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सीएम जनदर्शन रायपुर: कहीं बेटी की तलाश, कहीं पेंशन की आस, कहीं नौकरी का 11 साल का इंतजार

रायपुर मुख्यमंत्री निवास में प्रदेश भर के लोग अपनी समस्या लेकर पहुंचे और समस्याएं बताई. मुख्यमंत्री निवास में छत्तीसगढ़ का सामूहिक दर्द फूट पड़ा.

CM JANDARSHAN RAIPUR
सीएम जनदर्शन रायपुर (ETV Bharat Chhattisgarh)
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By ETV Bharat Chhattisgarh Team

Published : January 9, 2026 at 10:24 AM IST

7 Min Read
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रायपुर: मुख्यमंत्री निवास में आयोजित जनदर्शन शुक्रवार को सिर्फ शिकायतों का मंच नहीं, बल्कि टूटे हुए सपनों, अधूरे वादों और सिस्टम से हारे लोगों की करुण पुकार का आइना बन गया. कोई 15 साल की बेटी की तलाश में दर-दर भटकता पिता था, तो कोई 30-40 साल सेवा के बाद भी पेंशन के लिए गिड़गिड़ाता बुजुर्ग शिक्षक. कहीं 10 साल से अनुकंपा नौकरी की फाइलें धूल खा रही हैं, तो कहीं नक्सल इलाकों में पढ़ाने वाले अतिथि शिक्षक खुद भूख और बेरोजगारी से जूझ रहे हैं.

कभी महिलाओं की रक्षा करने वाली महिला पुलिस वालंटियर आज खुद अपने भविष्य की भीख मांग रही हैं, तो 11 साल से कोर्ट में जीत के बाद भी नौकरी का इंतजार कर रहे बर्खास्त शिक्षक सिस्टम से सवाल पूछ रहे हैं.

सीएम जनदर्शन रायपुर में समस्याएं लेकर पहुंचे लोग (ETV Bharat Chhattisgarh)

"मेरी 15 साल की बेटी लौटा दो सरका" अपहृत की तलाश में दर-दर भटकता पिता

एक पिता की दुनिया उस दिन उजड़ गई, जिस दिन उसकी 15 साल की मासूम बेटी अचानक गायब हो गई. गुढ़ियारी थाना क्षेत्र से 30 मई 2025 को अपहृत हुई नाबालिग आज तक अपने घर नहीं लौट पाई है. बेटी की तलाश में थाने के चक्कर काटते-काटते पिता लखन सेन अब आर्थिक और मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुके हैं. आरोप है कि पुलिस की सुस्ती और ढिलाई के चलते आज भी परिवार को सिर्फ उम्मीदों के सहारे जीना पड़ रहा है. अब बेबस पिता ने मुख्यमंत्री से गुहार लगाई है—“साहब, मेरी बच्ची को ढूंढवा दीजिए…”

30-40 साल की सेवा के बाद भी पेंशन से वंचित: जनदर्शन में फूट पड़ा रिटायर्ड शिक्षकों का दर्द

उम्र के इस पड़ाव पर जब सहारे की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, तब छत्तीसगढ़ के शासकीय अनुदानित स्कूलों के सेवानिवृत्त शिक्षक-कर्मचारी अपने हक की भीख मांगने को मजबूर हैं. मुख्यमंत्री निवास में आयोजित जनदर्शन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद छत्तीसगढ़ शासकीय अनुदानित सेवानिवृत शिक्षक कर्मचारी संघ के प्रांत अध्यक्ष अशोक शर्मा ने बताया कि वे पेंशन और ग्रेच्युटी जैसी दो बुनियादी मांगों को लेकर पहुंचे हैं. उन्होंने कहा कि कई शिक्षकों को रिटायर हुए 10 साल से ज्यादा हो चुके हैं, कई इस इंतजार में दुनिया छोड़ चुके हैं, और जो बचे हैं वे बीमारी और लाचारी से जूझ रहे हैं. 30-40 साल तक बच्चों का भविष्य गढ़ने वाले ये शिक्षक आज खुद अपने भविष्य की लड़ाई लड़ने को मजबूर हैं.

आश्वासन से आंसू तक: 8–10 साल से भटकते परिवार, जनदर्शन में फूट पड़ा अनुकंपा पीड़ितों का दर्द

जिन हाथों ने पूरी जिंदगी सरकार की सेवा की, आज उन्हीं के परिवार हाथ जोड़कर सरकार से जिंदगी की भीख मांगने को मजबूर हैं. विघटित राज्य परिवहन निगम (वर्तमान सी.आई. डी.सी.) जल संसाधन विभाग के अधीन है. पूर्व राज्य परिवहन निगम (सी.आई.डी.सी.) में विगत 10 वर्षों से भी अधिक समय से अनुकम्पा नियुक्ति का मामला टला हुआ है.

