यमुनोत्री में बन रहीं खतरनाक झीलें, दिल्ली विश्वविद्यालय की टीम करेगी सर्वे, गांवों पर मंडरा रहा बाढ़ का खतरा
''हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. इसी कारण नई-नई छोटी झीलें बन रही हैं''- प्रो. विंध्यवासिनी पांडे


Published : November 15, 2025 at 2:58 PM IST
नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय के हिमालय अध्ययन केंद्र की विशेषज्ञ और शोधर्थियों की टीम दिसंबर में यमुनोत्री और आसपास के क्षेत्रों में संभावित आपदाओं की जांच के लिए जाएगी. उपग्रह मानचित्रों के जरिए यह पता चला है कि वहां ग्लेशियरों के पास सात नई झीलें बन रही हैं, जो भविष्य में धराली की तरह बड़े पैमाने पर तबाही मचा सकती हैं. टीम ड्रोन, जीपीएस और फील्ड सर्वे की मदद से इन झीलों का विस्तृत अध्ययन करेगी और यह समझने की कोशिश करेगी कि आने वाले समय में खरसाली समेत आसपास के गांवों को क्या खतरा हो सकता है.
यमुनोत्री में संभावित खतरा क्या है: हिमालय अध्ययन केंद्र के निदेशक प्रो. विंध्यवासिनी पांडे ने बताया कि हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. यमुनोत्री ग्लेशियर के आसपास भी इसी कारण नई-नई छोटी झीलें बन रही हैं. शुरुआत में यह झीलें दिखने में छोटी लगती हैं, लेकिन कई साल तक बर्फ पिघलने के बाद इनमें पानी लगातार जमा होता रहता है. जब पानी बहुत ज्यादा हो जाता है, तो झील अपने किनारे को तोड़ देती है और अचानक ही नीचे वाले इलाकों में बड़ी मात्रा में पानी पहुंच जाता है. इसे वैज्ञानिक भाषा में ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है. यह बिल्कुल उसी तरह होता है जैसे कोई बांध टूट जाए और पानी सीधे गांवों की ओर बह निकले.
कौन-कौन से इलाकों पर सबसे ज्यादा खतरा: प्रो. विंध्यवासिनी पांडे बताया कि यमुनोत्री घाटी के नीचे बसे गांव खरसाली, जानकी चट्टी, बानस, दुर्बिल, स्याना चट्टी, खरादी, बरकोट, बागसु, नौ गांव इस खतरे की सीधी जद में आते हैं. अगर झील टूटती है तो सबसे पहले ऐसे ही गांवों पर असर पड़ेगा. उन्होंने बताया कि बाढ़ इतनी तेज होती है कि रास्ते में आने वाले खेत, पुल, सड़क, घर सब बह जाते हैं. इसलिए इस खतरे को समय रहते समझना और जांचना बेहद जरूरी है.
हिमालय अध्ययन केंद्र की टीम क्या करेगी: प्रो. विंध्यवासिनी पांडे ने बताया कि इसी उद्देश्य से दिल्ली विश्वविद्यालय के हिमालय अध्ययन केंद्र की टीम दिसंबर में यमुनोत्री क्षेत्र में जाएगी. टीम पहले खरसाली पहुंचेगी और फिर वहां से ट्रैकिंग कर उस झील तक पहुंचेगी जिसे उपग्रह तस्वीरों में खतरे के रूप में पहचाना गया है. टीम के साथ ड्रोन भी होंगे, जो ऊंचाई तक उड़कर झील का आकार, गहराई, पानी की मात्रा और किनारों की मजबूती को रिकॉर्ड करेंगे.
उन्होंने बताया कि जीपीएस की मदद से उस पानी की संभावित दिशा का पता लगाया जाएगा कि अगर झील टूटती है तो पानी किस रास्ते से नीचे आएगा और किन-किन गांवों पर इसका असर हो सकता है. उन्होंने बताया कि झील का खतरा कितना गंभीर है यह जाकर ही पता चलेगा. अगर झील में पानी कम है तो छोटे-छोटे चैनल बनाकर पानी को सुरक्षित निकाला जा सकता है. लेकिन अगर झील का आकार बड़ा है और किनारे कमजोर हैं, तो बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. ऐसे में गांवों को अलर्ट करना, सुरक्षा योजना बनाना और नदी के पास खास संरचनाएं बनाना जरूरी हो जाएगा. इन सब बातों का पता लगाने के लिए टीम झील और आसपास के इलाके का इकोलॉजिकल ऑडिट करेगी. इससे यह समझ आएगा कि आपदा की स्थिति में कितने लोगों, कितने खेतों और कितने गांवों को नुकसान हो सकता है.

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और शोध: प्रो. बिंध्य वासिनी पांडे ने बताया कि हिमालय अध्ययन केंद्र का काम केवल भारत तक सीमित नहीं है. यूजीसी, आईसीएसआर और जीबी पंत इंस्टीट्यूट जैसे संस्थानों के साथ-साथ यूनिवर्सिटी ऑफ बाथस्पा (यूके) और स्विट्जरलैंड जैसे अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर शोध किया जा रहा है. जिनेवा के अंतरराष्ट्रीय आपदा केंद्र से संबद्ध जर्नल में प्रकाशित शोध पत्रों में हिमालय में आपदाओं के प्रभाव को कम करने के उपाय सुझाए गए हैं. उन्होंने बताया कि केंद्र में एमए और पीएच.डी. छात्रों के साथ शिक्षक समुदाय सक्रिय रूप से अनुसंधान में जुटे हैं.
ग्लोबल वार्मिंग है ग्लेशियर पिघलने की वजह: ग्लेशियरों के पिघलने का मुख्य कारण ग्लोबल वार्मिंग है. पिछले 100 वर्षों में तापमान में बढ़ोतरी, वनों की अंधाधुंध कटाई, औद्योगीकरण और परिवहन के विस्तार ने ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को बढ़ाया है. नगरीकरण के कारण बने हीट आइलैंड्स ने वैश्विक तापमान को और गर्म किया है. प्रो. विंध्य वासिनी पांडे ने बताया कि वायुमंडल में सूर्य की गर्मी फंसने से ग्लेशियर, महासागर और पूरा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है.
आपदा जोखिम न्यूनीकरण पर जोर: जापान के सेंडाई फ्रेमवर्क के तहत यह स्पष्ट हुआ है कि प्राकृतिक आपदाओं को रोका नहीं जा सकता, लेकिन उनके प्रभाव को कम किया जा सकता है. हिमालय अध्ययन केंद्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण (डिजास्टर रिस्क रिडक्शन) पर काम कर रहा है, ताकि हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जान और आजीविका को बचाया जा सके.
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