कांग्रेस ने बाबूलाल मरांडी को बताया सरना विरोधी, आदिवासी परंपरा को सनातन से जोड़ने वाले बयान पर साधा निशाना
रांची में कांग्रेस पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी पर निशाना साधा है.

Published : January 2, 2026 at 9:26 PM IST
रांची: नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी द्वारा आदिवासी समाज की आस्था परंपरा और पहचान को सनातन से जोड़कर दिए गए बयान को झारखंड कांग्रेस ने आदिवासी विरोधी करार दिया है.
आज शुक्रवार को पार्टी के प्रवक्ता सोनाल शांति उर्फ रिंकू तिवारी ने पार्टी का इस मामले पर प्रेस रिलीज जारी कर अधिकृत बयान दिया गया. जिसमें कहा गया कि बाबूलाल मरांडी आदिवासी समाज के दशकों से चली आ रही है सरना धर्मकोड की मांग को ठुकरा रहे हैं.
प्रदेश कांग्रेस प्रवक्ता सोनाल शांति ने कहा कि आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना और जीवन पद्धति की जड़ें इतनी गहरी और मजबूत है. जिसे कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकता, संपूर्ण आदिवासी समाज अच्छी तरह समझ रहा है कि झारखंड में उनकी आस्था, परंपरा और अस्तित्व का संरक्षण महागठबंधन सरकार ही कर सकती है. इसका संदेश भाजपा को लोकसभा और विधानसभा चुनाव में परिणाम के रूप मिल चुका है.
'भाजपा ने अपने शासनकाल में आदिवासियों को सिर्फ छला'
प्रदेश कांग्रेस के प्रवक्ता ने कहा कि अपने शासनकाल में भाजपा ने आदिवासी समुदाय को सिर्फ छलने और भड़काने का काम किया. बाबूलाल मरांडी को जब-जब आदिवासी समुदाय सामने देखता है तो झारखंड बनने के 3 माह बाद ही बाबूलाल के शासनकाल में हुए तपकरा गोली कांड की गूज और निहत्थे आदिवासी आंदोलनकारियों के मृत चेहरे सामने आते हैं. रघुवर दास के शासनकाल में पत्थलगढ़ी आंदोलन के मामले में 10000 से अधिक आदिवासी समुदाय के लोगों पर मुकदमे दर्ज किए गए. इसलिए भाजपा नेताओं को आदिवासी समुदाय के लिए घड़ियाली आंसू बहाना उन्हें बंद करना चाहिए.
उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय को सशक्त बनाने के लिए महागठबंधन सरकार कई योजनाएं चला रही है जिसका लाभ उन्हें मिला है. अनुसूचित क्षेत्र में पेसा कानून को लागू करने के लिए नियमावली को कैबिनेट मंजूरी देकर सरकार ने ग्रामीणों को अधिकार दिया है. जहां एक ओर केंद्र सरकार गांव के विकास योजनाओं को चुनने का अधिकार ग्रामवासियों से छीन रही है.
वहीं झारखंड सरकार ने सशक्त पेसा नियमावली बनाकर ग्रामीणों को अधिकार सौंप दिया है. 15 वर्षों से ज्यादा समय तक राज्य में शासन करने वाली भाजपा ने पेसा कानून को लागू नहीं किया. लेकिन अभी पेसा कानून लागू होने से भाजपा के माथे पर चिंता की लकीरें इसलिए है. क्योंकि आदिवासी समुदाय को इन्होंने वोट बैंक बनाकर अपनी जागीर समझ लिया था. आदिवासी समाज के बीच विद्वेष और भ्रम फैलाने के लिए भाजपा बार-बार धर्मांतरण और मतांतरण की बात करती है. लेकिन भाजपा का आरोप संपूर्ण आदिवासी समाज द्वारा नकारा जा चुका है.
क्या लिखा है बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर
आदिवासी समाज की आस्था, परंपरा और पहचान प्राचीन सनातन मूल्यों से गहराई से जुड़ी हुई है. यही परंपराएं आदिवासी समाज की सामाजिक संरचना, स्वशासन और जीवन पद्धति की आधारशिला रही हैं. दुर्भाग्यवश, विदेशी धर्मों और वोटबैंक की राजनीति के प्रभाव में कुछ राजनीतिक दल आदिवासी समाज की इन्हीं जड़ों को कमजोर करने का प्रयास कर रहे हैं.

झारखंड में आदिवासी समाज को खंडित करने की सुनियोजित साजिश रची जा रही है. जहां धर्मांतरण, घुसपैठ और लोभ-लालच जैसे हथकंडों के माध्यम से चौतरफा हमला किया जा रहा है. इस पूरी प्रक्रिया में राज्य सरकार की मशीनरी भी आदिवासी समाज को उनकी परंपरागत पहचान और मूल से दूर करने का प्रयास करती दिखाई देती है.
कोर्ट के दबाव में राज्य सरकार भले ही पेसा कानून लागू करने को मजबूर हुई हो. लेकिन आज भी उसे लेकर आदिवासी समाज को अंधेरे में रखने की कोशिश जारी है. पेसा की मूल भावना आदिवासी स्वशासन पर सरकार की कोई स्पष्टता नहीं है. आदिवासी समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था सदियों से अस्तित्व में रही है. जिसमें मांझी-परगना, मुंडा-मानकी-दिउरी, ढोकलो-सोहोर, हातु मुंडा, पड़हा राजा, पाहन, सरदार, नापा और डाकुआ जैसे पदों को सामाजिक मान्यता प्राप्त रही है. पेसा तभी सार्थक होगा, जब इन पारंपरिक संस्थाओं और पदाधिकारियों को विधिवत मान्यता दी जाएगी.
जब तक पेसा का वास्तविक अधिकार मूल आदिवासियों और उनकी पारंपरिक ग्राम सभाओं के हाथों में नहीं सौंपा जाता, तब तक पेसा कानून का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा. राज्य सरकार को पेसा की नियमावली सार्वजनिक कर ग्रामसभा के अधिकारों और रूढ़िवादी स्वशासन पद्धति पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
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