जनकवि सुरेंद्र रघुनाथ मिश्र की जयंती, आशु कवि के रूप में बनाई पहचान, छात्र नेता के साथ ही बीएसपी में भी की नौकरी
जनकवि सुरेंद्र मिश्र की पहचान छत्तीसगढ़ में मजदूर नेता के रूप में थी. नौकरी से निकाले गए शिक्षक के लिए इन्होंने बड़ी लड़ाई लड़ी थी.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : January 7, 2026 at 11:14 AM IST
रायपुर: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर के रहने वाले जनकवि सुरेंद्र मिश्र की जयंती हर साल 7 जनवरी को मनाई जाती है. जनकवि सुरेंद्र मिश्र ने मजदूर नेता के साथ ही छात्र जीवन में छात्र नेता के रूप में भी अपनी पहचान बनाई थी. वे नगर निगम महासंघ के अध्यक्ष भी रहे. उनके कार्यकाल में 2 महीने तक एक लंबा आंदोलन 1967-68 में हुआ था जिसमें 200 लोगों को जेल हुई थी.
आंदोलन के दौरान 65 शिक्षकों को नौकरी से निकाल दिया गया था. सुरेंद्र मिश्र के प्रयासों से ही 65 निकाले गए शिक्षकों को पुनः वापसी की गई थी. छात्र जीवन में उन्हें अंग्रेज प्रिंसिपल आगे की पढ़ाई के लिए नागपुर और लंदन भी भेज रहे थे, लेकिन पारिवारिक दायित्वों के कारण पढ़ने के लिए बाहर नहीं जा सके.
जनकवि सुरेंद्र मिश्र
इतिहासकार डॉ रमेंद्रनाथ मिश्र ने जनकवि सुरेंद्र मिश्र के बारे में बताया. वे कहते हैं "छत्तीसगढ़ के एक आशु कवि, श्रेष्ठ वक्ता, समाजसेवी, छात्र, शिक्षक, कर्मचारी मजदूरों के नेता के रूप में सरेंद्र मिश्र पहचाने जाते थे. अध्यापक होने के कारण उनके लाखों शिष्य छत्तीसगढ़ में रहे हैं."
बिलासपुर में जन्म, रायपुर में पढ़ाई
इतिहासकार रमेंद्रनाथ मिश्र ने सुरेंद्र मिश्र के जीवन के बारे में और भी बातें बताई. उन्होंने बताया सुरेंद्र मिश्र का जन्म बिलासपुर जिले के रतनपुर के फुलवारी पारा में 7 जनवरी 1932 को हुआ था. सुरेंद्र मिश्र की नानी ने उनका पालन पोषण और पढ़ाई लिखाई करवाई थी. इनके पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जो 1921 असहयोग आंदोलन में शामिल हुए थे. उनके दादाजी राजगुरु कहलाते थे, जो मालगुजार हुआ करते थे. जनकवि सुरेंद्र मिश्र रतनपुर छोड़कर पढ़ाई करने के लिए अपनी नानी के घर रायपुर चले आए.
लंदन में पढ़ाई करवाना चाहते थे अंग्रेज प्रिंसीपल
इतिहासकार बताते है कि सुरेंद्र मिश्र ने रायपुर के सेंट पॉल स्कूल में पढ़ाई की. वे मेधावी छात्र के रूप में पहचाने जाते थे. उस जमाने में स्कूल के अंग्रेज प्रिंसिपल सुरेंद्र मिश्र की प्रतिभा को देखकर नागपुर के साथ ही लंदन में पढ़ाई करवाना चाहते थे. लेकिन पारिवारिक दायित्वों के चलते वे पढ़ाई के लिए लंदन और नागपुर नहीं गए. आगे चलकर वे सेंटपॉल हाई स्कूल में छात्र संघ के सचिव भी रहे. रायपुर में कहीं पर भी वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन होता था तो उसमें बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे. जिसमें वह प्रथम आया करते थे.

बीएसपी में नौकरी की, रायपुर नगर निगम में भी रहे
सुरेंद्र मिश्र कालांतर में अपने पारिवारिक दायित्व का निर्वहन करते हुए भाई और बहनों को पढ़ाने के लिए रतनपुर से रायपुर लाए. सुरेंद्र मिश्र कुछ समय तक भिलाई स्टील प्लांट में भी नौकरी की. उसके बाद नगर निगम मे क्षेत्र में शिक्षकीय नौकरी भी की. नगर निगम में नौकरी के दौरान नगर निगम महासंघ के अध्यक्ष भी रहे. जिसमें सफाई कर्मचारी, इंजीनियर डॉक्टर और नाइट कॉलेज के प्रोफेसर भी इस महासंघ में शामिल थे.
