35 हजार की क्षमता, लेकिन स्टैंड्स खाली, आखिर रांची में एथलेटिक्स से दूरी क्यों, जानिए वजह
रांची के बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम में राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान दर्शक नदारद दिखे. रांची से चंदन भट्टाचार्य की रिपोर्ट.

Published : May 25, 2026 at 2:17 PM IST
रांची: राजधानी के बिरसा मुंडा एथलेटिक्स स्टेडियम में इन दिनों 29वीं नेशनल सीनियर एथलेटिक्स फेडरेशन प्रतियोगिता का आयोजन हो रहा है. देशभर से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी यहां अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहे हैं. ट्रैक पर रिकॉर्ड टूट रहे हैं, खिलाड़ी कॉमनवेल्थ और एशियन स्तर की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन दूसरी ओर 35 हजार दर्शक क्षमता वाला यह विशाल स्टेडियम ज्यादातर खाली नजर आ रहा है.
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्रिकेट, फुटबॉल और हॉकी जैसे खेलों में हजारों की भीड़ जुटाने वाली रांची एथलेटिक्स से अब तक क्यों नहीं जुड़ पाया. यह केवल एक प्रतियोगिता में कम भीड़ का मामला नहीं है, बल्कि एथलेटिक्स के प्रति लंबे समय से बनी दूरी की तस्वीर है. झारखंड में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है. हॉकी, क्रिकेट और फुटबॉल में राज्य के खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. यही वजह है कि जब भी इन खेलों की बड़ी प्रतियोगिताएं होती हैं तो खेल प्रेमी बड़ी संख्या में स्टेडियम पहुंचते हैं. दर्शकों को अपने स्थानीय खिलाड़ियों से जुड़ाव महसूस होता है.
एथलीटों को लिए बुनियादी जरूरतें बनी बड़ी चुनौती
वहीं एथलेटिक्स में यह कनेक्शन अब तक मजबूत नहीं बन पाया है. झारखंड के कई एथलीट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बावजूद संसाधनों और सहयोग के अभाव में आगे नहीं बढ़ पाते. खिलाड़ियों की डाइट, वैज्ञानिक प्रशिक्षण, नियमित मॉनिटरिंग और आर्थिक सहयोग जैसी बुनियादी जरूरतें आज भी बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. कई प्रतिभाशाली खिलाड़ी शुरुआत में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, लेकिन बाद में सिस्टम की कमियों के कारण उनका करियर ठहर जाता है. यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर ऐसे स्टार एथलीट कम तैयार हो पा रहे हैं. जिनसे दर्शकों का भावनात्मक जुड़ाव बन सके.
एथलेटिक्स को गांव-गांव तक पहुंचाने की जरूरत: मधुकांत पाठक
झारखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन के अध्यक्ष और भारतीय एथलेटिक्स महासंघ (AFI) के पदाधिकारी मधुकांत पाठक भी मानते हैं कि अभी इस दिशा में काफी काम बाकी है. उन्होंने साफ कहा कि एथलेटिक्स को गांव-गांव और घर-घर तक पहुंचाने की जरूरत है. मधुकांत पाठक ने कहा कि झारखंड में कई डे-बोर्डिंग और प्रशिक्षण केंद्र हैं. लेकिन समर वेकेशन के कारण ज्यादातर खिलाड़ी और छात्र अपने घर चले गए हैं. इस वजह से स्थानीय खिलाड़ी भी मैदान नहीं पहुंच पाए.

क्रिकेट के अलावा दूसरे खेल में बच्चों का नहीं दिख रहा जोश
मधुकांत पाठक ने कहा कि क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के प्रति बच्चों में अभी वैसा जोश नहीं दिख रहा है. सरकार, एसोसिएशन और खेल फेडरेशन को मिलकर इस खेल को गांव तक पहुंचाना होगा. उन्होंने कहा कि इसे क्रिकेट से तुलना नहीं कर सकते, क्योंकि वहां मैनेजमेंट मजबूत और आर्थिक संसाधन ज्यादा हैं, जबकि एथलेटिक्स आर्थिक रूप से अभी कमजोर है.
दरअसल, क्रिकेट आज केवल खेल नहीं बल्कि एक बड़ा मनोरंजन उद्योग बन चुका है. आईपीएल जैसे टूर्नामेंट ने इसे घर-घर तक पहुंचा दिया है. फुटबॉल और हॉकी में भी झारखंड के खिलाड़ियों की मजबूत मौजूदगी है. खासकर हॉकी में राज्य की बेटियों और खिलाड़ियों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. यही कारण है कि रांची के मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा हॉकी स्टेडियम में होने वाले मुकाबलों में भारी भीड़ उमड़ती है. दर्शकों को अपने खिलाड़ियों पर गर्व महसूस होता है.
एथलेटिक्स के लिए प्रचार प्रसार की कमी है: एथलीट
वहीं एथलेटिक्स में स्थानीय चेहरों की कमी और प्रचार-प्रसार का अभाव भी बड़ी वजह बन रही है. आम खेल प्रेमियों को यह जानकारी तक नहीं होती कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में कौन खिलाड़ी हिस्सा ले रहा है और उसका प्रदर्शन कितना महत्वपूर्ण है. स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी एथलेटिक्स को लेकर वह माहौल नहीं बन पाया है, जो दूसरे खेलों में दिखाई देता है.
झारखंड के अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी रामचंद्र सांगा भी मानते हैं कि एथलेटिक्स में अभी कई कमियां हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी है. रामचंद्र की माने तो अभी बहुत काम करने की जरूरत है. खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं, लगातार प्रशिक्षण और सपोर्ट सिस्टम देना होगा. जब झारखंड के ज्यादा खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाएंगे, तब दर्शक भी स्टेडियम पहुंचेंगे. 35 हजार क्षमता वाले स्टेडियम में कम से कम 10 हजार लोग आ सकते हैं, लेकिन उसके लिए खेल संस्कृति तैयार करनी होगी.
स्पष्ट है कि रांची में एथलेटिक्स के खाली स्टैंड्स केवल दर्शकों की बेरुखी नहीं, बल्कि खेल व्यवस्था की कई चुनौतियों की कहानी भी बयां करते हैं. जब तक जमीनी स्तर पर खिलाड़ियों को मजबूत आधार, बेहतर संसाधन और स्थानीय पहचान नहीं मिलेगी, तब तक एथलेटिक्स के ट्रैक पर रिकॉर्ड तो बनेंगे, लेकिन स्टैंड्स खाली ही नजर आएंगे.
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