गुरुजी बने मोबाइल बाबू, 25 ऐप, वेतन कटने का डर, फिर बच्चों को पढ़ाएगा कौन?
शिक्षक संघ का कहना है कि दिनभर वे मोबाइल ऐप में ही उलझे रहेंगे तो बच्चों को कब पढ़ाएंगे ?

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : July 4, 2026 at 3:00 PM IST
रायपुर: छत्तीसगढ़ के सरकारी स्कूलों में अब ब्लैकबोर्ड से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन पर नजरें टिक रही हैं. शिक्षक संघ का आरोप है कि शिक्षा विभाग ने शिक्षकों को पढ़ाने से ज्यादा ऐप चलाने, डेटा भरने और ऑनलाइन हाजिरी में उलझा दिया है. 25 से ज्यादा ऐप, दर्जनों रजिस्टर, सर्वर की खराबी, नेटवर्क का संकट, निजी मोबाइल का खर्च और वेतन कटने की चेतावनी, इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर गुरुजी मोबाइल में ही उलझे रहेंगे तो बच्चों का भविष्य कौन संवारेगा? इसी मुद्दे पर ईटीवी भारत के वरिष्ठ संवाददाता प्रवीण कुमार सिंह ने शालेय शिक्षक संघ के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र दुबे और पदाधिकारी कृष्णा राज पांडे से विस्तार से बातचीत की.
बच्चों की किताबें बंद, गुरुजी का मोबाइल ऑन
शिक्षक संघ का कहना है कि शिक्षा विभाग ने शिक्षकों का मूल काम यानी पढ़ाना पीछे छोड़ दिया है. अब उपस्थिति, रिकॉर्ड, डेटा एंट्री और अलग-अलग ऐप अपडेट करने में ही घंटों निकल जाते हैं. उनका कहना है कि गुणवत्ता वाली शिक्षा तभी संभव है जब शिक्षक को पढ़ाने का समय मिले.
25 ऐप का जाल, पढ़ाई का बंटाधार
वीरेंद्र दुबे के मुताबिक स्कूल शिक्षा विभाग ने 25 से ज्यादा ऐप लागू कर दिए हैं. वीएसके, दीक्षा, उल्लास, टीबीसी समेत कई ऐप में अलग-अलग जानकारी भरनी पड़ती है. उनका कहना है कि एक ही जानकारी कई जगह दर्ज करनी पड़ती है, जिससे शिक्षक का अधिकांश समय मोबाइल पर ही गुजर जाता है.
हाजिरी लगाने में आधा घंटा, पढ़ाई कब होगी?
कृष्णा राज पांडे बताते हैं कि वीएसके ऐप में नेटवर्क और सर्वर की समस्या इतनी ज्यादा है कि स्कूल पहुंचने के बाद आधे घंटे तक सिर्फ उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश करनी पड़ती है. छुट्टी के समय फिर चेक-आउट के लिए वही परेशानी दोबारा झेलनी पड़ती है.
ऐप नहीं चला तो वेतन कटेगा!
शिक्षक संघ का आरोप है कि विभाग ने साफ निर्देश दिया है कि यदि वीएसके ऐप के माध्यम से उपस्थिति दर्ज नहीं हुई तो वेतन कट सकता है. ऐसे में नेटवर्क या तकनीकी खराबी की सजा भी शिक्षक को ही भुगतनी पड़ रही है.

नेटवर्क गायब, लेकिन ऑनलाइन हाजिरी जरूरी
संघ का कहना है कि बस्तर, सरगुजा, कोरिया, जशपुर समेत कई दूरस्थ इलाकों में मोबाइल नेटवर्क ही नहीं है. कई जगह बिजली नहीं होने से मोबाइल चार्ज तक नहीं हो पाता. ऐसे में ऑनलाइन उपस्थिति को अनिवार्य बनाना व्यावहारिक नहीं है.
निजी मोबाइल बना सरकारी दफ्तर
शिक्षकों का कहना है कि सरकारी काम उनके निजी मोबाइल से कराया जा रहा है. कई शिक्षकों को नया एंड्रॉयड फोन खरीदना पड़ा क्योंकि ऐप पुराने मोबाइल या कुछ आईफोन में काम नहीं कर रहा. रिचार्ज का खर्च भी शिक्षक खुद उठा रहे हैं.
टीबीसी ऐप में किताबों का हिसाब भी बना सिरदर्द
कृष्णा राज पांडे के मुताबिक टीबीसी ऐप में हर किताब का स्कैन, रिकॉर्ड और वितरण की जानकारी अपलोड करनी पड़ती है. कई विषयों की किताबें अभी तक स्कूलों में नहीं पहुंचीं, लेकिन डेटा तुरंत अपलोड करने का दबाव लगातार बनाया जा रहा है.
रिजल्ट खराब तो प्राचार्य का वेतन रोको?
वीरेंद्र दुबे ने विभाग के उस आदेश पर भी सवाल उठाया जिसमें खराब परीक्षा परिणाम पर प्राचार्य का वेतन रोकने की बात कही गई है. उनका कहना है कि सरकारी स्कूलों में हर स्तर के बच्चों को प्रवेश देना पड़ता है, ऐसे में पूरा दोष सिर्फ शिक्षकों पर डालना उचित नहीं है.
एक ऐप बनाइए, 25 नहीं
शिक्षक संघ का सुझाव है कि यदि डिजिटल व्यवस्था लागू करनी ही है तो सभी कामों को एक ही ऐप में समाहित किया जाए. साथ ही स्कूलों में टैबलेट या बायोमेट्रिक मशीन उपलब्ध कराई जाए, ताकि निजी मोबाइल पर निर्भरता खत्म हो.
चेतावनी भी, समाधान भी
शिक्षक संघ ने साफ किया कि वह तकनीक का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि अधूरी व्यवस्था का विरोध कर रहा है. उनका कहना है कि पहले नेटवर्क, सर्वर और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं दुरुस्त की जाएं, उसके बाद ऐप पूरी तरह लागू किए जाएं. यदि समस्याओं का समाधान नहीं हुआ तो सभी शिक्षक संगठन मिलकर बड़े आंदोलन का फैसला ले सकते हैं.

शिक्षकों की सबसे बड़ी चिंता एक ही है, हम पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन सिस्टम हमें मोबाइल ऑपरेटर बना रहा है. अब बड़ा सवाल शिक्षा विभाग के सामने है कि डिजिटल निगरानी और गुणवत्ता वाली पढ़ाई के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? क्योंकि यदि गुरुजी का समय ऐप में ही बीतता रहा, तो आखिर बच्चों को पढ़ाएगा कौन?


