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नया साल आया लेकिन, नहीं आई उत्तराखंड कांग्रेस की सूची, खींचतान बनी मुसीबत

राज्य में साल 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं. ऐसे में चुनाव से पहले राजनीतिक गहमागहमी भी बढ़ती हुई दिखाई दे रही है.

Dehradun Congress Headquarters
देहरादून कांग्रेस मुख्यालय (Photo-ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : January 5, 2026 at 7:09 AM IST

4 Min Read
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देहरादून: साल 2026 की शुरुआत के साथ ही उत्तराखंड की राजनीति पूरी तरह चुनावी रंग में रंगती नजर आ रही है. वर्ष 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर सभी दल अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गए हैं. कहीं रणनीति बनाई जा रही है तो कहीं संगठन को धार देने की कवायद तेज है. लेकिन इस सियासी हलचल के बीच कांग्रेस एक ऐसी उलझन में फंसी दिखाई दे रही है, जो पिछले कई सालों से पार्टी का पीछा नहीं छोड़ रही.

नया साल आ गया, लेकिन कांग्रेस की वह सूची अब भी फाइलों और बैठकों में ही उलझी हुई है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता लंबे समय से कर रहे हैं. उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी बीते सालों से पूर्ण कार्यकारिणी के बिना ही काम कर रही है. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन मेहरा अपने करीब तीन साल के पूरे कार्यकाल में नई कार्यकारिणी की घोषणा नहीं कर सके. नतीजतन पार्टी को पुरानी कार्यकारिणी के सहारे ही संगठनात्मक जिम्मेदारियां निभानी पड़ी, जिससे जमीनी स्तर पर कांग्रेस की सक्रियता प्रभावित होती रही.

अभी तक जारी नहीं हुई कांग्रेस की सूची (Video-ETV Bharat)

करन मेहरा के बाद जब गणेश गोदियाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, तो संगठन में नई ऊर्जा और बदलाव की उम्मीद जगी. माना जा रहा था कि दिसंबर 2025 के अंत तक या नए साल के साथ ही प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा कर दी जाएगी. गणेश गोदियाल ने इस दिशा में प्रयास भी किए. उन्होंने प्रदेश स्तर पर नेताओं से बातचीत की, नई टीम को लेकर मंथन किया और प्रस्तावित सूची को दिल्ली में हाईकमान के पास अंतिम अनुमोदन के लिए भेजे जाने की भी चर्चा सामने आई. लेकिन गुटबाजी के कारण फैसला नहीं होने की बात कही गई.

गणेश गोदियाल को हाल ही में जिम्मेदारी मिली है और जल्द ही उनकी नई टीम सामने आएगी. उनका दावा है कि कार्यकारिणी के गठन के बाद कांग्रेस भाजपा सरकार की नीतियों और फैसलों के खिलाफ अधिक आक्रामक और संगठित तरीके से जनता के बीच जाएगी.
शीशपाल गुसाईं, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस

खबर है कि दिल्ली स्तर पर सूची को लेकर अंतिम फैसला इसलिए अटका हुआ है, क्योंकि कई वरिष्ठ नेता अपने-अपने करीबी नेताओं को कार्यकारिणी में जगह दिलाने की कोशिश में लगे हैं. राजनीतिक दृष्टि से यह स्वाभाविक हो सकता है, लेकिन इसका खामियाजा पूरी पार्टी को भुगतना पड़ रहा है. कार्यकारिणी के बिना प्रदेश कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा अधूरा नजर आता है. सरकार के खिलाफ आंदोलनों से लेकर चुनावी रणनीति तक हर स्तर पर इसका असर दिखाई दे रहा है. पार्टी के भीतर भी यह सवाल उठने लगे हैं कि जब संगठन ही पूरी तरह खड़ा नहीं होगा, तो 2027 के चुनावी मैदान में कांग्रेस किस मजबूती से उतरेगी.

उधर भाजपा इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की कमजोरी के तौर पर पेश कर रही है. भाजपा ने अपने विभिन्न मोर्चों के संगठनात्मक ढांचे को पहले ही तय कर लिया है और खुद को पूरी तरह चुनावी मोड में बताया है.

कांग्रेस की असली समस्या उसके अपने नेता हैं, जो आपसी गुटबाजी में उलझे हुए हैं. उनके मुताबिक प्रदेश कार्यकारिणी की देरी इसी अंदरूनी कलह का नतीजा है.
खजान दास, भाजपा विधायक

नया साल कांग्रेस के लिए उम्मीदों से ज्यादा सवाल लेकर आया है. अगर पार्टी जल्द ही अपनी अंदरूनी खींचतान से बाहर निकलकर संगठन को मजबूती नहीं देती, तो 2027 के चुनाव से पहले उसकी मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं.

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