दमोह में टपकती छत और जर्जर दीवारों के बीच पढ़ाई कर रहे बच्चे, इंजीनियर बोले हो सकता है बड़ा हादसा
दमोह में कई स्कूलों की हालत बदतर है, जान जोखिम में डालकर स्कूल में पढ़ रहे हैं बच्चे. प्रधान अध्यापक बोले कहां शिफ्ट करूं स्कूल.

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : July 9, 2026 at 4:12 PM IST
दमोह: बटियागढ़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली एकीकृत स्कूल खिरिया असली में बच्चे जर्जर और टपकती छत के नीचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं. यहां पढ़ाई करने वाले मासूमों को हर समय यह खतरा बना रहता है कि उनके साथ कब दुर्घटना हो जाएगी, यह कहा नहीं जा सकता. कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक संचालित इस शासकीय स्कूल में 161 बच्चे दर्ज हैं.
छत के नीचे प्लास्टर जर्जर, दीवारों से रिसता है पानी
बटियागढ़ की शासकीय माध्यमिक शाला खिरिया असली में स्कूल की बिल्डिंग जर्जर हो चुकी है. जब यह बच्चे बारिश में बैठकर यहां पढ़ाई करते हैं तो कहीं दीवारों से पानी रिसता है तो कहीं छत से पानी टपकता है. कई जगह से दीवारें क्रेक हो चुकी हैं. छत का प्लास्टर उधड़ चुका है. छत पर लगे लोहे के गाडर और फरसी लगातार पानी रिसने के कारण खराब हो गए हैं. ऐसे में किसी दिन बड़ा हादसा हो जाए तो इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता.
मरम्मत के लिए पहुंची लगभग 8 करोड़ की राशि
शिक्षा विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार दमोह जिले में 289 जर्जर स्कूलों की मरम्मत के लिए 2 किस्तों में 7 करोड़ 95 लाख रुपए की राशि उपलब्ध कराई गई है. लेकिन कई स्कूलों तक तो यह राशि पहुंची ही नहीं या पहुंची भी है तो मरम्मत तो हो गई लेकिन समस्या हल नहीं हुई. हर साल दर्जनों स्कूलों के लिए करोड़ों रुपए की राशि मरम्मत के नाम पर खर्च हो जाती है लेकिन स्कूलों की हालत सुधरने का नाम नहीं ले रही है.
'इंजीनियर जता चुके हैं दुर्घटना की आशंका'
स्कूल के प्रभारी प्रधान अध्यापक राधे पटेल का कहना है, "स्कूल के कमरों की छत जर्जर हैं, दीवारें क्रेक हो चुकी हैं. एक कमरे की छत पर फरसी लगी हुई है, जहां से पानी का रिसाव बहुत अधिक होता है. कभी भी दुर्घटना हो सकती है और छत का मलबा बच्चों पर गिर सकता है. शासन के निर्देश हैं कि बच्चों को सुरक्षित स्थानों पर बैठाया जाए, लेकिन हमारे यहां 2 से 3 कमरे हैं और सभी की हालत जर्जर है. इसलिए दुर्घटना की आशंका बनी रहती है.

2024-25 और 2025-26 में बीआरसी और शासन को आवेदन भेजा गया था. इंजीनियर ने आकर स्कूल का निरीक्षण कर कहा था कि बिल्डिंग जर्जर है. इसमें बहुत अधिक दुर्घटना की संभावना है. इसलिए स्कूल को कहीं सुरक्षित स्थान पर लगाएं. हमारे पास दूसरा कोई स्थान नहीं है. इसलिए मजबूरी में यहां पर कक्षाएं लगाना पड़ रही हैं. शासन से अनुरोध है कि स्कूल की मरम्मत कराई जाए."
'पॉलिथीन खरीदकर ढक देते हैं छत'
स्थानीय ग्रामीण महेंद्र सिंह का कहना है, "वह पहले भी कह चुके हैं कि स्कूल को बंद किया जाए या मरम्मत की जाए लेकिन शासन ने ध्यान नहीं दिया. हर साल 8 किलो पॉलिथीन खरीदकर स्कूल की छत ढक दी जाती है लेकिन वह फट जाती है और स्कूल की छतों से पानी रिसता रहता है. किसी भी दिन दुर्घटना हो सकती है. बारिश में बच्चे भीग जाते हैं और उन्हें स्कूल से वापस जाना पड़ता है.
दूसरी समस्या यह है कि जनप्रतिनिधियों से भी शिकायत की लेकिन सुनता कोई नहीं है. एक किलोमीटर की सड़क ऐसी है कि बच्चों को घुटनों तक कीचड़ और नाले के पानी में से निकलकर स्कूल आना जाना पड़ता है."
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'जर्जर भवनों में नहीं लगाएं क्लास'
जिला शिक्षा अधिकारी सत्यम चौरसिया का कहना है, "जो भी शाला भवन जर्जर हैं, उनमें कक्षाएं न लगाने के संबंध में निर्देश जारी किए गए हैं. कल ही मैंने एक पत्र भी जारी किया है कि ऐसे भवनों में शाला न लगाई जाएं कहीं और लगाएं. हमारे यहां शाला भवनों की संख्या बहुत अधिक है. कई बार डीपी डिमांड के आधार पर पिछले सत्रों में स्कूलों को राशि दी जा चुकी है और उनसे अनुरक्षण कार्य कराया गया है. जिन भवनों को मरम्मत की आवश्यकता है और जिन स्कूल को राशि नहीं मिली है उनके लिए हम शासन से राशि मांग रहे हैं."