सुरेंद्र मिश्र के नेतृत्व में 2 महीने तक चला आंदोलन
सुरेंद्र मिश्र के नेतृत्व में सन 1967- 68 में एक ऐसा आंदोलन हुआ जो पूरे देश में इसकी आवाज पहुंची थी. यह आंदोलन लगभग 2 महीने तक चला था. इस दौरान 200 की संख्या में लोग जेल भी गए थे. 65 शिक्षक को इस दौरान निकाल दिया गया था. जनकवि सुरेंद्र मिश्र की बदौलत आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा और 65 निकल गए शिक्षकों को पुनः वापसी की गई.
हिंदी और छत्तीसगढ़ी में कविता के माध्यम से देते थे भाषण
सुरेंद्र मिश्र छत्तीसगढ़ राज्य आंदोलन के सर्वदलीय मंच के संयोजक रहे. आशु कवि के रूप में उन्होंने अच्छी पहचान बनाई थी. भाषण को कविता के माध्यम से प्रस्तुत करते थे. यह भाषण उनकी हिंदी और छत्तीसगढ़ी में होती थी. व्यवहार कुशल और मिलनसार व्यक्तित्व था. वे जो भी निर्णय लेते थे. उस पर चिंतन मनन नहीं करते थे. छात्र जीवन में हुए उन्हें कई बार रतनपुर से बिलासपुर तक का पैदल सफर भी करना पड़ा था. कई मुसीबत का सामना करते हुए उन्होंने अपने और अपने परिवार और छत्तीसगढ़ राज्य और देश को बहुत कुछ दिया जो अनुकरणीय है. आज भी उनके शिष्य उन्हें नमन करते हैं.
गांव से हर साल एक बच्चे को लाकर करवाते थे पढ़ाई
गांव से हर साल एक बालक को हर साल लाकर रायपुर में पढ़ाई करवाते थे. यहां तक की गांव से जिस बालक को लेकर आते थे उनके खाने-पीने रहने और शादी ब्याह तक कराते थे. रायपुर से जब भी अपने गांव जाते थे वह बच्चों के बीच अपनी लोकप्रियता के कारण मशहूर थे. जनकवि सुरेंद्र मिश्र एक व्यवहार कुशल जनप्रिय समाज सेवा में भी इतने आगे थे कि 1945 में अपने समाज के सचिव भी रहे. सुख और दुख में सभी का साथ दिया करते थे. जनकवि सुरेंद्र मिश्र ने अपने जीवन काल में लगभग 100 लोगों की अस्थियों को विसर्जित करने के लिए प्रयागराज भी गए थे.
आशु कवि के रूप में बनाई पहचान
इतिहासकार बताते हैं कि छत्तीसगढ़ में एक लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में इनको याद किया जाता है. अपने पूरे जीवन काल में कई मील तक पैदल और साइकिल का सफर किए हैं. अपनी भाषण और कविता के माध्यम से लोगों को सम्मोहन शैली के माध्यम से अपनी ओर आकर्षित करते थे. ऐसे में गांव के लोग उन्हें सुरेंद्र महाराज या फिर छोटे महाराज के रूप में जानते थे.
31 अक्टूबर 2011 को हुआ निधन
सुरेंद्र मिश्र का अचानक हिरमी में स्वास्थ्य बिगड़ गया. जिसके बाद 31 अक्टूबर 2011 को इलाज के दौरान जनकवि सुरेंद्र मिश्र का निधन हो गया.कर्मचारी नेता और गुरुजी के नाम से भी लोग उन्हें पुकारा करते थे.
रामसागर पारा में बनाई नगर निगम कॉलोनी
जनकवि सुरेंद्र मिश्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि उन्होंने रायपुर के रामसागर पारा में नगर निगम कॉलोनी बसाई थी. उस दौरान महासंघ के अध्यक्ष हुआ करते थे. नाम मात्र की शुल्क लेकर लोगों को रहने के लिए मकान दिलाए थे. उस कॉलोनी में वृक्षारोपण भी करवाया था. रामसागरपारा के नगर निगम कॉलोनी के पास बने हनुमान मंदिर के करीब एक वटवृक्ष है जिसे 1995 में जनकवि सुरेंद्र मिश्र ने लगाया था.
रमेंद्रनाथ मिश्र बताते हैं कि सुरेंद्र मिश्र लोकप्रिय व्यक्तित्व के रूप में पहचान रखते थे. छत्तीसगढ़ और भारत के लिए उनका अद्भुत प्रेम था. उन्होंने अपनी कविता में आजादी के बारे में लिखा है. उनकी प्रमुख कृतियों में सत्य की ललकार थी, जो उनके जीवन के विचारधारा का एक सारांश कहा जा सकता है.