10 साल से अनुकंपा नियुक्ति की आस लगाए दर्जनों पीड़ित परिवार गुरुवार को पूरे प्रदेश से मुख्यमंत्री निवास पहुंचे. किसी ने दो साल पहले मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से मुलाकात कर आश्वासन पाया था, तो कोई आठ साल से फाइलों के साथ दफ्तरों के चक्कर काट रहा है. लेकिन नतीजा आज भी शून्य है. आर्थिक बदहाली इस कदर बढ़ चुकी है कि कई परिवारों के सामने भूख और बीमारी दोनों खड़ी है. जनदर्शन में एक महिला की भर्राई आवाज ने पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता उजागर कर दी, “मुझे नहीं तो मेरे बेटे को ही नौकरी दे दो अब अंधेरे के अलावा कुछ नहीं दिखता.”

जनदर्शन में फूटा 10 साल का दर्द: 10 महीने नौकरी, डेढ़ महीने भूख… बीहड़ों में पढ़ाने वाले ‘गेस्ट टीचर’ सिस्टम के शिकार

जो शिक्षक नक्सल प्रभावित और बीहड़ इलाकों में रहकर, बिना नेटवर्क और बिना संसाधनों के बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं, आज वही शिक्षक अपनी ही जिंदगी बचाने की गुहार लगा रहे हैं. प्रांतीय अतिथि शिक्षक (विद्यामितान) संघ के बैनर तले सैकड़ों शिक्षक मुख्यमंत्री जनदर्शन कार्यक्रम में पहुंचे और अपनी 10 साल की पीड़ा सरकार के सामने रखी.

प्रदेश उपाध्यक्ष किरण तिवारी और प्रांत अध्यक्ष अन्नपूर्णा पांडे ने बताया कि भाजपा सरकार के कार्यकाल में नियुक्त ये शिक्षक आज भी “गेस्ट” बनकर काम करने को मजबूर हैं. 12 महीने काम लेने के बावजूद सिर्फ 10 महीने का वेतन, ग्रीष्मकालीन अवकाश का मानदेय नहीं, छुट्टी लेने पर वेतन कटौती और 20 हजार रुपये की अल्प राशि में परिवार चलाने की मजबूरी. यही इन शिक्षकों की रोज की सच्चाई बन चुकी है.

नक्सल प्रभावित इलाकों में, घर से 500-600 किलोमीटर दूर रहकर पढ़ाने वाले ये शिक्षक 100% रिजल्ट दे रहे हैं, लेकिन खुद का भविष्य अंधेरे में है. मुख्यमंत्री से यह चौथी मुलाकात है, हर बार सिर्फ आश्वासन मिला… लेकिन समाधान अब तक नहीं. करीब 1500 अतिथि शिक्षक चार मांगों को लेकर एक बार फिर उम्मीद की आखिरी डोर थामे मुख्यमंत्री के दरबार पहुंचे हैं.

"कभी महिलाओं की ढाल थीं, आज खुद इंसाफ की गुहार लगा रहीं" — जनदर्शन में फूट पड़ा महिला पुलिस वालंटियरों का दर्द

कभी समाज में पीड़ित महिलाओं की रक्षा के लिए पुलिस और जनता के बीच सेतु बनीं महिला पुलिस वालंटियर आज खुद अपने भविष्य को बचाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं. बैकुंठपुर से रायपुर पहुंची इंदु कश्यप ने जनदर्शन में मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद अपनी पीड़ा साझा करते हुए बताया कि सरकार की जनकल्याणकारी योजना बंद होने से सैकड़ों महिलाएं बेरोजगारी और आर्थिक संकट की मार झेल रही हैं. जिन महिलाओं ने घरेलू हिंसा, बाल विवाह और दहेज जैसी कुप्रथाओं के खिलाफ मोर्चा संभाला, आज वही महिलाएं सरकार से दोबारा काम पर लौटने की गुहार लगा रही हैं.

11 साल का इंतज़ार, तीन-तीन अदालतों में जीत फिर भी नौकरी नहीं! जनदर्शन में फूटा बर्खास्त शिक्षकों का दर्द

न्याय की लड़ाई जीतने के बाद भी इंसाफ की राह देख रहे सहायक शिक्षकों का दर्द जनदर्शन में छलक पड़ा. नगर निगम रायपुर के अंतर्गत कार्यरत रहे पुरुषोत्तम यादव अपने 44 साथियों की मांग के साथ मुख्यमंत्री निवास पहुंचे और पुनः बहाली की गुहार लगाई. 2014 में बिना नोटिस निकाले गए इन शिक्षकों ने हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मुकदमा लड़ा और हर जगह जीत हासिल की, लेकिन 9 महीने बीत जाने के बाद भी इन्हें नौकरी पर वापस नहीं लिया गया. मजबूरी में कोई 2000 रुपये की नौकरी कर रहा है तो कोई दिहाड़ी मजदूरी. 11 साल से न्याय की कीमत गरीबी और अपमान के रूप में चुका रहे इन शिक्षकों की आंखों में आज भी सिर्फ एक ही सवाल है — “जब कोर्ट से जीत गए, तो नौकरी कब मिलेगी?”

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