मोरा तालाब में चमड़े के जूतों में बसती है 75 साल पुरानी विरासत, फ्लाईओवर की छांव और बिजली बिल ने रुलाया
नालंदा के मोरा तालाब में 100 साल पुराना चमड़े के जूते-चप्पल का कारोबार दम तोड़ रहा है. नई पीढ़ी इस कारोबार से दूरी बना रही.

Published : February 16, 2026 at 7:05 PM IST
रिपोर्ट: मोहम्मद आलम
नालंदा: बिहार के नालंदा के रहुई प्रखंड का मोरा तालाब क्षेत्र कभी चमड़ा उद्योग का एक बड़ा केंद्र हुआ करता था. यहां के महादलित (रविदास) टोले में पिछले 75 वर्षों से तीन पुश्ते चमड़े के जूते-चप्पल बनाने का काम कर रही है. पचासा गांव के इस टोले में करीब 100 घर रविदास समुदाय के हैं, जो आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश करते आ रहे हैं. लेकिन, विकास की आंधी और प्रशासनिक उपेक्षा ने इस पारंपरिक पेशे की कमर तोड़ दी है.
मोरा तालाब में करीब 75 वर्षों से यह कारोबार चल रहा है. दो सौ से भी अधिक लोग इस काम से जुड़े हैं. कच्चा माल कोलकाता, चेन्नई और दिल्ली से आता है. तैयार उत्पाद स्थानीय स्तर पर बेचे जाते हैं. यहां के तैयार उत्पाद स्थानीय स्तर पर बेचने के साथ ही दूसरे राज्यों में भी भेजे जाते हैं. लेकिन आज के कॉम्पिटिशन में नालंदा के कारीगर पीछे रह गए हैं. अब उन्हें भी समय के साथ अपने उत्पाद और बनाने की प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत महसूस हो रही है.
पहले 100 दुकानें..अब घटकर डेढ़ दर्जन: फ्लाईओवर के निर्माण ने चमड़े से निर्मित जूता चप्पल कारोबार पर बड़ा ठेस पहुंचाया है. कारीगर अनिल रविदास बताते हैं कि पहले यहां पहले करीब 100 दुकानें थीं, जो अब सिमटकर महज डेढ़ दर्जन रह गई है. गांव के पास बने फ्लाईओवर ने इस बाजार को सड़क से काट दिया, जिससे सारा व्यवसाय ठप हो गया.
"अब जो ग्राहक आते भी हैं, वे स्थानीय या पुराने जानकार ही होते हैं. पहले जहां बिक्री और सप्लाई दोनों अच्छी थी, अब सिर्फ परिवार का जीविकोपार्जन ही बहुत मुश्किल से हो पाता है. अभी इससे 40 से 50 घरों का रोज़गार चल रहा है. चौथी पीढ़ी इस काम को देखना पसंद नहीं करती है."- अनिल रविदास, कारीगर

लागत भी निकालना मुश्किल: दूसरे कारीगर अरुण रविदास बताते हैं कि वे 1991-92 से इस काम में जुड़े हैं. एक जोड़ी जूता बनाने में करीब 450 रुपए की लागत आती है और 4-5 घंटे की मेहनत लगती है. लेकिन, बाजार में सही रेट नहीं मिलने के कारण उन्हें एक जोड़ी पर मुश्किल से 100 से 150 रुपए ही बच पाते हैं.
"यहां 300 रुपये से लेकर 5000 रुपए तक के जूते बनते हैं. कोलकाता से चमड़ा मंगाकर यहां हाथ से ही जूते तैयार किए जाते हैं और जूतों को बिहार के विभिन्न जिलों के साथ ही दूसरे राज्यों में बेचा जाता है."- अरुण रविदास, कारीगर

क्लस्टर बना सफेद हाथी: कारीगरों के उत्थान के लिए सरकार ने यहां एक क्लस्टर बनाया था, लेकिन वह भी सफेद हाथी साबित हुआ. स्थानीय जनता रविदास के मुताबिक, क्लस्टर बने 30 साल हो चुके हैं. शुरुआत में एक-दो साल काम चला, लेकिन घाटे और कुप्रबंधन के कारण यह बंद हो गया.
"आज क्लस्टर पर 2 लाख रुपए से अधिक का बिजली बिल बकाया है. यदि यह चालू होता, तो आज 250 से 300 लोगों को रोजगार मिल सकता था. फिलहाल बंद कमरे में धूल फांक रहा है."- जनता रविदास, कारीगर

धूल फांक रही डेढ़ करोड़ की मशीन: बता दें कि लेदर क्लस्टर के जरिए मोरा ताबाल फुटवियर औद्योगिक स्वावलंबी सहकारी समिति लिमिटेड बनाया गया था. इसके तहत इस काम में लगे कारीगरों को हुनरमंद बनाने के लिए प्रशिक्षित किया गया और इसके लिए डेढ़ करोड़ की लागत से फुटवियर बनाने की मशीन लगायी गई, लेकिन यह मशीन आज तक बंद पड़ी है.
मौसमी है बिजनेस: ऑफ सीजन में भूखे मरने की नौबत आ जाता है. जूता निर्माण का काम पूरी तरह मौसमी है. अरुण रविदास का कहना है, कि दिसंबर, जनवरी और फरवरी (ठंड का मौसम) और लगन के समय ही थोड़ी-बहुत बिक्री होती है. बरसात और गर्मी में तो कभी-कभी बोहनी भी नहीं होती है. ऑफ सीजन में कारीगर खाली बैठे रहते हैं. हालांकि, आज भी यहां से बने जूते शेखपुरा, गया, नवादा, मुजफ्फरपुर और पटना के अलावा दिल्ली और कोलकाता तक जाते हैं. पुलिसकर्मी भी यहां के मजबूत जूतों के कद्रदान हैं.

सरकार से उम्मीद: कारीगरों का कहना है कि यह पुश्तैनी पेशा अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर है. सरकार अगर ध्यान दे और क्लस्टर को फिर से चालू कराए, साथ ही बाजार उपलब्ध कराए, तो इस उद्योग में जान फूंकी जा सकती है.

बंद क्लस्टर को चालू करने की तैयारी: वहीं, इस संबंध में नालंदा जिला उद्योग केंद्र के महाप्रबंधक सचिन कुमार ने बताया कि "जल्द ही बिजली से जुड़ी समस्याओं को खत्म कर शुरू कराने का प्रयास कर रहे हैं. यहां के कारीगरों द्वारा हाथ से जूता या चप्पल बनाकर बेचते हैं. जिसका क्वालिटी और क्वांटिटी दोनों बेहतर है."
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