Child Labour : कंधों पर बोझ और आंखों में सपने, सिरोही में सड़कों पर बिखरता बचपन...
कचरा बीनना केवल मेहनत का काम नहीं, बल्कि खतरे से भरा हुआ भी है. मजबूरी और गरीबी में बिखर रहे बचपन के सपने...

Published : June 1, 2026 at 5:52 PM IST
सिरोही: हाथों में किताबें और खिलौनों की जगह कचरे की थैलियां, कंधों पर भारी बोरा और पैरों में चप्पल तक नहीं. तपती धूप, उड़ती धूल और तेज रफ्तार वाहनों के बीच मासूम बच्चे रोजी-रोटी के लिए सड़कों पर कचरा बीनते नजर आ रहे हैं. यह दृश्य केवल गरीबी की कहानी नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था के सामने खड़े बड़े सवाल को भी उजागर करता है.
शहर के विभिन्न इलाकों में सुबह से शाम तक छोटे बच्चे कूड़ेदानों और सड़कों पर प्लास्टिक, बोतलें और कबाड़ इकट्ठा करते दिखाई देते हैं. कई बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा, जबकि कुछ ने आर्थिक मजबूरियों के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ दी. कम उम्र में ही जिम्मेदारियों का बोझ उनके बचपन को निगल रहा है.
यह बच्चे बेहद गरीब परिवारों से आते हैं. माता-पिता दिहाड़ी मजदूरी करते हैं, लेकिन परिवार का खर्च चलाने के लिए बच्चों को भी काम में लगना पड़ता है. धीरे-धीरे यही मजबूरी उनकी दिनचर्या बन जाती है और शिक्षा उनसे दूर होती चली जाती है.
कचरा बीनना केवल मेहनत का काम नहीं, बल्कि खतरे से भरा हुआ भी है. गंदगी, संक्रमण और बीमारियों के बीच काम करना बच्चों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर डालता है. वहीं, सड़कों पर तेज रफ्तार वाहनों के बीच दिनभर घूमना हादसों का खतरा भी बढ़ाता है.
सरकार द्वारा शिक्षा और बाल कल्याण के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जरूरतमंद बच्चों तक उनका पूरा लाभ नहीं पहुंच पा रहा. सामाजिक संगठनों और प्रशासन को मिलकर ऐसे बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उनके बेहतर भविष्य के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि इन मासूम चेहरों के हाथों में फिर से किताबें लौट सकें.
जिला शिक्षा अधिकारी महेंद्र कुमार ने बताया कि 'ऐसे बच्चों को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विभाग लगातार प्रयास कर रहा है. प्रवेशोत्सव कार्यक्रम के माध्यम से ड्रॉपआउट एवं वंचित बच्चों की पहचान कर उन्हें स्कूलों में प्रवेश दिलाया जा रहा है. यदि कहीं भी बाल श्रम या कचरा बीनते बच्चे मिलते हैं तो संबंधित विभागों और प्रशासन के सहयोग से उन्हें शिक्षा से जोड़ने की कार्रवाई की जाएगी.

