कभी नक्सलियों का गढ़ रहा तमाड़ अब बना कौशल का केंद्र, यहां शिक्षा हासिल कर विदेशों में कमा रहे लाखों रुपए
कभी नक्सल प्रभावित क्षेत्र रहे तमाड़ में आज बच्चे अपना भविष्य संवार रहे हैं. ये बच्चे अब तकनीकी शिक्षण प्राप्त कर विदेश जा रहे हैं.

Published : December 28, 2025 at 8:17 PM IST
जमशेदपुर: लौह नगरी जमशेदपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर, टाटा-रांची हाईवे पर मौजूद तमाड़ क्षेत्र कभी नक्सल प्रभावित इलाके का प्रतीक था. आज यह कौशल विकास का एक मील का पत्थर बन चुका है. टाटा स्टील फाउंडेशन और झारखंड सरकार की पीपीपी मॉडल पर संचालित आईटीआई तमाड़ सुदूर ग्रामीण और आदिवासी युवाओं के भविष्य को संवार रही है.
नक्सल कैंप से आईटीआई तक का सफर
तमाड़ क्षेत्र कभी नक्सलवाद की गतिविधियों से प्रभावित था. हाईवे किनारे बने भवन में सीआरपीएफ का कैंप था. समय के साथ नक्सलवाद की समस्या कम हुई और 2012 में टाटा स्टील फाउंडेशन ने झारखंड सरकार के साथ मिलकर इस भवन को नवीनीकृत कर आईटीआई में बदल दिया. आज यह संस्थान नक्सल के पुराने गढ़ को विकास की मिसाल बना रहा है.
प्रशिक्षण और सुविधाएं
आईटीआई तमाड़ में इलेक्ट्रीशियन, वेल्डर, फिटर और टर्नर जैसे ट्रेडों में दो वर्षीय कोर्स चलाए जाते हैं. खूंटी, तमाड़, रानगांव और आसपास के सुदूर इलाकों के छात्र-छात्राएं यहां प्रशिक्षण लेते हैं. निकटवर्ती छात्र रोजाना सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक यहां कक्षाएं करते हैं, जबकि दूर रहने वालों के लिए हॉस्टल की व्यवस्था है. ये छात्र ज्यादातर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं, जहां उनके परिजन खेती या मजदूरी करते हैं. मशीनों और उलझे तारों के बीच जुनून से तकनीकी ज्ञान सीखते ये युवा, पुराने डर से बाहर निकलकर अपना भविष्य संवार रहे हैं.

सफलता की कहानी, प्लेसमेंट और मुख्यधारा में वापसी
प्रिंसिपल विशाल आनंद बताते हैं कि शुरुआत में छात्रों की संख्या कम थी और उनमें जोश की कमी थी. लेकिन प्रशिक्षण और रोजगार मिलने के बाद गांव-गांव से युवा आने लगे. लड़कियों का दाखिला भी बढ़ा. अब तक 12 बैच के 947 छात्र पासआउट हो चुके हैं, जिनमें 95 प्रतिशत को देश-विदेश (दुबई, हांगकांग जैसे देशों) में रोजगार मिला है.

हाल ही में 36 छात्रों को हांगकांग की वीएससी स्टील कंपनी में नौकरी मिली, जिनमें मुख्यधारा में जुड़ने वाले परिवारों के दो बच्चे भी शामिल हैं. स्थानीय स्तर पर टाटा मोटर्स, आरके फोर्जिंग जैसी कंपनियों में कैंपस प्लेसमेंट होता है. नक्सल प्रभाव से भटके परिवारों के बच्चे भी यहां प्रशिक्षण लेकर मुख्यधारा में लौट रहे हैं.

चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं
महिलाओं में जागरूकता की कमी एक बड़ी रुकावट है. इसे दूर करने के लिए 'पंचायत बंधु कार्यक्रम' शुरू करने की योजना है, जिसमें गांव के मुखियाओं के साथ बैठक कर जानकारी साझा की जाएगी. टाटा स्टील फाउंडेशन अब फैक्ट्री पेंटर कोर्स शुरू करने की तैयारी में है, जिसकी बाजार में अच्छी मांग है. इससे ग्रामीण युवाओं को नए अवसर मिलेंगे.

बदलता माहौल और उम्मीद
नक्सल प्रभाव के कारण पहले बच्चे शाम होते ही घरों में कैद हो जाते थे, शिक्षा से वंचित रहते थे. आज माहौल बदला है. ये युवा आर्थिक रूप से मजबूत होकर परिवार को सम्मानजनक जीवन देने का सपना देख रहे हैं. ग्रामीण इलाकों में मूलभूत सुविधाओं और जागरूकता की कमी अभी भी है, लेकिन आईटीआई जैसे प्रयास नई सोच ला रहे हैं. खासकर लड़कियां अब अपने पैरों पर खड़े होने का संकल्प ले रही हैं. झारखंड सरकार और टाटा स्टील फाउंडेशन की यह पहल सुदूर क्षेत्रों के युवाओं के लिए रोजगार और उम्मीद का शुभ संकेत है.
ये भी पढ़ें:

