उसी से घर चलता था. अब वो भी बंद हो गया है. कई मितानिनों के घर में हालात ऐसे हैं कि बच्चों की फीस भरना, राशन लाना, दवा खरीदना, सब मुश्किल हो गया है. एक मितानिन ने भरी हुई आवाज में कहा कि “कई बार लगता है क्या हमारी जिंदगी की कोई कीमत ही नहीं?”
मामूली गलती, और महीनों का मेहनत शून्य
मितानिनों का आरोप है कि कई बार सिर्फ कागज में छोटी-सी गलती होने पर पूरा दावा खारिज कर दिया जाता है।कभी कहा जाता है — केंद्रांश नहीं आया,तो कभी — राज्यांश अटका है।और इसी बहाने महीनों तक उनकी मेहनत की कमाई रोकी जाती है.
”72 हजार मितानिनें, लेकिन सिस्टम के लिए कोई नहीं”
प्रदेश की करीब 72 हजार मितानिनें स्वास्थ्य व्यवस्था की असली रीढ़ हैं. लेकिन सबसे कमजोर कड़ी भी वही बनकर रह गई हैं. 50% मानदेय बढ़ाने का ऐलान हुआ था लेकिन वो भी आज तक सिर्फ फाइलों में फैसला दबा है.
”पहले भी मांगी थी मदद, तब भी नहीं सुनी गई”
मितानिनों ने बताया कि वे पहले भी जनदर्शन में अपनी फरियाद लेकर आ चुकी हैं. तब भी भरोसा मिला था, लेकिन हालात जस के तस हैं, इसीलिए इस बार भी आश्वासन मिलने के बावजूद उनके दिल में डर है, “कहीं ये भरोसा भी पिछली बार की तरह टूट न जाए.”
क्या हैं पांच मांगें
- मानदेय और प्रोत्साहन राशि का नियमित और एकमुश्त भुगतान और 50% बढ़ोतरी तुरंत लागू हो.
- पिछले चार-पांच महीने का बकाया तुरंत दिया जाए.
- छोटी गलती पर दावा खारिज करने की व्यवस्था खत्म हो.
- बीमारी, विकलांगता या मौत पर 20 लाख की सहायता और पेंशन मिले.
- कलेक्टर दर से मानदेय दिया जाए.
“हम भी इंसान हैं साहब”
जनदर्शन से लौटते वक्त एक मितानिन बस इतना ही कह पाई “हम भी इंसान हैं साहब, हमें भी भूख लगती है, हमारे भी बच्चे हैं.” अब सवाल सरकार से है, जो औरों की जिंदगी बचाते-बचाते खुद टूट रही हैं, क्या इस बार उनकी जिंदगी को भी बचाया जाएगा?

