कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग का ऐलान: जरूरत पड़ी तो डिस्टर्ब एरिया बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएंगे
राजस्थान सरकार के डिस्टर्ब एरिया बिल के खिलाफ कांग्रेस, सामाजिक संगठनों ने मोर्चा खोला. जरूरत पड़ने पर सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया.

Published : March 4, 2026 at 2:38 PM IST
जयपुर: राज्य सरकार की ओर से हाल ही में कैबिनेट में मंजूर किए गए अशांत क्षेत्र विधेयक (डिस्टर्ब एरिया बिल) को मौजूदा बजट सत्र में पास करने की तैयारी है. 6 मार्च को भजनलाल सरकार डिस्टर्ब एरिया बिल सदन के पटल पर रखेगी. उसके बाद इस पर सदन में चर्चा होगी और पक्ष-विपक्ष के सदस्य अपनी बात रखेंगे. चर्चा के बाद सरकार की पूरी कोशिश बिल को सदन में पास करने की रहेगी. इधर, डिस्टर्ब एरिया बिल को लेकर कांग्रेस लगातार हमलावर है.वहीं, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली, गोविंद सिंह डोटासरा सहित कई अन्य नेताओं ने इस बिल का विरोध किया है. उन्होंने सदन में चर्चा के दौरान इसके खिलाफ पुरजोर तरीके से आवाज बुलंद करने की बात कही है और कहा है कि यह बिल किसी भी तरह से स्वीकार नहीं है. बिल के सदन के पटल पर रखे जाने से पहले ही कई सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने इस बिल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने इसे संविधान और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया है और कहा है कि जरूरत पड़ी तो इस बिल के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे.
इस बिल को लेकर कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के प्रदेश अध्यक्ष एमडी चौपदार का कहना है कि भले ही सरकार बहुमत के आधार पर सदन में इस बिल को पारित करवा ले, लेकिन यह बिल पूरी तरह से संविधान की मूल भावना के खिलाफ है, जो समानता और मौलिक अधिकार देता है. उन्होंने कहा कि सरकार कैसे किसी एक क्षेत्र को डिस्टर्ब एरिया घोषित कर सकती है. उन्होंने कहा, 'हम इस बिल के प्रावधानों को देखेंगे कि इसमें सरकार ने क्या-क्या प्रावधान और नियम लगाए हैं और उसके बाद हम अपनी लीगल टीम से सलाह-मशविरा करने के बाद इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक लेकर जाएंगे.'
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उन्होंने कहा कि यह सरकार पहले भी धर्मांतरण विरोधी कानून लेकर आई थी, उसके खिलाफ भी हम सुप्रीम कोर्ट में गए हैं और इस मामले में भी जल्द ही सुनवाई होगी. उन्होंने कहा कि यह सरकार केवल हिंदू-मुसलमान करके अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहती है. सरकार की पहली प्राथमिकता रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य होनी चाहिए.
कानून की बजाय दूसरे विकल्पों पर ध्यान दें सरकार: जमात-ए-इस्लामी हिंद के प्रदेशाध्यक्ष मोहम्मद नाजिम का कहना था कि अशांत क्षेत्र विधेयक संविधान के खिलाफ और मौलिक अधिकारों का हनन करता है. इस कानून से समाज में भाईचारा और सद्भाव बढ़ने की बजाय दूरियां पैदा होंगी, जो भविष्य में घातक साबित होगी. जिस भी क्षेत्र को डिस्टर्ब एरिया घोषित किया जाएगा. इस विकास के काम ठप हो जाएंगे और वहां रहने वाले लोगों को अन्य लोग हीन भावना से देखेंगे.
उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार केवल ध्रुवीकरण और हिंदू-मुसलमान करके राजनीति करना चाहती है, जो ठीक नहीं है. जनता ने सरकार को चुना है, सरकार ने जनता को नहीं चुना है. इसलिए सरकार को अपनी भेदभावपूर्ण नीति छोड़नी चाहिए और ऐसे कानून बनाने की बजाय जिन मुद्दों से जनता जूझ रही है, उन पर दूसरे विकल्प तलाशने चाहिए. नाजिम का कहना है कि डिस्टर्ब एरिया बिल के प्रावधानों को देखेंगे कि उसमें किस प्रकार से लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है और फिर उसी हिसाब से हम भी इस मामले को लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे.
उद्योगपतियों और बिल्डरों को फायदा पहुंचाने का प्रयास: डिस्टर्ब एरिया बिल को लेकर राजस्थान वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष खानु खान बुधवाली का कहना है कि यह बिल संवैधानिक अधिकारों का तो पूरी तरह से हनन करता ही है, वहीं गरीब और निचले तबके के लोगों की संपत्ति पर चंद उद्योगपतियों और बिल्डरों को कब्जा करने का अधिकार भी देगा. क्योंकि जिस भी क्षेत्र को डिस्टर्ब एरिया घोषित किया जाएगा, वहां जमीनों के दाम गिरेंगे और उनकी संपत्तियों को बिल्डर औने-पौने दामों में खरीदेंगे. उन्होंने कहा कि सरकार का केवल एक ही एजेंडा है कि कैसे भी करके प्रदेश की जनता को हिंदू-मुसलमान की राजनीति में उलझाए रखो, जिससे कि वे विकास और रोजगार की बात न करें.
संविधान में पक्षपात और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं: इस मामले को लेकर सोशल एक्टिविस्ट निशा सिद्धू का कहना है कि संविधान में पक्षपात और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है, लेकिन भाजपा सरकार पक्षपात और भेदभावपूर्ण नीति पर काम कर रही है. डिस्टर्ब एरिया बिल भी उसी का एक उदाहरण है. पहले सरकार धर्मांतरण विरोधी कानून लाती है और अब डिस्टर्ब एरिया बिल सदन में पेश करने जा रही है. हो सकता है बहुमत के आधार पर सरकार इस बिल को सदन में पारित भी करवा ले, लेकिन राजस्थान की जनता इस तरह के कानून को स्वीकार नहीं करेगी.

